(साहित्य अकादमी में राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल के कार्यकाल की समीक्षा)
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Monday, 20 February 2023
लंबी लकीर खींची है मधु आचार्य ने !
(साहित्य अकादमी में राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल के कार्यकाल की समीक्षा)
Wednesday, 8 February 2023
जाना हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है !
(हाईलाइन निराश्रित गोवंश शिविर के बहाने)
कुदरत ने दुनिया की हर शह के प्रारंभ और अंत का वक्त मुकर्रर कर रखा है. इसी कड़ी में राजकीय पशु चिकित्सालय, सूरतगढ़ में पिछले 14 वर्षों से निरंतर चल रहे 'हाईलाइन निराश्रित गोवंश शिविर' के समापन का वक्त भी आ गया है. पशुपालन विभाग की इस जमीन पर अब न्यायालय परिसर का निर्माण होगा, जिसके लिए भू अंतरण की कार्यवाही पूरी हो चुकी है. इसी परिसर में संचालित मत्स्य विभाग और आयुर्वेदिक चिकित्सालय पहले ही अंतरित किये जा चुके हैं. अंतिम रूप से इस गोवंश शिविर को जाना है. यहां के पशुओं को दूसरी गौशाला में भेजे जाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. नई कोंपलों के लिए पुराने पीले पत्तों का झरना जरूरी है, यही नियति है, जिसका स्वागत होना चाहिए. विदाई वक्त आज मन भारी है. आपसे इस शिविर के आरम्भ और यहां संचालित हुई गतिविधियों को साझा करता हूं.
नवंबर 2008 का समय रहा होगा जब राजकीय पशु चिकित्सालय में 'हाईलाइन निराश्रित गोवंश शिविर' प्रारंभ हुआ था. उस दिन सर्द कोहरे के मौसम में, रात्रि साढे़ ग्यारह के करीब सिटी पुलिस स्टेशन और गुरुद्वारे के बीच लगभग 200-250 गौवंश, जिनमें ज्यादातर कमजोर गोधे और छोटे बछड़े थे, जाने कौन लोग छोड़ गए थे. भारी धुंध में सड़क पर जाम लगा था, तत्कालीन एसडीएम राहुल गुप्ता, जो ताजा-ताजा आईएएस बने थे, मैंने.उन्हें फोन कर मौके पर बुलवाया. किसी के कुछ समझ में नहीं आ रहा था, लिहाजा अस्थाई व्यवस्था के लिए एक बार इन निराश्रित पशुओं को हमने प्रशासन और पुलिस के सहयोग से राजकीय पशु चिकित्सालय की टूटी-फूटी बिल्डिंग में बने दो बड़े हॉल में शिफ्ट कर दिया. चुनावी मौसम था, लिहाजा सुबह चारे-पानी की व्यवस्था में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई.
हाईलाइन की पूरी टीम ने प्रशासन के सहयोग से इस शिविर को चलाने का जिम्मा उठाया. जब किसी पुनीत कार्य की शुरुआत होती है तो हाथ स्वत: ही जुड़ते चले जाते हैं. दैनिक हाईलाइन ने इस गोवंश शिविर में सहयोग की अपील प्रकाशित करनी प्रारम्भ की तो कारवां बनता गया. शहर के प्रबुद्ध लोगों ने अपने स्वजनों के जन्मदिन, पुण्यतिथि और मांगलिक अवसरों पर सहयोग की निरंतरता बनाए रखी, जिसके चलते निराश्रित पशुओं के लिए बेहतर व्यवस्था बन पाई. बीकानेर रोड पर गुरुद्वारे के सामने लगे शेड के नीचे प्रतिवर्ष सर्दी के मौसम में इन बेजुबान पशुओं के लिए गरमा-गरम दलिये की सेवा भी जारी रहती थी जिसमें सभी प्रबुद्ध जनों का सहयोग मिलता था. यहां तक कि जैतसर विजयनगर, अनूपगढ़ और घड़साना के पाठकों का सहयोग भी इस शिविर को मिलता रहा. इसी शिविर से हमने सूरतगढ़ में पर्यावरण संरक्षण के लिए 'रूंख भायला' अभियान की शुरुआत की थी, जो आज वृक्ष मित्रों के प्रयासों में दूर-दूर तक जा पहुंचा है।
कोरोनाकाल में इस शिविर को भी संकट का सामना करना पड़ा, लेकिन ईश्वर की कृपा से पशुओं के चारे पानी की व्यवस्था में कमी नहीं आई. इसीलिए लगता है कि शिविर में सहयोग करने वाले सभी जागरूक लोगों के लिए धन्यवाद शब्द बहुत छोटा है.
