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Friday 20 January 2023

सनातन को सहेजने का आधार है संस्कृत

 


(विरासत संभालने का वक्त)

जब हम किसी भाषा को सहेजने और उसके उन्नयन की बात करते हैं तो सही मायने में उस वक्त हम एक सांस्कृतिक विरासत और मानवी सभ्यता को संरक्षित करने का महत्वपूर्ण काम कर रहे होते हैं। संस्कृति, जिसमें हमारे संस्कार सिमटे हैं, हमारा साहित्य रचा जाता है, हमारी कलाएं, हमारे गीत-संगीत पनपते हैं, हमारे लोकरंग और हमारा लोकजीवन रचता-बसता है, उस समग्र को पीढ़ी दर पीढ़ी अग्रसर करने का काम भाषा ही तो करती है।


इस मायने में जब देव भाषा संस्कृत की बात हो तो अर्थ और गहरे हो जाते हैं। एक ऐसी भाषा जिसमें सनातनी संस्कार पल्लवित हुए हों, जिसमें प्राचीनतम सभ्यताओं ने सांस ली हो, जिसे देवों, ऋषियों और मुनियों ने गाया हो, रामायण और महाभारत सरीखे अनूठे वैश्विक ग्रंथ रचे गए हों, उस भाषा का लोक चलन से बाहर होना एक दु:खद आश्चर्य है।

भाषाओं के मामले में प्राचीन भारत अत्यंत समृद्ध रहा है। यहां कमोबेश हर क्षेत्र, जाति और समुदाय की अपनी-अपनी भाषा और उसकी बोलियां रही हैं। विरासत स्वरूप इन भाषाओं की हमारे पास लाखों-लाख साहित्यिक पांडुलिपियां उपलब्ध है जो इस बात की साख भरती हैं कि यह भाषाई विविधता कोरी कपोत कल्पना नहीं है। भाषाओं और बोलियों का इतना विषद् भंडार होते हुए भी संस्कृत सहित अनेक समृद्ध भाषाओं का चलन से बाहर होना चिंतनीय है।

संस्कृत की बात करें तो कुछ विद्वान साथी इसकी वर्तमान दशा को भारतीय उपमहाद्वीप पर पिछले 2 हजार वर्षों में हुए मध्य एशियाई और यूरोपीय आक्रमणों से जोड़कर देखते हैं, जबकि यह एक पहलू भर है। तथ्य यह है कि नालंदा और तक्षशिला में सुदूरपश्चिमी देशों से आने वाले विद्यार्थियों ने न केवल संस्कृत में अध्ययन किया बल्कि उसे दूर-दूर तक प्रसारित करने में महती भूमिका निभाई। यदि सिर्फ बाह्य आक्रमण से संस्कृत का चलन कम होता तो हमारी द्रविड़ियन भाषाएं भी विलुप्त होने की कगार पर होती। मगर हम देखते हैं कि अन्य विदेशी भाषाओं की उपस्थिति के साथ दक्षिण की भाषाएं निरंतर उत्तरोत्तर प्रगति करती रही हैं।

दरअसल, किसी भाषा के विलुप्त होने में बहुत से कारक होते हैं। भौगोलिक उथल-पुथल ने टेथिस सागर को जब थार के रेगिस्तान में बदल दिया तो फिर भाषा का मुद्दा तो बहुत गौण है। संस्कृत के चलन से बाहर होने में बाह्य आक्रमणों के
साथ-साथ प्राकृतिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारकों को भी शामिल किया जाना जरूरी है। यह कटु सत्य है कि सामाजिक विसंगतियां भी भाषाओं को प्रभावित करती हैं और संस्कृत भी इससे अछूती नहीं रही। वर्तमान में उदासीन लोकचेतना और तथाकथित शिक्षाविदों की भाषाई अज्ञानता के चलते संस्कृत भाषा भारतीय जनमानस में अपना चलन खो चुकी है। बोलचाल की तो बात छोड़िए, साहित्य सृजन में भी संस्कृत पिछड़ गई है। जो भाषा कभी भारतीयता का प्रतीक रही हो, उसे खुद अपने देश में तृतीय भाषा का दर्जा मिलना अत्यंत दु:खद है।
उन विद्वजनों का धन्यवाद करना चाहिए जो भावी भारतीय पीढ़ियों के लिए इसे जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं।

