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हवामहल टीवी और हम लोग !

पगडंडियों के दिन (4) - रूंख भायला

'राम-राम ओ भैन जी..' सुबह-सुबह गली में सिगड़ी सुलगाती मां ने पड़ोसन आंटी से कहा.
'राम-राम टोनी की मां.' आंटी के स्वर में उदासी थी जिसे सुनकर मां उनके पास चली गई.
'के होयो, रोयोड़ा सा दीसो ?'
'का बताएं, मीनू कै पापा नै रात टीवी फोड़ दियो. नुकसान हो गियो भैनजी.'
'के बात होगी ?'
'कुछी ना, रात पटाकडाऊन गाड़ी तैं आए थे. आलू-भिंडी बनाई थी, टमाटर डालन सै सब्जी थोड़ी जादा लीसी होगी. खावन बैठै तो गुस्सो आ गियो. चार गाली निकाल कै बोलै, यो अम्मा को सिर बनायो है. बस दारी, मो को बी रीस आगी. मन्नै बी कह दियो- हां, अम्मा को ही सिर है, पर अम्मा तोरी है...' गार्ड आंटी रूआंसी होकर बताने लगी.
'ओ हो, फेर...?'
'तुम तो जानो ई हो, दो घूंट लगी थी. बस, मूसल धरो थो इमामदस्तै कै पास, चलतै टीवी पर दे मारो. मैं तो वाकू फेर कछु ना बोली.'
'कोई नीं ओ भैन जी, सुकर करो थारै को ठोकी नीं. टीवी तो ओर बपरा लेस्यां....' मां ने दिलासा दी.

80 के दशक में ऐसी छोटी-मोटी बातें ही जिंदगी को चटपटा और आनंददायक बना देती थी. यह वह दौर था जब टेलीविजन ने घरों में पैर पसारने शुरू किए थे. ब्लैक एंड व्हाइट टीवी के उस जमाने में हम लोग खुशियों के रंग खुद ही भर लेते जिनकी रंगत आज के रंगीन टीवी में मिल ही नहीं सकती. उन दिनों आपके घर पर यदि टेलीविजन है तो मोहल्ले में इज्जत बढ़ जाती थी. लगभग 20-22 फुट ऊंचे पाइप के ऊपर आड़े-तिरछे लगे दो एंटीने घर की शान हुआ करते थे. जिस दिन घर पर एंटीना लगता उस दिन घर के बच्चे सबसे ज्यादा खुश होते थे. 'हमारे भी टेलीविजन आया है' यह समाचार गली ही नहीं पूरे मोहल्ले में बड़ी शान के साथ वे टेलीविजन चालू होने से पहले ही बांट आते थे.
टेलीविजन का चालू होना भी इतना आसान कहां था.

दुकान वाले मिस्त्री भैया घर आते. पहले एंटीना तैयार कर उसे पाइप पर कसते. फिर उस पर बूस्टर की डिब्बी लगाते. दीवार के सहारे क्लंप लगाकर पाइप को फिट किया जाता. दो बड़े लड़के घर की छत पर खड़े होते जो पाइप को पकड़ने का काम करते. उन्हें एंटीना लगाता देख गली में सबको ज्ञात हो जाता कि आज फलां के घर टीवी आया है. एंटीना से दो तारें घर में नीचे उतारी जाती जो टीवी वाले कमरे तक पहुंचती. मिस्त्री भैया टीवी को चालू करते तो उस पर पहली बार झिलमिलाहट के अलावा कुछ नहीं आता. बच्चे और उसके दोस्त एकबारगी तो निराश हो जाते.

'यार, हमारे घर तो लगाते चालू हो गया था.'

'अंकल जी, एंटीना हिलाऊं क्या ?'

'नहीं.'

छत के ऊपर से आवाज आती 'चालू हो गया क्या ?'

'नहीं हुआ !'

'एंटीना सेट करना पड़ेगा.'

