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फोर्ट स्कूल और भटनेर किले के रंग

पगडंडियों के दिन-9

'हे.....वो गया !'
'नहीं गया..... चल, ले एक ट्राई और सही.'
पत्थर पकड़ाते हुए मोहन सिंधी ने कहा.
इस बार पार्टी पक्की. क्यों भाई लोगों, ठीक है ?
'हां, लास्ट चांस है...'
अगर इस बार पत्थर किले के ऊपर नहीं पहुंचा तो हार मान लेना...'
'यार, भटूरे ठंडे हो रहे हैं...'

भटनेर दुर्ग ! 285 ई. में भाटी राजा भूपत द्वारा स्थापित राजपूताने का यह वही किला है जिसे 1398 ई. में क्रूर शासक तैमूरलंग ने जीता था. उसने अपनी पुस्तक 'तुजुक ए तैमूर' में इसे हिंदुस्तान का सबसे मजबूत दुर्ग बताया था और इतिहास गवाह है कि हम लोग इसी किले की प्राचीर पर पत्थर फेंकने की शर्तें लगाते हुए अपनी पढ़ाई कर रहे थे. इस ऐतिहासिक धरोहर की छाया में स्थित फोर्ट स्कूल से मेरे जैसे हजारों विद्यार्थियों ने हायर सेकेंडरी परीक्षा उत्तीर्ण की होगी. आज भी सीनियर सेकेंडरी स्तर तक के सैंकडों विद्यार्थी यहां अध्ययनरत हैं.

1987 की यादों का पिटारा खोलते हैं. इस फोर्ट स्कूल में जब आधी छुट्टी होती तो जंक्शन से आने वाले ज्यादातर विद्यार्थी किले के सामने खड़े हो जाते. रोज एक ही शर्त लगती. किले के ऊपर पत्थर फेंकना है ! शर्त लगाने वाला खुद अपनी मर्जी का पत्थर चुनकर चुनौती स्वीकार करने वाले को देता जो पूरी ताकत से उस पत्थर को किले की ऊंची प्राचीर के दूसरी पार फेंकने की कोशिश करता. ज्यादातर पत्थर दीवार के इस पार ही रह जाते लेकिन जब कोई इस स्पर्धा को जीत लेता तो हीरो बन जाता. हार जीत के इस मनोरंजन का अंत बड़ा सुखद होता जब दोस्तों की टोली बस स्टैंड पर स्थित जनता ढाबे के छोले भटूरों के साथ जीत की पार्टी का आनंद लेती. उन दिनों इस ढाबे पर छोले भटूरे की प्लेट ₹5 में आती थी जिसमें दो भटूरे मिला करते थे. वैसा अनूठा स्वाद आज तक कहीं नहीं मिला, पता नहीं क्यों !

हनुमानगढ़ जंक्शन में उन दिनों हायर सेकेंडरी स्कूल नहीं था लिहाजा सभी विद्यार्थियों को टाउन स्थित फोर्ट स्कूल में ही आना पड़ता. लड़कियों के लिए भी बालिका हायर सेकेंडरी स्कूल टाउन में ही था. निजी स्कूलों में पढ़ने वाले गिने-चुने बच्चे नेहरू मेमोरियल चिल्ड्रन स्कूल में जाते. फोर्ट स्कूल में कला, वाणिज्य और विज्ञान तीनों संकाय थे. वाणिज्य संकाय में ओम प्रकाश जी सुथार और नौरंगलाल जी पढ़ाया करते थे. नौरंगलाल जी लड़कों को 'बालक' कहकर संबोधित करते थे और मौके बेमौके ठुकाई करने से भी नहीं चूकते थे. मेरे मामाजी श्री अन्नाराम सारस्वत भी इसी विद्यालय में इंग्लिश के प्राध्यापक थे. विक्रम सिंह जी स्काउट मास्टर हुआ करते थे जिन के सानिध्य में हमने दो बड़े कैंप अटेंड किए थे. विद्यार्थी संख्या अधिक होने के कारण यह स्कूल दो पारियों में चला करता था. हम लोग सुबह की शिफ्ट में थे.

