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'भाण्डे कली करालो, भाण्डे...'

 


पगडंडियों के दिन (12)

हमारी विरासत

'दुनिया पीतल दी...' गीत पर भले ही सारा जमाना थिरक लिया हो लेकिन बेबी डॉल को शायद पता ही नहीं, कि एक जमाना था जब इसी 'पीतल' को अपनी कला से चमकाने वाले हुनरमंद लोग भी दुनिया में हुआ करते थे. वो पगडंडियों का जमाना था. इंसान के पैर जमीन पर टिके थे. हवा में उड़ने की फितरत तो हमने इस दौर में ही सीखी है. लेकिन वक्त कब किसी का हुआ है साहब ! जैसे आज बेबी डॉल का नशा उतरा हुआ मालूम पड़ता है ठीक वैसे ही मतलबी जमाने ने पीतल चमकाने वाले कारीगरों को भी जमींदोज़ कर दिया है. तभी तो आज दूर-दूर तक कोई आवाज सुनाई नहीं देती-


'भाण्डडडे कली करा लो भाण्डडडे.., परातां दे पौड़ लवा लो, कली करा लो कली.....!'

मगर उन दिनों बर्तन कली करने वाले कारीगरों की बड़ी पूछ हुआ करती थी जब अधिकांश मध्यमवर्गीय घरों में पीतल या कांसे के बर्तन थे. स्टील के बर्तन आने से पहले टोकणी, लोटा, देगची, कड़ाही, पतीले, कोली, बाटी, गिलास, थालियां, यहां तक कि चमचे भी पीतल के हुआ करते थे. ऐसे बर्तनों को मांजने के बाद इनकी चमक देखने लायक होती थी. दिक्कत सिर्फ एक ही थी कि इन बर्तनों में धात्विक प्रतिक्रिया के कारण मसालेदार और खट्टी चीज़ें ज्यादा समय तक नहीं टिक पाती थी. इस समस्या का समाधान सिर्फ कली वालों के पास था. वे इन बर्तनों की अंदरूनी सतह पर कली और रांगे का एक पतला लेप लगा देते थे जो धात्विक प्रतिक्रिया को रोकता था. चांदी सी चमकदार कली का लेप लगाने के बाद बर्तन अंदर से चमचमा उठते थे.

बर्तन कली करने वाले कारीगरों की अनूठी शान

गली के नुक्कड़ पर लगे शहतूत तले जब कली करने वाला भाई अपनी साइकिल खड़ी कर कैरियर पर बंधी अंगीठी और कोयले की बोरी उतारता तो मोहल्ले के घरों के दरवाजे उसकी आवाज सुन धीरे-धीरे खुलने लगते. वह बड़े दिलकश अंदाज में मुनादी करता-


'नवें बणाके हत्थ फड़ा दयां
भाण्डे दयो पुराणे
मोयां दे विच जान पा दयां
करां सजाखे काणे
'भाण्डडडे कली करा लो भाण्डडडे.....!'


लकड़ी के कोयलों को छोटी सी गोल अंगीठी में सुलगा कर वह मशीनी पंखे से उसे हवा देता तो भट्टी में अंगारे दहकने लगते. मदारी की भांति उसके झोले से संडासी, हथोड़ा, प्लास, नौसादर की डिबिया, रांगा, कली के तार.... और भी न जाने क्या क्या, बाहर निकलने लगते. मैली सी चादर और ढेरों सुराख वाली फटी कमीज पहने कलीवाला भाई होंठों में बीड़ी दबाकर उकडूं बैठ जाता और अपना काम शुरू कर देता. 
बीच-बीच में मोहल्ले की औरतों से मोल भाव भी चलता रहता.


'दो भाण्डे, इक रपय्या'


ठीक है. पर भाई, इसके ज्यादा बता रहे हो !'


'बिब्बी, देग दा मूं वेख ! पूरा इक रपय्या लग्गू. मरजी है तुहाडी.' 


'कळी चोखी करी रे भाई. लारली बिरियां तेरो ई कोई भाई आयो हो, जमां रांगो थेथड़ ग्यो. दो मईना ई को चाली नीं !'


बिब्बी, कम दी गरंटी होऊ, मेरे कोळे बोतया टपटपाई है नीं. साफ कम करीदा है, रोटी हक दी खाइदी है...'



अपने काम में मस्त कली वाला ऐसी बातों पर कान धरता ही नहीं था. वह बर्तन को संडासी से पकड़ भट्टी पर गर्म करता और उसमें कली की तार का एक सिरा रगड़ता जो पिघलकर चमकदार गोल बूंद में बदल जाती. इसके बाद वह नौसादर पाउडर डालता तो गर्म बर्तन से तेज धुआं उठता. कली वाला भाई बड़ी फुर्ती से एक पुराने कपड़े को संडासी से पकड़ उस बर्तन में पड़ी कली को चारों ओर फैला देता. कली के चमकदार लेप से बर्तन की अंदरूनी सतह चमक जाती और गर्म बर्तन छन्न से पानी में.....लो हो गई कली !


इन कली करने वालों की अहमियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पंजाबी लोक संगीत में 'रंगीले जट्ट' द्वारा गाया गया गीत 'भांडे कली करा लो...' कभी गलियों में ठीक वैसे ही गूंजा करता था जैसे बेबी डॉल ने दुनिया को पीतल की बताकर धूम मचा दी थी. 


अब न पीतल के बर्तन हैं न कली करने वाले लोग. हमने झूठी चमकदार शान का लबादा ओढ़कर पीतल के बर्तनों को या तो कबाड़ में बेच दिया है या फिर किसी बोरी में बंद कर कहीं लटाण पर पटक रखा है. कभी घर की शान कहे जाने वाले पीतल के बर्तनों में आज हम मेहमानवाजी करने की सोच भी नहीं सकते. और कली वाले, वे जाने कहां गुम हुए, जमाने को खबर ही नहीं. छोटे कारीगरों को दर्ज करने के लिए इतिहास के पास पन्ने कहां होते हैं !


सच पूछिए तो हमें फुर्सत ही नहीं है अपने विरसे को संभालने की. विकास की अंधी दौड़ में अहसानफरामोश होकर हम खुद को ही नहीं संभाल पा रहे हैं तो औरों की बिसात ही क्या !
-रूंख

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