यदि कुछ चेहरों का जिक्र न किया जाए तो बात अधूरी होगी. इस शिविर के संचालन में सबसे महती भूमिका जिस व्यक्ति की रही वह है आंचल प्रन्यास की अध्यक्ष श्रीमती आशा शर्मा, जिन्होंने अपनी व्यस्तता के बावजूद न सिर्फ नियमित सेवा दी बल्कि बेहतर व्यवस्था बनाने के हर संभव प्रयास किए. सर्द मौसम में प्रातः 6 बजे उठकर पशुओं के लिए दलिया तैयार करवाना, हरे चारे की व्यवस्था करना, कोरोना संकट काल में प्रत्येक अमावस्या पर सहयोगियों के साथ चौक पर खड़े होकर आर्थिक सहयोग एकत्रित करना, बीमार पशुओं की देखरेख करना, पानी के टैंकरों की व्यवस्था करना आदि छोटे-मोटे बहुत से काम ऐसे हैं, जिनमें सेवा भाव के साथ निरंतरता बनी रहना अत्यंत कठिन है लेकिन आशा जी ने इस दायित्व को बखूबी निभाया. यही कारण है कि उन्हें इस सेवा के लिए हमेशा भरपूर सराहना मिली और प्रशासन द्वारा भी समय-समय पर सम्मानित किया जाता रहा है. इसी कड़ी में स्वर्गीय विजय शर्मा, स्वर्गीय पवन सोनी, श्री रमेश चंद्र माथुर, श्री विजय मुद्गल, आयुर्वेद चिकित्सालय के श्री गोविंद सिंह, डॉ. एम एस राठौड़, दिलीप स्वामी उर्फ बबलू व संचालन सेवा दल के जगदीश नायक, असगर अली और जुम्मे खान का उल्लेख भी जरूरी है जिन्होंने निस्वार्थ भाव से अपनी सेवाएं दी. इस शिविर में पशु चिकित्सालय के स्टॉफ और सिटी पुलिस थाने का सहयोग भी निरंतर मिलता रहा है. हाल ही में ट्रांसफर हुए थानाधिकारी रामकुमार लेघा तो नित्य प्रति इस शिविर में सेवा देते रहे हैं. जाने कितने ऐसे चेहरे हैं जो मुझे याद नहीं, लेकिन उनकी निस्वार्थ सेवा के बिना यह सब संभव नहीं था. आज घड़ी उन सबका आभार इस बात के साथ कि-
देहों शिवा बर मोहे ईहे,
शुभ करमन ते कबभुं न टरूं
न डरौं अरि सौं जब जाय लड़ौं, निश्चय कर अपनी जीत करौं..
O Supreme Lord! May I never deviate from straight path. May I never fear enemies. Make me winner every time I enter the battlefield.
-Guru Gobind Singh Ji
डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'
Friday, 20 January 2023
सनातन को सहेजने का आधार है संस्कृत
(विरासत संभालने का वक्त)
जब हम किसी भाषा को सहेजने और उसके उन्नयन की बात करते हैं तो सही मायने में उस वक्त हम एक सांस्कृतिक विरासत और मानवी सभ्यता को संरक्षित करने का महत्वपूर्ण काम कर रहे होते हैं। संस्कृति, जिसमें हमारे संस्कार सिमटे हैं, हमारा साहित्य रचा जाता है, हमारी कलाएं, हमारे गीत-संगीत पनपते हैं, हमारे लोकरंग और हमारा लोकजीवन रचता-बसता है, उस समग्र को पीढ़ी दर पीढ़ी अग्रसर करने का काम भाषा ही तो करती है।
इस मायने में जब देव भाषा संस्कृत की बात हो तो अर्थ और गहरे हो जाते हैं। एक ऐसी भाषा जिसमें सनातनी संस्कार पल्लवित हुए हों, जिसमें प्राचीनतम सभ्यताओं ने सांस ली हो, जिसे देवों, ऋषियों और मुनियों ने गाया हो, रामायण और महाभारत सरीखे अनूठे वैश्विक ग्रंथ रचे गए हों, उस भाषा का लोक चलन से बाहर होना एक दु:खद आश्चर्य है।
