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बारात आ गई क्या !

 

पगडंडियों के दिन (10)

बारात आ गई क्या ! शादी-विवाह के दिनों में यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण हुआ करता था लेकिन बदले हुए वक्त में इसकी रंगत भी धूमिल पड़ चुकी है. देहात की बात छोड़ दें तो शहरीकरण के दौर में अब घर के सदस्यों और गिने-चुने परिजनों के अलावा किसी को उत्सुकता नहीं होती कि बारात आई या नहीं. कभी-कभी तो हालत यह होती है कि घोड़ी पर चढ़ा दूल्हा बेचारा पीछे मुड़कर देखता है तो घर परिवार के पांच दस लोगों के अलावा वहां कोई नहीं होता. कमबख्त सारे बाराती उससे पहले ही विवाह स्थल पर पहुंचकर दावतें उड़ाने में जुटे रहते हैं. मैरिज पैलेस संस्कृति ने बारात स्वागत और आवभगत के मायने ही बदल दिए हैं. अब घराती और बाराती में फर्क मिट चुका है. बाजारवाद के चलते हालात यहां तक बदल चुके हैं कि बारात स्वागतकर्ताओं का स्थान भी वेलकम गर्ल्स ने ले लिया है.

एक वक्त था जब पूरे गली, मोहल्ले और विवाह में आए सभी मेहमानों की दिलचस्पी बारात आगमन में रहती थी. नाचते झूमते बारातियों की रौनक से गली ही नहीं, पूरा शहर झूम उठता था. बारात पहुंचने से पहले क्या मजाल, कि खाना शुरू हो जाए. पुराने संस्कारी लोग तो लड़की के विवाह में बान देने अवश्य जाते थे लेकिन वहां खाना नहीं खाते थे. उन दिनों लड़कियों को सांझी विरासत माना जाता था और बारात का स्वागत पूरे नगर का दायित्व. लेकिन परंपराओं और संस्कारों में बदलाव की बयार ने सब अस्त-व्यस्त कर दिया है.

70 - 80 के दशक में मध्यमवर्गीय परिवारों की शादियों को याद कीजिए. विवाह प्रबंधन की पूरी जिम्मेदारी घर परिवार और मित्र बंधु ही मिलकर उठाया करते थे. उन दिनों मैरिज पैलेस और इवेंट मैनेजमेंट कंपनीज तो थी नहीं, लिहाजा बारातों को स्कूल, धर्मशाला या किसी मंदिर में बने भवनों में ही ठहराया जाता था. गली में ही शामियाना लगाकर बारात स्वागत की सभी रस्में निभाई जाती थी. इस खातिरदारी में परिवार के मित्र, बंधु और मोहल्ले के लोग ही मिलजुल कर काम किया करते थे.

विवाह से लगभग 10 दिन पहले फर्रियां बनाने का काम शुरु होता. रंगीन कागज की तिकोनी फर्रियां बहुत खूबसूरत होती थी. बाजार में कटिंग की हुई फर्रियां मिलती थी जिन्हें लेई लगाकर मजबूत सूतली पर थोड़ी थोड़ी दूरी पर चिपका दिया जाता. फर्री बनाने का काम किसी अनुभवी की देखरेख में मोहल्ले के लड़के ही किया करते. शादी वाले घर और गली को फर्रियों को से सजा दिया जाता. फर्रियां संकेत चिन्ह थी कि यहां कोई मांगलिक उत्सव होने वाला है. आप कहेंगे विद्युत बल्ब की लड़ियां फिर कब लगती थी ! लड़ियों की सजावट तो शादी से एक या दो दिन पहले की जाती थी. विद्युत सजावट का यह खर्चा उठाना सबके वश की बात भी नहीं थी उन दिनों !

विवाह में टेंट से सामान लाना भी बड़ा काम होता था. इसके लिए गृह स्वामी द्वारा बाकायदा मोहल्ले के अनुभवी आदमी की ड्यूटी लगाई जाती जो मेरे जैसे दो तीन नौसिखिए लड़कों के साथ टेंट हाउस से सामान गिनवाकर लाता. विवाहोपरांत इस सामान को वापिस भेजने में ज्यादा परेशानी होती. बर्तनों को गिनने में दो-चार गिलास, कटोरी, प्लेट या जग का कम होना स्वाभाविक सी बात थी लेकिन उन्हें ढूंढने में खासा मशक्कत करनी पड़ती. यदि एक आध कुर्सी और गद्दे घट जाते तो गृह स्वामी द्वारा सेवादारों की खिंचाई भी कर दी जाती जिसका कोई बुरा माने तो मानता रहे. कई बार बर्तन और गद्दे मंदिरों और गुरुद्वारों से भी लाए जाते थे. यह चलन तो अभी भी कई जगह देखने को मिलता है.

बारात के खाने के लिए शामियाना लगाकर उसे सुसज्जित करने की जिम्मेदारी गली के लड़कों की ही होती. शामियाने के आगे लंबी गैलरी और प्रवेश द्वार बनाया जाता जिसकी विशेष सजावट की जाती थी. लकड़ी के बुरादे को अलग-अलग रंगों में भिगोकर एक मिश्रण तैयार किया जाता जो देखने में बड़ा शानदार होता. पारंपरिक चित्रकला शैली के जानकार उस बुरादे से प्रवेश द्वार और शामियाने तक जाने वाली गैलरी के भीतर रंगोली कला से ऐसी साज सज्जा करते कि बाराती भी प्रवेश करने से पहले उसका अवलोकन करते. खुले मन से सजावट करने वाले कलाकारों की भरपूर सराहना होती.

वेटर्स का चलन उन दिनों न के बराबर था. टेंट के भीतर झाड़ू लगाने से लेकर मेजपोश बिछाने तक का काम मित्र-बंधुओं द्वारा ही किया जाता था. सब्जियां लाने, सलाद काटने और प्लेटो में सजाने का काम भी गली के लड़के ही किया करते थे. यदि हलवाई आदेश करता तो दाल भी पिसवा कर लानी पड़ती. चूंकि खाने में उस समय तक बुफे सिस्टम नहीं आया था इसलिए बारातियों को कुर्सी मेजों पर बिठाकर ही पूरी मान मनुहार के साथ खाना खिलाया जाता था. खाना परोसने का काम भी मोहल्ले के जिम्मेदार लड़के और घर के रिश्तेदार ही किया करते थे. क्या मजाल आवभगत में कोई कमी रह जाए. दूल्हे और उसके दोस्तों के लिए अलग से टेबल लगाकर खास व्यवस्था होती थी जिसकी देखरेख स्वागत दल के विशेष लोग करते थे. आज यह स्थान वेटर्स के हेड द्वारा हड़प लिया गया है जो टिप के इंतजार में औपचारिकता को पहने रखता है.

आजकल तो विवाह समारोह शाम को शुरू होकर आधी रात तक निपट जाता है जबकि उस दौर में अगले दिन सुबह तक की खातिरदारी करवाने के बाद ही बारातें रवाना होती थी. स्वागत और सत्कार की परंपराएं विलुप्त होने से आज हम खुद को खाली सा महसूस करते हैं. मशीनी युग ने हमारी संवेदनाओं को औपचारिकताओं में बदल कर रख दिया है जिसका कोई समाधान नहीं है. गुजरे हुए वक्त को लाया नहीं जा सकता सिर्फ यादों में गुनगुनाया जा सकता है.
-रूंख

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