मिस्त्री भैया बड़े दार्शनिक अंदाज में कहते हुए छत पर चढ़ने लगते. दो-तीन बार पाइप को इधर-उधर घुमाते. तभी नीचे से बच्चे चिल्ला उठते- 'आ गया, आ गया, आ गया. बस ठीक है और मत छेड़ो.' मिस्त्री भैया और छत पर चढ़े दोनों लड़के किसी बहादुर लड़ाके की तरह इत्मीनान से नीचे उतर आते. बच्चों को झिलमिलाते टीवी में चेहरे ढूंढने पड़ते लेकिन मिस्त्री भैया अपने काम से संतुष्ट होते.

आंटी जी, दो-तीन दिन में पिक्चर बिल्कुल साफ हो जाएगी. मुझे बधाई दे दो तो मैं जाऊं ?'
'हां लो बेटा,' औरतें उसे पांच रूपये देकर गुलाब जामुन की प्लेट आगे कर देती.

गली के लगभग सारे बच्चे उस दिन नया टीवी देखने के लिए घर में जमा हो जाते. मोहल्ले की 5-7 आंटियां भी बधाई देने आ ही जाती. सब मिलकर पूरा कृषि-दर्शन देखते उसके बाद चित्रहार. चित्रहार के सारे गानों का क्रम याद रखना और उसे नुक्कड़ गोष्ठियों में साझा करना बड़ा शगल था. जहां उस दौर के टेलीविजन ने हम लोगों की एकाग्रता और तन्मयता को बढ़ाने का काम किया था जिसे आज का टीवी नई पीढ़ी में लगातार घटाता ही जा रहा है.
उस जमाने में हवामहल टीवी का दबदबा हुआ करता था. वेस्टन, बेलटेक और टेक्सला जैसी कंपनियां इस प्रतिस्पर्धा में अपना स्थान बना रही थी. ज्यादातर टीवी शटर वाले होते थे जिनके ऊपर बूस्टर अलग से लगाना पड़ता था. टीवी में कार्यक्रम के नाम पर चित्रहार सबसे मनोरंजक होता था. उसके बाद 'हम लोग', 'बुनियाद', 'ये जो है ज़िंदगी' जैसे लोकप्रिय धारावाहिक शुरू हुए जिनमें मध्यमवर्गीय परिवारों का हर आदमी अपने आप को किरदार के रूप में पाता था. इन धारावाहिकों की लोकप्रियता का आलम यह था कि हिंदुस्तान की गलियां और मोहल्ले सूने हो जाते थे. प्रसिद्ध फिल्म शोले के निर्देशक रमेश सिप्पी द्वारा निर्देशित धारावाहिक 'बुनियाद' के किरदार मास्टर हवेली राम और उसके परिवार का दर्द सबको अपना लगता था और अक्सर आंखें भीग जाया करती थी. मोहल्ले की औरतें तो अक्सर रो-रो कर धारावाहिक के किस्से अपनी बातों में बांटा करती थी. मनोहर श्याम जोशी द्वारा लिखित इस सुप्रसिद्ध धारावाहिक में भारत विभाजन के दौर की दास्तान थी.
आज एचडी और स्मार्ट टीवी के दौर में किसी चैनल पर विज्ञापन शुरू होते ही सबके हाथ रिमोट की तरफ बढ़ते हैं और तुरंत चैनल बदल देते हैं. उस वक्त, हां उस वक्त कभी-कभी ब्लैक एंड व्हाइट टीवी का वह हसीन दौर जेहन में आता है जब 'ये जो है ज़िंदगी' के राकेशनाथ, शफी ईमानदार, फरीदा जलाल,और टीकू तलसानिया जैसे मंजे हुए कलाकार अपने अभिनय से साधारण बातों में हंसी का रंग भर देते थे. आज पर्दे पर फूहड़ ढंग से हंसाते किरदारों के पीछे वे सब गुम हो चुके है. शायद 'ये जो है ज़िंदगी' धारावाहिक की वास्तविकता और सबक यही है जो हम और आप भोग रहे हैं. 'बुनियाद' का शीर्षक गीत आज भी उसी कशिश के साथ बुलाता हुआ सुनाई देता है.



 

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