भाषाओं के मामले में प्राचीन भारत अत्यंत समृद्ध रहा है। यहां कमोबेश हर क्षेत्र, जाति और समुदाय की अपनी-अपनी भाषा और उसकी बोलियां रही हैं। विरासत स्वरूप इन भाषाओं की हमारे पास लाखों-लाख साहित्यिक पांडुलिपियां उपलब्ध है जो इस बात की साख भरती हैं कि यह भाषाई विविधता कोरी कपोत कल्पना नहीं है। भाषाओं और बोलियों का इतना विषद् भंडार होते हुए भी संस्कृत सहित अनेक समृद्ध भाषाओं का चलन से बाहर होना चिंतनीय है।
संस्कृत की बात करें तो कुछ विद्वान साथी इसकी वर्तमान दशा को भारतीय उपमहाद्वीप पर पिछले 2 हजार वर्षों में हुए मध्य एशियाई और यूरोपीय आक्रमणों से जोड़कर देखते हैं, जबकि यह एक पहलू भर है। तथ्य यह है कि नालंदा और तक्षशिला में सुदूरपश्चिमी देशों से आने वाले विद्यार्थियों ने न केवल संस्कृत में अध्ययन किया बल्कि उसे दूर-दूर तक प्रसारित करने में महती भूमिका निभाई। यदि सिर्फ बाह्य आक्रमण से संस्कृत का चलन कम होता तो हमारी द्रविड़ियन भाषाएं भी विलुप्त होने की कगार पर होती। मगर हम देखते हैं कि अन्य विदेशी भाषाओं की उपस्थिति के साथ दक्षिण की भाषाएं निरंतर उत्तरोत्तर प्रगति करती रही हैं।
दरअसल, किसी भाषा के विलुप्त होने में बहुत से कारक होते हैं। भौगोलिक उथल-पुथल ने टेथिस सागर को जब थार के रेगिस्तान में बदल दिया तो फिर भाषा का मुद्दा तो बहुत गौण है। संस्कृत के चलन से बाहर होने में बाह्य आक्रमणों के
साथ-साथ प्राकृतिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारकों को भी शामिल किया जाना जरूरी है। यह कटु सत्य है कि सामाजिक विसंगतियां भी भाषाओं को प्रभावित करती हैं और संस्कृत भी इससे अछूती नहीं रही। वर्तमान में उदासीन लोकचेतना और तथाकथित शिक्षाविदों की भाषाई अज्ञानता के चलते संस्कृत भाषा भारतीय जनमानस में अपना चलन खो चुकी है। बोलचाल की तो बात छोड़िए, साहित्य सृजन में भी संस्कृत पिछड़ गई है। जो भाषा कभी भारतीयता का प्रतीक रही हो, उसे खुद अपने देश में तृतीय भाषा का दर्जा मिलना अत्यंत दु:खद है।
उन विद्वजनों का धन्यवाद करना चाहिए जो भावी भारतीय पीढ़ियों के लिए इसे जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं।
यहां हंस के पूर्व संपादक राजेंद्र यादव की बात याद आती है । उनका मानना था कि जो भाषाएं सिर्फ संवेदना से जुड़ी हैं उनका भविष्य अच्छा नहीं है। भाषा की समृद्धि के लिए संवेदना के साथ-साथ उसे व्यवहार में उतारना भी जरूरी है। भारतीय संस्कृति और सनातन को यदि सहेजना है तो उसकी आधार भाषा संस्कृत को न सिर्फ संरक्षण देना होगा बल्कि उसके उन्नयन की बात भी करनी होगी। यह दायित्व सिर्फ सरकार का नहीं है बल्कि सभी जागरूक और विद्वान शिक्षाविदों का है जो संस्कृत की महत्ता को भारतीय जनमानस पर पुनः स्थापित करें। ब्रिटिश काल में स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा दिया गया नारा ,'वेदों की ओर लौटो' आज भी प्रासांगिक है । भारत जिस संक्रमण काल से गुजर रहा है, उस दौर में संस्कृत और उसकी विरासत एक पथ-प्रदर्शक के रूप में काम कर सकती है, बस इसे समझने की जरूरत है।
डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'
(भाषाविद् और वरिष्ठ साहित्यकार)
Wednesday, 11 January 2023
बालमन की खूबसूरत अभिव्यक्ति 'झगड़ बिलौणो खाटी छा' के बहाने
