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Friday, 4 July 2025

देश, काल और समाज की चिंताओं का नवबोध कराती कहानियां

 

(पुस्तक समीक्षा)

राजस्थानी भाषा के आधुनिक कथाकारों में मदन गोपाल लढ़ा एक भरोसे का नाम है। मानवीय संबंधों में पसरी संवेदनाओं को लेकर वे अपने भाषायी कौशल और शिल्प से खूबसूरत कहानियां रचते हैं।  इन दिनों उनका नवप्रकाशित राजस्थानी कहानी संग्रह 'बीज, बूंटो अर चियां' चर्चा में है। बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित इस संग्रह में पन्द्रह कहानियां हैं जो अपने नवीन कथ्य और कहन शैली के चलते पाठकों पर खासा प्रभाव छोड़ती है। इन कहानियों को आधुनिक राजस्थानी की प्रतिनिधि कहानियों के रूप में देखा जा सकता है। 


कहानी साहित्य की सबसे लोकप्रिय विधा है। एक कहानीकार अपने कथानक के किरदारों को पल-प्रतिपल जीता है, उनकी संवेदनाओं को महसूस करता है तभी एक सुघड़ कहानी का जन्म होता है। शिद्दत से लिखी गई कहानी की खूबसूरती यही होती है कि वह गाहे-बगाहे खुद को पढ़वा लेने की क्षमता रखती है। बिना किसी गुम्फित कथानक और शाब्दिक चाशनी के भी कहानी कही जा सकती है, बशर्ते कथाकार में कहन क्षमता हो। ऐसी ही कहानियां लढ़ा के इस संग्रह में देखने को मिलती है। 


संग्रह की पहली कहानी 'सिल्ली-सिल्ली औंदी ए हवा' का कथ्य पाठक के अंतर्मन को झकझोर देता है। यह कहानी कई भारतीय भाषाओं में अनूदित भी हो चुकी है। कोरोनाकाल के दौरान मानवीय मूल्यों की गिरावट  'देस बिराना' कहानी में  देखी जा सकती है जहां कथा का नायक अपने पड़ोसियों के बदले व्यवहार से दु:खी होकर अपने मकान की बिकवाली निकाल देता है। संग्रह की  शीर्षक कहानी 'बीज, बूंटो अर चियां' स्त्री पुरुष के मध्य प्रेम के आधुनिक मनोभावों को तीन दृश्यों में खूबसूरती से प्रस्तुत करती है। इसी प्रकार 'तीजी आंख' कहानी में दूसरे के अंतर्मन को समझने वाला विषय लिया गया है वहीं 'सनेपी' कहानी अंधकार में डूबते मानवीय संबंधों के बीच रोशनी की एक किरण दिखाती है। यही आस्था, उम्मीद और विश्वास इन कहानियों की खूबसूरती है। 


पुस्तक की छपाई और साज सज्जा आकर्षक है। राजस्थानी के पाठकों के लिए यह एक पठनीय कहानी संग्रह कहा जा सकता है।


समीक्षक : डॉ हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'


किताब : बीज, बूंटो अर चियां, विधा : कहानी, प्रथम संस्करण : 2025, प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर

जिण री खावो बाजरी, उण री भरो हाजरी !

रूंख भायला
राजी राखै रामजी ! कैबत है, ‘जिण री खावै बाजरी, उण री भरै हाजरी’, बातड़ी घणी अमोलक है, जिण ठौड़ आपरी पेट ल्याड़ी होवै, आपरो रोटी रूजगार होवै, बठै हाजरी भरणी ई चाइजै। अठै हाजरी रो मतलब है, उण जिग्यां री माटी, सैंस्कार अर मायड़ भासा सारू आपरै हियै में माण तो होवणो ई चाइजै, आपनै तो उण संस्कृति में रचण बसण सारू बठै री भासा अर सैंस्कार ई सीखणा ई चाइजै। और पछै बाजरी अर हाजरी रो सगपण ई के !  

‘हेत री हथाई’ में आज आपां इणी बंतळ नै आगै बधावां। महाराष्ट्र में अबार हिंदी भासा री अनिवार्यता नै लेय’र लोग खासा रिसाणां हो रैया है, बान्नै लागै कै इण सूं बां री मायड़ भासा मराठी री मठोठ मांदी पड़सी। सोसियल मीडिया पर अेक विडियो वायरल है जिण में कीं मराठी लोग अेक राजस्थानी मिनख सूं थापामुक्की कर रैया है, उण नै मराठी बोलण सारू धमकावता दिख रैया है। थापामुक्की कदेई चोखी कोनी पण इण थापामुक्की रै मूळ में ‘बाजरी अर हाजरी’ रै अलावा कीं नीं है। हिंदी रा हिमायती अर राष्ट्रवाद री बात करणियां नै बात अपरोगी लाग सकै पण जे म्हारलो भाइड़ो हिंदी री ठौड़ राजस्थानी में इत्तो ई कैय देवतो, ‘भाईजी ! थे बोलण रो कैवो हो, म्हूं तो दूजां रै मूंडै ई मराठी बुला देस्यूं, का पछै म्हैं मराठी सीख रैयो हूं तो गदीड़ तंई बात जावती ई कोनी !’ अेक दूहो चेतै आवै-

