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इन दिनों...!

 


(हिंदी कहानी)

चारों तरफ गुब्बारे ही गुब्बारे थे. उड़ते हुए गुब्बारे.  छोटे-बड़े, रंग-बिरंगे. कुछ फूले हुए, कुछ पिचके से. किसी की हवा निकल रही थी तो किसी की टाइट थी. कोई हवा खराब कर रहा था तो कइयों की हवा खराब थी. कुल मिलाकर यूं लगता था, पृथ्वी गुब्बारों से भरी एक बड़ी थैली बन चुकी है. जैसा अक्सर गुब्बारों के पैकेट में हुआ करता है, इस बड़ी थैली में भी मरियल और फटे गुब्बारों की भरमार थी जिनकी कहीं कोई पूछ न थी. हां, गाहे-बगाहे इन्हीं मरियल गुब्बारों की 'बिटकनी' बना एक दूसरे के सिरों पर फोड़ी जा रही थी.

गुब्बारों की इस तोड़-फोड़ के चलते 'फटाक' और 'पट' का शोर चहुंओर था. कई 'फटाक' मिलकर बम के धमाके कर रहे थे जबकि कुछ 'पट' लक्ष्मी बम थे यानी धुएं की भरमार और ढेर सारा कचरा. 'बिटकनियों' के क्या कहने ! चींटियों के पांव में नेवरों की रूनझुन. कुछ गुब्बारों से निकलता 'फुस्स' का शोर बड़ा अजीब था. 'संऊंं......सूं........फूं....' के साथ बांडी' सी फूंकार, मानो एक बार तो डस ही लेगी. लेकिन अगले ही पल हांफते हुए, लिटपिटा कर ढेर हो जाना, इन गुब्बारों की फितरत थी.

फटे गुब्बारों की मत पूछिए. इधर हवा भरी, उधर निकली. चिकने घड़ों पर बूंद ठहरे भी तो कैसे ? मगर 'हवा' भरने वाले होंठों के क्या कहने ! थकते ही न थे. इन हवाबाज होंठों की कमी कहां थी. एक के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा, गुब्बारों में हवा भरने का एक लंबा सिलसिला. विज्ञान और तकनीक की मदद से अब तो हवाबाज़ों ने नए पंप भी इजाद कर लिए थे. पल भर में सौ पाउंड की हवा, एक साथ लाखों गुब्बारों में हवा भरने की तकनीक, मनचाहे रंग की हवा भरने के दावे. उड़ते गुब्बारों में हवा भरने की तकनीक भी खोजी जा चुकी थी. वाकई हवाबाज़ों ने खूब तरक्की की थी.

मगर गुब्बारों की इस भीड़ भरी दुनिया में सुइयां भी थी. होनी भी चाहिए. सृजन और विनाश, कुदरती नियम जो ठहरा ! मगर दिक्कत यह थी कि ये सुइयां घाघ लोगों की उंगलियों में छिपी थी, भला आंख वाले अंधों को कैसे दिखती ! शातिर लोग बस उंगली लगाते, गुब्बारे का काम तमाम. दरअसल, उंगली लगाना एक कला बन चुकी थी. इस कला में पारंगत लोग निहायत ही कलात्मक ढंग से सुइयों का प्रयोग करते थे. गुब्बारों से भरी दुनिया में सुई और उंगली की यह कला सीखने और सिखाने वालों की कमी नहीं थी. सुइयों वाली उंगली कब और कहां धरी जाए, चतुर व्यवसायियों द्वारा इसके लिए बाकायदा ट्रेनिंग सेंटर्स खोल दिए गए थे. 'आर एंड डी' लैब्स में नये किस्म की सुइयां विकसित हो रही थी जिनकी नोक पर शब्द धरे जा रहे थे, जहर बुझे शब्द ! अब महज एक सुई लाखों गुब्बारों का काम तमाम करने के लिए काफी थी. दिन-रात गुब्बारों के फटने का शोर ध्वनि प्रदूषण की सारी सीमाएं लांघ चुका था. बीपी और शुगर के मापदंडों की तरह धमाकों के सम्बंध में नए प्रदूषण नियम गढ़ने और स्वीकारने की तैयारी थी. शोर शराबे के बीच कहीं खुशियां, कहीं गम. यही सब तो चल रहा था इन दिनों...

अचानक कोरोना सी कयामत हुई. पता नहीं कैसे, गुब्बारों के फटने पर हवा की जगह लहू निकलने लगा. फटाक, पट, संऊंं....सूं........फूं...के शोर के बीच पृथ्वी लहूलुहान हो चली. रक्त से लथपथ फूटे गुब्बारे, बारिश के दिनों में रोशनी से टकराने वाले कीट-पतंगों की भांति अनवरत गिरते ही जा रहे थे. हवा में उड़ते गुब्बारों के फूटने का शोर ऐसा था मानो किसी ने पटाखों के गोदाम में पलीता लगा दिया हो. एक बार तो सबने सोचा, शायद गुब्बारों में नयी तकनीक से भरी लाल रंग की हवा संघनित होकर बह निकली है लेकिन जब उसे छूकर देखा गया तो वह खून ही था. गर्म गाढ़ा खून, जो किसी जिंदा जिस्म से निकलता है. नेगेटिव और पॉजिटिव ग्रुप्स में बंटा यह खून थक्का बना ही नहीं पा रहा था, बस एकाकार होकर पृथ्वीनुमा गुब्बारे पर तेजी से बहता चला जा रहा था. कंदराओं के बीच से होता हुआ, ढलानों की ओर, नदी-नालों के साथ, महासागरों में मिलने को बेताब....

इस विभत्स दृश्य को देख रहे एक छोटे से अनछुए गुब्बारे ने अनायास ही आशंका जताई-

'क्या पानी भी लाल होने वाला है ?'

ठीक उसी वक्त आंख वाले अंधों ने पहली बार देखा कि सुइयां सजी पारंगत उंगलियां सुन्न पड़ रही हैं और कुशल हवाबाज़ों के होंठ सूखने लगे हैं.

-डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

kapurisar@gmail.com

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