(बाल साहित्य की पाठशाला-1)
बाल साहित्य सृजन कोई हंसी-खेल नहीं है कि जो हल्का-फुल्का मन में आए, लिख दिया जाए। वर्तमान दौर की अधिकांश बाल रचनाओं में कमोबेश ऐसी ही भावाभिव्यक्ति दिखती हैं जिनमें बच्चों को सिर्फ हंसाने या गुदगुदाने के उद्देश्य की प्रधानता रहती है। ज्यादा हुआ तो आदर्शवाद की चाशनी में लपेटकर साधारण गद्य या तुकबंदी को परोसना ही बाल साहित्य मान लिया गया है। यही कारण है कि ऐसा साहित्य बाल पाठकों के मन में उतर ही नहीं पाता।
कुछ रचनाकार मानते हैं कि बाल साहित्य रचने के लिए बच्चे जैसा मन होना चाहिए। इस कथन में कितनी सत्यता है, यह अपने-अपने अनुभव की बात है। मेरा समझ में तो बाल रचनाओं के लिए बाल मन से कहीं अधिक महत्वपूर्ण रचनाकार की गहन दृष्टि है जो अपनी क्षमता से तात्कालिक भावों को शब्दों में बांधने की कला जानती है। सृजन का यह नियम सार्वभौमिक है।
हकीकत में बाल साहित्य साधकों को अपने रचाव में कहीं अधिक सजग होना पड़ता है। अक्सर देखा जाता है कि लिखते समय बाल रचनाकारों के मन में शब्दों के चयन और संयोजन के साथ आदर्शवादी भावाभिव्यक्ति के विचार उमड़ते हैं। विचारों के इस महासागर में डूबने के बाद अधिकांश बाल साहित्यकार चाह कर नहीं उबर पाते। नतीजा यह होता है कि अधिकांश बाल रचनाएं परंपरागत रूप से 'मंचीय चुटकुला या आदर्शवादी सीख' बनकर रह जाती है। लेकिन जो रचनाकार इस वैचारिक महासागर को लांघने की क्षमता रखते हैं, उनका सृजन देर तक अपना प्रभाव बनाए रखता है और शब्द साधना की कसौटी पर खरा उतरता है। विश्व की हर भाषा में ऐसी अनेक बाल रचनाएं विद्यमान है जो इस बात की साख भरती हैं।
आज बानगी स्वरूप राजस्थानी लोक साहित्य के एक ऐसे ही बालगीत के माध्यम से विमर्श को आगे बढ़ाते हैंं। 'झगड़ बिलौणो खाटी छा' नामक यह प्रसिद्ध बालगीत न सिर्फ बालमन की सशक्त अभिव्यक्ति है बल्कि थार के संस्कारित परिवेश और विसंगतियों के प्रति उपजे बाल आक्रोश को भी उजागर करता है। इस लोकगीत में बाल मनोविज्ञान बड़ी खूबसूरती के साथ गूंथा गया है।
जल संकट के बावजूद घी-दूध की उपलब्धता थार के रेगिस्तान का अजूबा है। यहां का मानवी अपने पशुधन को परिवार का सदस्य मानकर जीवन यापन करता है। ऐसे ही परिवार का एक बच्चा अपने घर में सुबह दही बिलौने के दृश्य को देखता है, उसके मन में जो भाव उठते हैं, उन्हें रचनाकार ने अपनी गहन दृष्टि से साधते हुए इस गीत के मुखड़े में पिरोया है-
झगड़ बिलौणो खाटी छा
झरड़-झरड़ झर चालै झेरणो
मथै चूंटियो मेरी मा...
गीत के पहले अंतरे में बच्चा अपनी व्यस्तता के साथ-साथ उसके प्रति हो रहे बाल अन्याय को उजागर करता है। उसकी शिकायत का अंदाज भी किसी बड़े होते बच्चे की तरह है। वह कहता है, भाग्यवानों के बच्चे तो मक्खन के लौंदे (चूंटियो) चाट रहे हैं और मुझे सिर्फ दही खाने को कहा जा रहा है। जीवन की विसंगतियों को बाल रचनाओं में व्यक्त कर पाना ही इस गीत की खूबसूरती है। देखिए जरा-
दिनभर गा अर भैंस चरावूं
सिंझ्या पड़ियां घर नै आवूं
लूखी आली रोटी खावूं
भागी रा टाबरिया चाटै चूंटियो
मन्नै कैवै दहियो खा
मथै चूंटियो मेरी मा...