जंक्शन से टाउन स्थित फोर्ट स्कूल में सुबह 7: 15 बजे तक पहुंचने के दो ही माध्यम थे. पहला रेल्वे स्टेशन से 6:15 बजे चलने वाली सादुलपुर पैसेंजर ट्रेन और दूसरा रोडवेज डिपो से सुबह निकलने वाली लंबी दूरी की बसें. जंक्शन के अधिकांश विद्यार्थी ट्रेन को प्राथमिकता देते. कारण बड़ा साफ और स्पष्ट था. रेलवे घर की थी और विद्यार्थी घर के. फिर कैसा किराया ! बस दिक्कत इतनी थी कि स्कूल पहुंचने के लिए टाउन रेलवे स्टेशन से लगभग 3 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था. परंतु जब दोस्तों का साथ हो तो दूरी मायने नहीं रखती. हां कभी-कभी ट्रेन निकल जाने की स्थिति में रोडवेज डिपो आना पड़ता और बस ड्राइवरों की मिन्नतें करनी पड़ती. कुछ ड्राइवर विद्यार्थियों से परहेज करते जबकि कुछ सहयोग करने वाले होते. विद्यार्थियों की संख्या ज्यादा होने के कारण कई बार बस की छत पर ही बैठना पड़ता. मगर बस का फायदा यह होता कि यह फोर्ट स्कूल के पास में ही उतारती. बस की छत पर सवारी का आनंद लेने वालों में राधेश्याम सोनी, आनंद तिवाड़ी, संजय गुप्ता, संजीव जिंदल, विजय धूड़िया, सुबोध, सारस्वत, अब्दुल खालिक, सतनाम, गुरदीप मशाल, संतोख सिंह जैसे दोस्तों के नाम लिखना शुरू करूं तो.....!

स्कूल टाइम में बहुत बार ऐसा होता कि हम बंक मारकर भटनेर दुर्ग के अंदर चले जाते और दिन भर वहां घूमते रहते. दुर्ग में एक मंदिर और दो-तीन कुंओं के अलावा कुछ भी तो नहीं था. इन कुंओं के बारे में विद्यार्थियों की धारणा थी कि ये सुरंगेंं हैं जो भटनेर से भठिंडा और बीकानेर तक जाती हैं. इतिहास की जाने कितनी परतों को समेटे इस दुर्ग में हम कभी राजा और कभी प्रजा बनकर विचरण करते रहते. 52 बुर्जों वाले इस किले की पश्चिमी दीवार से घग्गर नदी का बहाव क्षेत्र दूर तक फैला हुआ दिखाई देता. इस नदी में पंजाब और हिमाचल की बारिश का पानी आता है जिसे स्थानीय भाषा में 'नाली' कहा जाता है. जब नाली उफान पर होती तो किले से बड़ा मनमोहक नजारा दिखाई देता. मैं अपने दोस्तों के साथ उस किशोरवय अवस्था में अक्सर सोचा करता कि इतना विशाल और मजबूत दुर्ग बिना किसी मशीनी सहायता के कैसे बना होगा. अब जिंदगी की ठोकरें खाने के बाद पता चला है कि कठिन और दुष्कर लगने वाले काम मनुष्य की दृढ़ इच्छाशक्ति के सामने सुगम हो जाते हैं.

एक और महत्वपूर्ण बात जो फोर्ट स्कूल की यादों के साथ जुड़ी हुई है. 1986 में पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था को 10+2 में बदल दिया गया था. उस समय सेकेंडरी परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले विद्यार्थियों के पास कॉलेज में जाने के लिए दो विकल्प थे. या तो वे बोर्ड की हायर सेकेंडरी परीक्षा पास करते या फिर महाविद्यालय में पीयूसी का पाठ्यक्रम उत्तीर्ण करते. इसी के अनुक्रम में राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा 1987 में हायर सेकेंडरी के अंतिम बैच की बोर्ड परीक्षा हुई थी जिसमें मैं भी शामिल था. उसके बाद 10+2 लागू होने के साथ ही यह व्यवस्था पूरी तरह बदल चुकी थी.

व्यवस्थाओं का बदलना प्रकृति का नियम है लेकिन स्मृतियों के ऊपर प्रकृति का वश नहीं चलता. जो बीत चुका है उसे सहेजने का काम मनुष्य को करना है. यदि आपके पास स्मृतियों का खजाना है तो यकीन मानिए आप दुनिया के सबसे अमीर आदमी हैं. यार, थोड़ा सा अमीर मैं भी हूं !
-रूंख

 

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