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विरासत के शब्दचित्र (2)


1. सतोलिया


खेल भर नहीं था
सतोलिया !
एक सबक था
सात ठीकरियों के चक्रव्यूह को
अभिमन्यु की तरह उड़ाने का
उड़ते ही दौड़ जाने का.

गेंद के वार से बचकर
बिखरी ठीकरियां सजाने में
उतना ही जोखिम था
जितना आज घर बनाने में.

फिर भी आगे बढ़कर
खतरे उठा लेते थे
जीतने के लिए दो चार गदीड़
पीठ पर भी खा लेते थे.

जीवन की बाधाओं पर
पार पाने का
पहला सबक
हमें सतोलिये ने ही सिखाया था !


2. पैैैल-दूज



गली हो या घर
मां की झिड़कियों के बाद भी
लड़कियां बना ही लेती थी
पैल-दूज का कोर्ट
बिना किसी डर के.

लंगड़े पैर से
ठीकरी के स्टापू को
एक से दूसरे घर में
धकेलती छोरियां
मारे खुशी के
चीखती थी, चिल्लाती थी
जरा सी चूक होते ही
टेनिस कोर्ट में सेरेना सी
उछल कर कूद जाती थी.

इन दिनों
स्टापू मिलते नहीं हैं
और आशंकाएं घूमती हैं गलियों में
तभी गायब हो गई हैं छोरियां
शायद बंद घरों में
सीख रही हैं
जिंदगी की पैल दूज !

3. लंंगड़ा सैर

क्या आपने कभी
लंगड़ा सैर खेला है !
खेल खेल में
विकलांग बन पराए दर्द को
महसूस करना
सिर्फ खेल भर नहीं होता
जीने का सबक भी होता है.

आगे बढ़ने की दौड़ में
अहम को पालते
आंख वाले अंधे
अक्सर छेड़ते हैं लंगड़ों को
मगर कई बार
गिरते पड़ते, ठोकरें खाते
लंगड़े जीत जाते हैं.

अफसोस, इन दिनों बच्चे
कमजोरियों से लड़ने के लिए
लंगडा सैर कहां खेल पाते हैं.

4. गिट्टे



गली में नहीं
तो घर ही सही
मां, रूक्कू आई है
मैं गिट्टे ही खेल लूं.

नदी की तलछट से निकल
मेरे बस्ते में पहुंचे गोल गिट्टे
सहेलियों की हथेलियों पर
कलाबाजी खाते मटोल गिट्टे
बचपन के खजाने की
हर चीज कितनी सस्ती थी
पत्थर में भगवान हैं या नहीं
कौन जाने !
मगर गिट्टों में
मेरी जान बसती थी.

आज गिट्टे गायब हैं
बच्चे नहीं जानते
गिट्टों के बहाने
जिंदगी में
खुशियां को उछालना !

5. कोटला छपाकी

कोटला  छपाकी
जुम्मेरात आई है
जेहड़ा अग्गे पिछे वेखे
ओहदी शामत आई है
काश, आज भी
वो शामत आ जाए
तो खुलकर खा लूं मैं
बचपन के उस कोड़े की मार
जीतने की ललक छोड़
हारता रहूं बार-बार
एक-बार, सौ बार
बहुत दिनों से हंसा नहीं हूं
हंसना चाहता हूं मेरे यार !

6. कंचे



मोहल्ले के नुक्कड़ पर
अक्सर दिख जाती थी
बच्चों से घिरी दो-तीन घुच्चियां
जो नहीं थी किसी शूटिंग रेंज से कम
गलियां चहकती थी
जब कंचों के खेल में
धुरंधरों को हराकर
जीत जाते थे हम.

मुट्ठियों को भींच कर
एक आंख मींच कर
निशाना साधते छोरे
घरवालों को लगते थे
बहुत छिछोरे.

पड़ती थी मार, निकलती थी जान
लाल पड़ जाते थे छोटे छोटे कान
कुछ दिन का रोना-धोना
फिर वही घोड़े, फिर वही मैदान.

बरसों बाद
योगा क्लास में बैठा
आज सोच रहा हूं
अंगूठे को जमीन पर टिका
तर्जनी या मध्यमा से
कंचे का निशाना लगाते हुए
मैंने तो बहुत पहले
सीख लिया था ध्यान योग !

7. आइस-पाइस

आइस पाइस में
थप्पी देने का आनन्द
मुकनगढ़ का खजाना मिलने से
नहीं था रत्ती भर भी कम
जेठ की दुपहरी में
मौहल्ले भर के घरों में
बेखौफ छुप जाते थे हम.

छुपन छुपाई, तेरी बारी आई
कहां है बहना, कहां है भाई
लुक छुप जाना, मकई का दाना
पूछे जो कोई, नहीं तुम बताना
ना ना ना ना
ना भई, ना ना !

धमा चौकड़ी मचाता
लुका छिपी का यह खेल
जीवन में अब भी चलता है
अपनों के बीच
कोई अपना ही
दबे पांव थप्पी देकर
चुपचाप छलता है
उस दिन जिंदगी में
उदासी का सूरज
जरा देर से ढलता है !

-रूंख

1 comment:

  1. आहा शानदार कविताएँ।
    पुराने खेलों के माध्यम से बचपन याद दिलाने के साथ सीख भी महत्वपूर्ण दी है आपने। बधाई

    ReplyDelete

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