दूसरे अंतरे में वह अपनी मां के प्रति समर्पण भाव रखते हुए उसके हर आदेश को पालता है । लेकिन यहां भी वह अपने मन की बात कहने से नहीं चूकता। जब मां दही मथने के बाद बिलोने में से घी का लोंदा तो रसोई के अंदर ले जाती है और उसे सिर्फ थोड़ा सा फिदड़का मिलता है। ऐसे में उसके गुस्से को महसूस कीजिए-
मा रो कैयो म्हूं कदी ना टाळूं
उठ झांझरियै दही नै ठारूं
बैठ्यो बैठ्यो बिन्नै रूखाळूं
आवै बिलड़ी तो चूंपी मारूं
घी रो लोधो माऊ मां ले जावै
कोरो फिदड़को देवै मन्नै ल्या
मथै चूंटियो मेरी मा...
बचपन में पालतू पशुओं के प्रति स्नेह और अपनेपन का भाव स्वाभाविक है। उम्र बढ़ने के साथ मनुष्य अपनी व्यस्तता के चलते ऐसे प्राकृतिक संबंधों से स्वत: ही दूर चला जाता है। इस परमानंद की अभिव्यक्ति गीत के तीसरे अंतरे में गूंथी गई है। इतना होने के बावजूद जब बच्चे के हिस्से का दूध कोई और पी जाता है तो बालमन विद्रोह करने पर उतारू हो जाता है। अंतरा देखिए-
गोरी गा नै गुवार खुवावूं
खाज करूं म्हूं हाथ फिरावूं
छोटै मूमलियै नै गळै लगावूं
दे पुचकारी लाड लडावूं
दूध गटागट पीवै दूसरा
जद हो जावै मेरी भ्यां
मथै चूंटियो मेरी मा...
आदर्शवादी सृजन से इतर दृष्टि रखने वाला यह गीत बाल साहित्यकारों के लिए एक प्रेरणा स्रोत हो सकता है बशर्ते उनमें सीखने की ललक बाकी हो।
-रूंख
Saturday, 31 December 2022
कब्जों की बिसात पर विकास की महागाथा
(अतिक्रमणों के बहाने...)
....इधर बड़े दिनों से शहर में 'अतिक्रमण हटाओ अभियान' का शोर है। दरअसल, राजनीति में इस तरह के अभियान गाहे-बगाहे चलते ही रहते हैं। चूंकि लोकतंत्र प्रहरियों के कान कच्चे होते है, लिहाजा अपनी करतूतों से कुछ प्यादे गिर पड़ते हैं तो उनका स्थान लेने नये सिर उठ भी खड़े होते हैं। स्थानीय राजनीति की बिसात पर अतिक्रमण का यह पूरा खेल नये-पुराने प्यादों की इसी उठापटक का नतीजा है, जो हमेशा की तरह अनिर्णित रहने वाला है।
सूरतगढ़ में अतिक्रमण का खेल कोई नया नहीं है। शहर के बाहरी वार्डों में पैराफेरी की लगभग 4600 बीघा जमीन, जो 90 के दशक में राजस्व विभाग द्वारा नगरपालिका को सौंपी गई थी, का अधिकांश भाग कब्जों की भेंट चढ़ चुका है। इन कब्जाधारियों में जाने कितने पंच-सरपंच, प्रधान, डायरेक्टर, पार्षद, पटवारी, पत्रकार, कर्मचारी, राजपत्रित अधिकारी, पुलिस के कारिंदे और अन्य जनप्रतिनिधि शामिल रहे हैं। बहती गंगा में हाथ धोने के बहाने इन अतिकर्मियों ने अरबों रुपए की यह सरकारी संपदा चंद सालों में ही खुर्द-बुर्द कर दी। आज ये सब महामहिम अपने रसूख के चलते दूध के धुले साबित हो चुके हैं।
अब जो शेष बची हुई भूमि है, वह अत्यंत कीमती है। उसे हड़पने की साजिश ही इस बवाल की मूल जड़ है। गिद्ध दृष्टि लगाए भू-माफिया गिरोह इस फिराक में रहते हैं कि गरीबों की आड़ में वे भूमि का बड़ा हिस्सा डकार जाएं तो वहीं कुछ नौसिखिये लोग थोड़ा-बहुत खर्च कर 'भागते भूत की लंगोटी पाना' चाहते हैं। मगर जब कभी दांव उल्टा पड़े तो उन्हें नुकसान होना भी स्वाभाविक है। पर 'बाई का फूल बाई नै..' जैसी कहावतें गढ़ने वाले ये लोग खिसियानी बिल्ली की तरह दांत निकालने लगते हैं।
इस पूरे खेल में नगरपालिका खुद एक 'डिफेंडर' की भूमिका में रहती है। शक्ति याद दिलाने पर हनुमान की तरह वह कभी-कभी 'सेंटर फॉरवर्ड' खेलने तो लगती है, लेकिन बड़ी जल्दी फॉउल करवा बैठती है। सत्ता पक्ष का प्रतिनिधि इस खेल में रेफरी बन उसे लाल/पीला कार्ड दिखाकर मनमाफिक ढंग से यूज़ करता है। थोड़ी-बहुत तोड़फोड़ के बाद 'वही घोड़े वही मैदान' वाली स्थिति हो जाती है। 'चूरमा' किसे नहीं भाता !
