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देखो देखो देखो, बाइस्कोप देखो !

 

पगडंडियों के दिन (11)

'ई है मुम्बई नगरिया, तू देख बबुआ/सोने चांदी की नगरिया, तू देख बबुआ...' ये गाना जब कानों में पड़ता तो गली मोहल्ले के बच्चे दौड़कर बाहर आ जाते. उनके पीछे मां और दादियों को तो आना ही पड़ता.

जी हां ! बाइस्कोप. यानी गुजरे जमाने का सिनेमा. अब सिनेमाघर तो चल कर सब जगह जा नहीं सकता लेकिन बाइस्कोप के क्या कहने ! वो तो गली मोहल्लों से होता हुआ बच्चों के सपनों तक पहुंचने का दम रखता था. जरा इसकी प्रसिद्धि का अंदाजा तो लगाइए. लकड़ी का रंगीन बक्सा सिर पर उठाए बाइस्कोप वाला जब गली में प्रवेश करता तो एक हलचल सी मच जाती. घरों के दरवाजे खुलने लगते और मोहल्ले में नीम के पेड़ के नीचे देखते ही देखते छोटे-मोटे सिनेमाघर सा माहौल बन जाता. 'देखो, देखो बाइस्कोप देखो/ तीन फुट का धोबी देखो/बारह मन की धोबन देखो' गुनगुनाता हुआ बाइस्कोप वाला आवाजेंं देता.

बाइस्कोप वाले अक्सर यूपी और बिहार से आया करते थे जो तीज, त्योहार और मेलों में घूम कर अपनी आजीविका कमाते थे. ऑफ सीजन में ये लोग कमाने के लिए गांवों और कस्बों की गलियों में पहुंच जाते. मोहल्ले में आकर बाइस्कोप वाला खुली जगह पर लकड़ी की बंद पेटी को तिपाई वाले स्टैंड पर टिका देता. उसके बाद पेटी के ऊपर लगे छोटे स्पीकर से फिल्म 'दुश्मन' का गीत शुरू हो जाता -

'दिल्ली का कुतुब मीनार देखो
मुंबई शहर की बहार देखो
ये आगरे का है ताजमहल
घर बैठे सारा संसार देखो
पईसा फेंको, तमाशा देखो...'


मुंबई फिल्म जगत की सुपरस्टार जोड़ी राजेश खन्ना और मुमताज पर फिल्माए गए इस गीत को सुनने के बाद बच्चों में बाइस्कोप देखने की होड़ लग जाती. इस सिनेमा की टिकट बहुत सस्ती थी. मात्र 15 पैसे ! बाइस्कोप वाला जानता था कि खुल्ले पैसों के चक्कर में दादी सौदेबाजी करेगी. फिर एक रूपये में सात बच्चों के साथ बहू को भी बाइस्कोप दिखा देगी. लेकिन उसके पास हामी भरने के अलावा कोई चारा नहीं होता. वैसे भी कला, संगीत और संस्कृति से जुड़ा हुआ व्यक्ति सौदेबाजी में माहिर कहां होता है !

बाइस्कोप वाले लकड़ी के बक्से में चारों तरफ पांच-सात गोल छेद रहते जिनमें बच्चे अपनी आंखें गड़ा लेते. बाहर के प्रकाश को रोकने के लिए दोनों हाथों को आंखों और पेटी के छेद से सटा लिया जाता. अब बाइस्कोप के अंदर का शानदार नजारा दिखाई देता. बल्ब की रोशनी के बीच क़ुतुब मीनार, ताज महल लाल किला, इंडिया गेट और न जाने कौन-कौन से चित्र दिखाई देते. बाइस्कोप के ऊपर बज रहा संगीत और देखी जा रही तस्वीरें एक साथ ऐसा दृश्य प्रस्तुत करती मानो फिल्म चल रही हो. बीच-बीच में उन दिनों के चर्चित कलाकारों के चित्र और फिल्मी दृश्य भी दिखाए जाते. इसे चलाने के लिए बाइस्कोप वाला पेटी के ऊपर लगी एक चकरी को हाथ से घूमाता रहता. लगभग तीन-चार मिनट की फिल्म कब पूरी हो जाती, पता ही नहीं चलता. बाइस्कोप से आंखें हटते ही एक बार तो चुंधिया जाती परन्तु सुखद अंधेरे से जीवंत प्रकाश की ओर लौटने का यह सुहाना सफर कई दिनों तक दिलो-दिमाग पर छाया रहता.

आज जब एक क्लिक के साथ ही अमेज़न प्राइम और नेटफ्लिक्स जैसी कंपनियां चंद मिनटों में तीन घंटे की पूरी फिल्म आपके मोबाइल की स्क्रीन पर उपलब्ध करवा देती हैं तो बीते जमाने के बाइस्कोप की क्या बिसात ! हां इतना जरूर है कि अब फिल्म देखते समय वो तन्मयता नहीं आती जो बाइस्कोप के चार इंच वाले गोल घेरे में स्थिर चित्रों को देखते हुए आती थी. आखिर आगे बढ़ने की कुछ कीमत तो चुकानी ही पड़ती है.

-रूंख


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