यहां हंस के पूर्व संपादक राजेंद्र यादव की बात याद आती है । उनका मानना था कि जो भाषाएं सिर्फ संवेदना से जुड़ी हैं उनका भविष्य अच्छा नहीं है। भाषा की समृद्धि के लिए संवेदना के साथ-साथ उसे व्यवहार में उतारना भी जरूरी है। भारतीय संस्कृति और सनातन को यदि सहेजना है तो उसकी आधार भाषा संस्कृत को न सिर्फ संरक्षण देना होगा बल्कि उसके उन्नयन की बात भी करनी होगी। यह दायित्व सिर्फ सरकार का नहीं है बल्कि सभी जागरूक और विद्वान शिक्षाविदों का है जो संस्कृत की महत्ता को भारतीय जनमानस पर पुनः स्थापित करें। ब्रिटिश काल में स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा दिया गया नारा ,'वेदों की ओर लौटो' आज भी प्रासांगिक है । भारत जिस संक्रमण काल से गुजर रहा है, उस दौर में संस्कृत और उसकी विरासत एक पथ-प्रदर्शक के रूप में काम कर सकती है, बस इसे समझने की जरूरत है।

डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'
(भाषाविद् और वरिष्ठ साहित्यकार)

Wednesday 11 January 2023

बालमन की खूबसूरत अभिव्यक्ति 'झगड़ बिलौणो खाटी छा' के बहाने



(बाल साहित्य की पाठशाला-1)

बाल साहित्य सृजन कोई हंसी-खेल नहीं है कि जो हल्का-फुल्का मन में आए, लिख दिया जाए। वर्तमान दौर की अधिकांश बाल रचनाओं में कमोबेश ऐसी ही भावाभिव्यक्ति दिखती हैं जिनमें बच्चों को सिर्फ हंसाने या गुदगुदाने के उद्देश्य की प्रधानता रहती है। ज्यादा हुआ तो आदर्शवाद की चाशनी में लपेटकर साधारण गद्य या तुकबंदी को परोसना ही बाल साहित्य मान लिया गया है। यही कारण है कि ऐसा साहित्य बाल पाठकों के मन में उतर ही नहीं पाता।

कुछ रचनाकार मानते हैं कि बाल साहित्य रचने के लिए बच्चे जैसा मन होना चाहिए। इस कथन में कितनी सत्यता है, यह अपने-अपने अनुभव की बात है। मेरा समझ में तो बाल रचनाओं के लिए बाल मन से कहीं अधिक महत्वपूर्ण रचनाकार की गहन दृष्टि है जो अपनी क्षमता से तात्कालिक भावों को शब्दों में बांधने की कला जानती है। सृजन का यह नियम सार्वभौमिक है।


हकीकत में बाल साहित्य साधकों को अपने रचाव में कहीं अधिक सजग होना पड़ता है। अक्सर देखा जाता है कि लिखते समय बाल रचनाकारों के मन में शब्दों के चयन और संयोजन के साथ आदर्शवादी भावाभिव्यक्ति के विचार उमड़ते हैं। विचारों के इस महासागर में डूबने के बाद अधिकांश बाल साहित्यकार चाह कर नहीं उबर पाते। नतीजा यह होता है कि अधिकांश बाल रचनाएं परंपरागत रूप से 'मंचीय चुटकुला या आदर्शवादी सीख' बनकर रह जाती है। लेकिन जो रचनाकार इस वैचारिक महासागर को लांघने की क्षमता रखते हैं, उनका सृजन देर तक अपना प्रभाव बनाए रखता है और शब्द साधना की कसौटी पर खरा उतरता है। विश्व की हर भाषा में ऐसी अनेक बाल रचनाएं विद्यमान है जो इस बात की साख भरती हैं।

आज बानगी स्वरूप राजस्थानी लोक साहित्य के एक ऐसे ही बालगीत के माध्यम से विमर्श को आगे बढ़ाते हैंं। 'झगड़ बिलौणो खाटी छा' नामक यह प्रसिद्ध बालगीत न सिर्फ बालमन की सशक्त अभिव्यक्ति है बल्कि थार के संस्कारित परिवेश और विसंगतियों के प्रति उपजे बाल आक्रोश को भी उजागर करता है। इस लोकगीत में बाल मनोविज्ञान बड़ी खूबसूरती के साथ गूंथा गया है।