शहर में चल रहे अतिक्रमण और तोड़फोड़ के मामले का तथ्यात्मक विश्लेषण करते हैं तो इस पूरे बवाल में बहुत से सवाल उठते हैं। सरकारी सम्पत्ति को हड़पने का प्रयास करना गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है, लेकिन क्या मजाल पालिका द्वारा किसी दोषी अतिकर्मी, उसके सहयोगी, संलिप्त पार्षद या कर्मचारी के खिलाफ कोई नामजद मुकदमा दर्ज करवाया गया हो। अपराध को बढ़ावा देने की यह कार्यशैली अपने आप में शर्मनाक है। यदि वाकई पालिका प्रशासन और हमारे जनप्रतिनिधि इस समस्या को लेकर गंभीर हैं तो उन्हें इन सवालों के जवाब तलाशने चाहिए -
जवाब मांगते सवाल
1. जब शहर में अतिक्रमण हो रहे थे उस वक्त पालिका का अतिक्रमण निरोधी दस्ता क्या कर रहा था ?
2. इस दस्ते द्वारा कब-कब और कितने मामले चेयरमैन और अधिशासी अधिकारी के प्रसंज्ञान में लाए गए ?
3. कितने मामलों में पालिका के उच्चाधिकारियों द्वारा आंख और मुंह बंद रखे गए ?
4. जब वार्ड में अतिक्रमण हो रहे थे,. तब वहां के पार्षद की भूमिका क्या थी ?
5. वार्ड प्रहरी के रूप में उस पार्षद ने अतिक्रमण को रोकने के क्या प्रयास किए ? यदि वह खुद संलिप्त था तो पालिका ने उसके खिलाफ क्या कार्रवाई की ?
6. पालिका के चेयरमैन और अधिशासी अधिकारी जानबूझकर आंखें मूंदे क्यों बैठे थे ?
7. सक्षम होने के बावजूद उपखंड अधिकारी और अतिरिक्त जिला कलेक्टर ऐसे मामलों में कड़ी कार्यवाही करने से गुरेज क्यों करते रहे ?
8. बात-बात पर चिल्लाने वाले विपक्ष को ये अतिक्रमण दिखाई क्यों नहीं दिए ? क्या विपक्षी पार्षद भी मिलीभगत के चलते इस खेल में शामिल थे ?
9. अवैध ढंग से कब्जा किए गए अनेक भूखंडों के पट्टे भी जारी हुए हैं, आखिर किन कर्मचारियों और अधिकारियों की मिलीभगत से यह पट्टे जारी किए गए ?
ऐसे अनेक सवाल हैं जिनका उत्तर कोई नहीं देना चाहता। अतिक्रमण तोड़ने पर वाहवाही बटोरने वाली नगरपालिका की कार्यशैली एक मजाक सी लगती है जिसमें वह अपनी संपत्ति पर हुए अवैध कब्जे और कब्जाधारी की पहचान तो कर लेती है लेकिन सिवाय मलबा जप्त करने के, उस अपराध में लिप्त लोगों के खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही नहीं करती। यह पकड़े गए चोर को छोड़ने जैसी बात है। सोचने योग्य बात है कि नगर पालिका के 'लैंड बैंक' को लूटने वाले अपराधियों को शह देना भी सहभागिता का एक अपराध है। सनद रहे, राज्य की संपत्ति को इस ढंग से खुर्द-बुर्द करवाने पर आपराधिक न्यास भंग का गंभीर मामला बनता है। यदि कहीं कोई जनहित याचिका लग गई तो दोषियों के गले में आते देर नहीं लगेगी।
गुजरते साल 2022 के अंतिम दिन इस रपट के बहाने यही कामना की जा सकती है कि नव वर्ष हमारे जनप्रतिनिधियों को सद्बुद्धि दे !
- डॉ.हरिमोहन सारस्वत
Wednesday, 28 December 2022
श्श...लाइब्रेरी रो रही है !
सही पढ़ा है आपने ! सच में 'लाईब्रेरी' रो रही है। अंधी दौड़ में किसे पड़ी है, जो घड़ी भर रूके, उसे चुप करवाए। पर जरा सोचिए, अगर कोई दबे पांव आकर आपके कंठ मोस दे और घर पर आधिपत्य जमा ले तो कैसा लगेगा ?
दरअसल, 'लाइब्रेरी' के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है। व्यावसायिकता के दौर में बाज़ार ने दबे पांव आकर न सिर्फ इस शब्द के अर्थ बदल दिए हैं बल्कि एक गरिमापूर्ण स्थान से लाकर उसे गली-मोहल्लों में टपोरी की तरह खड़ा कर दिया है। ऐसा मानवीय व्यवहार देख शायद शब्द भी अपनी अस्मिता पर रोते होंगे।
ज्यादा वक्त नहीं हुआ जब शब्दकोशों के खजाने में 'लाइब्रेरी' शब्द ज्ञान का भंडार और विद्वता सहेजने का केन्द्र हुआ करता था। दुनिया के हर देश में 'लाइब्रेरी' को अपनी महत्ता के चलते अद्भुत सम्मान प्राप्त था। किताबों का यह संसार इतना अनूठा था कि वहां दुनियाभर के ज्ञान पिपासु लोग बैठ कर शब्द साधना करते थे। इन पुस्तकालयों में जाने कितने नए आविष्कारों का जन्म हुआ, कितने सपने पल्लवित हुए, साकार हुए, वैश्विक विकास की कितनी ही नवीन संभावनाएं इन्हीं किताबों के संसार में गढ़ी गई। नालंदा से तक्षशिला और हावर्ड से कैंब्रिज के बीच फैले समृद्ध पुस्तकालयों की महिमा चहुंओर चर्चित थी।
लेकिन आज...। इस गंभीर शब्द की वो दुर्गति हुई है कि मत पूछिए !गली-गली में कुकुरमुत्तों की तरह उगी इन तथाकथित लाइब्रेरियों की हालत देख शब्द रोते हैं। बाजारवाद के चलते आज की लाइब्रेरी से पुस्तकें गायब हो चुकी हैं, उनका स्थान झूठे सपने दिखाने वाली गाइड्स और कॉपी किये गए नोट्स ने ले लिया है। उन गुरू घंटालों की क्या कहिए, जिन्होंने निजी स्वार्थों के चलते 'लाइब्रेरी' के अर्थ ही बदलवा दिए। ऐसे गुरूओं से क्या उम्मीद की जा सकती है जिन्हें 'लाइब्रेरी' और 'वाचनालय' में फर्क करना तक नहीं आता ! शिक्षाविद् कहलाने के शौकीन, ये जगद्गुरु बड़ी शान से अपने चेलों की 'लाइब्रेरी' का उद्घाटन करते हैं।उधार लिए शब्दों में व्यक्त अपने उद्बोधन में लाइब्रेरी की महत्ता को बयान करते हैं और सरकारी नौकरी की सिद्धि देने के बड़े-बड़े दावे करते हैं। अपने हित साधते यही गुरू सीधे-साधे विद्यार्थियों को एकांत में अध्ययन करने की बजाय इन लाइब्रेरियों में जाने के लिए प्रेरित करते हैं।
गली-मोहल्लों के नुक्कड़ पर खुली इन लाइब्रेरीज का पुस्तकों से दूर-दूर तक संबंध नहीं है। यहां सिर्फ बैठकर पढ़ने की सुविधा रहती है। ज्यादा हुआ तो वाईफाई और ड्रिंकिंग वॉटर...। भीड़ में एकांत तलाशते विद्यार्थी इन लाइब्रेरीज में अपने नोट्स और बुक्स लेकर पहुंचते हैं। वहां बैठने के लिए वे संचालकों को घंटों के हिसाब से भुगतान करते हैं। इन लाइब्रेरीज में भी भीड़ भरी होती है लेकिन आज के दौर में कानों में ईयर-फोन लगाने से ही आदमी भीड़ में अकेला हो जाता है, खुद में खो जाता है।
जरा सोचिए क्या लाइब्रेरी शब्द इतना छोटा है कि महज 10X10 के कमरे में समा जाए ! क्या पढ़ने की एकांत सुविधा को लाइब्रेरी कहना उचित है ? जहां ज्ञानवर्धक पुस्तकों का अभाव हो उसे लाइब्रेरी कैसे कहा जा सकता है ? चंद रोजगारपरक पत्रिकाओं और दो-चार अखबारों से कोई स्थान लाइब्रेरी नहीं बन जाता, वहां तो किताबों की खुशबू होना लाजिमी है।