जल संकट के बावजूद घी-दूध की उपलब्धता थार के रेगिस्तान का अजूबा है। यहां का मानवी अपने पशुधन को परिवार का सदस्य मानकर जीवन यापन करता है। ऐसे ही परिवार का एक बच्चा अपने घर में सुबह दही बिलौने के दृश्य को देखता है, उसके मन में जो भाव उठते हैं, उन्हें रचनाकार ने अपनी गहन दृष्टि से साधते हुए इस गीत के मुखड़े में पिरोया है-

झगड़ बिलौणो खाटी छा
झरड़-झरड़ झर चालै झेरणो
मथै चूंटियो मेरी मा...


थार के लोकगीतों की खास बात यह है कि वहां भाषाई सौन्दर्य का विशेष ध्यान रखा गया है । साधारण शब्दों से सजे इस गीत के मुखड़े में भी 'बैण सगाई' अलंकार देखा जा सकता है।

गीत के पहले अंतरे में बच्चा अपनी व्यस्तता के साथ-साथ उसके प्रति हो रहे बाल अन्याय को उजागर करता है। उसकी शिकायत का अंदाज भी किसी बड़े होते बच्चे की तरह है। वह कहता है, भाग्यवानों के बच्चे तो मक्खन के लौंदे (चूंटियो) चाट रहे हैं और मुझे सिर्फ दही खाने को कहा जा रहा है। जीवन की विसंगतियों को बाल रचनाओं में व्यक्त कर पाना ही इस गीत की खूबसूरती है। देखिए जरा-

उठ तड़कै म्हूं रोही जावूं
दिनभर गा अर भैंस चरावूं
सिंझ्या पड़ियां घर नै आवूं
लूखी आली रोटी खावूं
भागी रा टाबरिया चाटै चूंटियो
मन्नै कैवै दहियो खा
मथै चूंटियो मेरी मा...

दूसरे अंतरे में वह अपनी मां के प्रति समर्पण भाव रखते हुए उसके हर आदेश को पालता है । लेकिन यहां भी वह अपने मन की बात कहने से नहीं चूकता। जब मां दही मथने के बाद बिलोने में से घी का लोंदा तो रसोई के अंदर ले जाती है और उसे सिर्फ थोड़ा सा फिदड़का मिलता है। ऐसे में उसके गुस्से को महसूस कीजिए-

मा रो कैयो म्हूं कदी ना टाळूं
उठ झांझरियै दही नै ठारूं
बैठ्यो बैठ्यो बिन्नै रूखाळूं
आवै बिलड़ी तो चूंपी मारूं
घी रो लोधो माऊ मां ले जावै
कोरो फिदड़को देवै मन्नै ल्या
मथै चूंटियो मेरी मा...


बचपन में पालतू पशुओं के प्रति स्नेह और अपनेपन का भाव स्वाभाविक है। उम्र बढ़ने के साथ मनुष्य अपनी व्यस्तता के चलते ऐसे प्राकृतिक संबंधों से स्वत: ही दूर चला जाता है। इस परमानंद की अभिव्यक्ति गीत के तीसरे अंतरे में गूंथी गई है। इतना होने के बावजूद जब बच्चे के हिस्से का दूध कोई और पी जाता है तो बालमन विद्रोह करने पर उतारू हो जाता है। अंतरा देखिए-

गोरी गा नै गुवार खुवावूं
खाज करूं म्हूं हाथ फिरावूं
छोटै मूमलियै नै गळै लगावूं
दे पुचकारी लाड लडावूं
दूध गटागट पीवै दूसरा
जद हो जावै मेरी भ्यां
मथै चूंटियो मेरी मा...


आदर्शवादी सृजन से इतर दृष्टि रखने वाला यह गीत बाल साहित्यकारों के लिए एक प्रेरणा स्रोत हो सकता है बशर्ते उनमें सीखने की ललक बाकी हो।
-रूंख

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