लेकिन जहां सरकारी नौकरी का तिलिस्म ज्ञान पिपासा और जिज्ञासा से बड़ा हो जाए, युवाओं के सुनहरे सपने कोचिंग की गाइड्स और पेपर लीक के जाल में उलझे हों, वहां पर लाइब्रेरी जैसे कितने ही संवेदनशील शब्द अपनी अस्मिता पर बुक्का फाड़कर रोएं नहीं तो क्या करें ! आभासी सपनों की भीड़ में उन्हें ढाढ़स बंधाने वाला कोई नहीं है।
-रूंख
Sunday, 13 November 2022
अनूठा रहा 'अंजस' का आयोजन
(रेख़्ता फाऊंडेशन द्वारा आयोजित अंजस महोत्सव के बहाने)
इस मायने में जोधपुर में आयोजित 'अंजस महोत्सव' ने राजस्थानी भाषा, साहित्य और संस्कृति के विकास की दिशा में एक मजबूत कदम रखा है. 29-30 अक्टूबर को 'गढ़ गोविंद रिसोर्ट' में सम्पन्न इस दो दिवसीय आयोजन में सिनेमा, संगीत और साहित्य का अनूठा संगम देखने को मिला. राजस्थानी साहित्य में 'डिंगल दरबार', 'कविता कोटड़ी', 'साहित्यिक पत्रकारिता में भासा' और 'गद्य की घड़त' सरीखे गंभीर सत्र आयोजित किये गए.
कार्यक्रम में उपस्थित हजारों कला प्रेमियों के बीच लोक संगीत को नई ऊंचाइयां देने वाले गायक पदमश्री अनवर खान, युवा दिलों की धड़कन मामे खां और मुख्त्यार खान ने खूब रंग जमाया. आयोजन में 'बाड़मेर बॉयज' को सुनना सुकून भरा था तो वही 'राहगीर' के गीत ' तुम उड़ तो पाओगे...' ने सबको झूमने के लिए मजबूर कर दिया. हिंदी कविता को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाले शैलेश लोढ़ा और अभिनेत्री इला अरुण ने भी अपनी प्रस्तुति में दर्शकों को राजस्थानी संस्कृति के अनछुए पहलुओं से रूबरू करवाया. कॉरपोरेट और फिल्म जगत की हस्तियों ने भी इस आयोजन में दर्शकों से अपने अनुभव साझा किए.
इस सांस्कृतिक मेले में राजस्थानी साहित्य साधकों से मिलना भी एक सुखद संयोग था. आदरणीय तेज सिंह जोधा, डॉ. अर्जुनदेव चारण, आईदान सिंह भाटी, मधु आचार्य, लक्ष्मणदान कविया, अंबिकादत्त, डॉ. जितेंद्र सोनी, मनोहर सिंह राठौड़, पदम मेहता, श्याम महर्षि, कुमार अजय, घनश्यामनाथ, मोनिका गौड़, संतोष चौधरी, डॉ. गजादान चारण, भरत ओला, सत्यनारायण सोनी, डॉ. मदनगोपाल लड्ढा, राज बिजारणिया, छैलूदान चारण, डॉ. राजेंद्र बारहठ, सुरेंद्र स्वामी राजेंद्र देथा, देवीलाल गोदारा और रूप सिंह राजपुरी की संगत ने समय को सुखद बना दिया.
राजस्थानी आंदोलन को लंबे समय से व्यक्तिगत और संस्थानिक स्तर पर मजबूत करने के काम चल रहे हैं. उन्हीं सभी प्रयासों का परिणाम है कि आज राजस्थानी की बात संसद और विधानसभा में ही नहीं, सात समंदर पार तक गूंजने लगी है. इसी कड़ी में कॉरपोरेट स्तर पर 'अंजस' का आयोजन एक सुखद एहसास है जिसने हमारे भीतर अपनी मातृभाषा और संस्कृति के प्रति गौरव का भाव पुनर्स्थापित किया है. राजस्थान और राजस्थानियों के लिए अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने की दृष्टि से यह एक शुभ संकेत है.
Saturday, 12 November 2022
बड़भागण है गोमती !
( श्याम जांगिड़ रै नूवै उपन्यास गोमती भाभी रै मिस...)
तीज तिंवारां बावड़ी...!
पुन्न बडेरां रा आछा, बरकत है बां री रीतां में तिंवार बणाया इस्या इस्या गाया जावै जका गीतां में राजी राखै रामजी ! आज बात आपणै तिंवारां री...

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