अन्न भखै जिण देस रो, भासा उणरी बोल 

मायड़ भासा रै थकां, पर  भासा ना  बोल

जिका प्रवासी देस विदेस में बस रैया है, बान्नै इण घटना सूं कीं सीख लेवणी चाइजै, कुटीज्यां ई चेतो तो आवै, कै लोग आपरी भासा सारू कित्ता सजग है।


आप कैयस्यो- ‘‘ना ओ, ओ भासाई विरोध राजनीति सूं जुड़्यो है, अेक खास पारटी रा उछांछला लोग रोळोरप्पो कर रैया है !’ करता होसी, पण साची बात आ कै आपरी भासा नै लेय’र बठै रो मूळ बासिंदो खासा सावचेत है। जणाई बठै री सरकार हिंदी री अनिवार्यता सूं फटदणी सूं लारै सिरकगी।

आ मराठी भासा री ताकत है जिकी बठै रै रगत में रळी बसी है, लोग आपरी भासा सारू मरण मारण नै उतारू है।


आपणी राजस्थानी री बात करां तो......! जावण द्यो के पड़्यो है, आपां तो घर में बोलता ई सकां, बस पूगतै हिंदी छांटां अर टाबरां नै अंगरेजी बोलण री सीख देवां। कदास आपां नै हिंदी अर अंगरेजी बोलणै में ‘माॅडर्नटी’ री फील आवै। आप कैयस्यो, ‘आ के बात भाईजी ! राजस्थानी तो  बोलां तो ई हां !’


कोनी बोलो लाडी ! दफ्तरां, थाणां, कचेड़्यां में सरकारू अेळ’कारां सामीं बोलतां तो आपरी लालीबाई पलटो मार’र हिंदी में लपलप करै, आपनै तो संको आवै कै कठैई अधिकारी आप नै राजस्थानी बोलतां देख गंवार अर गांवड़ियो नीं समझ लेवै। अफसरां सामीं ‘ऐसे.... वैसे....’ करती बेळा आप नै चेतो नीं रैवै कै बात नै ‘इयां अर बियां’ भी कैयो जा सकै। अरे डेढ स्याणो !  आपरी भासा बोलणो गंवारपणो नीं होवै, मिनख री स्याणप है आ तो। फेर राजस्थान में राजस्थानी नीं तो पछै गोवा में तो बोलण सूं रैया !

 

साची बात तो आ, कै देस री आजादी रै पछै राजनीति करणिया कीं चातर लोगड़ां अेक सुनियोजित ढंग सूं आपां री भासा नै मारणै में कसर नीं राखी, अेक सबळी अर सुतंतर भासा नै हिंदी री बोली बतावता नीं संक्यां बै। अर मजै री बात भासा रै पेटै नींद में सूतै मिनखां रै प्रदेस राजस्थान में बांरी  साजिस कामयाब होगी। आज घड़ी बै लोग राजस्थानी री मानता रो विरोध ओ कैय’र करै, कै इससे हिंदी कमजोर होगी। बान्नै ठाह ई कोनी कै हिंदी रा प्रख्यात आलोचक नामवरसिंह जिस्या विद्वान कैयग्या है, ‘जिन राजस्थानियों ने हिंदी को उत्पन्न किया वे हिंदी के विरोधी कैसे हो सकते हैं।’ 


लैरलै सत्तर बरसां में भासा रै पेटै चालतै इण ओछै राजनीतिक माहौल में आपणै साथै तो आ बणी कै-  


बुद्ध बिसर्या बिदवान, बायरियो अंवळो भयो

मायड़ वाळो मान भोळा भाई भूलग्या

सीख खड़्यां ई सांझ मोथा मिल्या मिलायदी

बजी मावड़ी बांझ, फरजंद मूंछ्यांळा फिरै 


हर भासा री आपरी ठसक, आपरी मठोठ होवै पण जित्ती सोरपाई सूं आपरी मायड़ भासा में कोई बात कैयी जा सकै, बा दूजी किणी भासा में नीं हो सकै।  भासा मिनख नै भौतिक जगत सूं जोड़ै इणी कारण सूं आखै जगत में भासा रो जलम भौम अर जलम देवणआळी मा दंई माण होवै। बस पूगतां आप दुनिया री जित्ती भासवां सीख सको, सीखो। इण में बड़ाई है आपरी, विद्वता है, पण जे आपरी मायड़ भासा रो माण भूलग्या तो आप सूं ढफोळ कुण ! सुणता जावो-


निज भासा स्यूं अणमणा, पर भासा स्यूं  प्रीत

इसड़ै नुगरां री करै, कुण जग में  परतीत

का पछै ओ सुणल्यो-


किण  मायड़  रो पूत है, भासा करै पिछाण 

बोली  बोलै  ओपरी,  गोद  लियोड़ो  जाण


सेठिया जी रै अेक दूहै में आज री हथाई रो सार है-

 

‘भरो सांग मनभावता पण ल्यो आ थे मांड

जिका  भेस  भासा  तजै बान्नै कैवै  भांड’


तो भांड ना बणो, आपरै देस में, आपरै लोगां बिच्चाळै अर घर परिवार में आपरी भासा बोलो, मा रै होवता थकां माई मा क्यूं लावणी !!


बाकी बातां आगली हथाई में। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बस्सो....।

     -रूंख भायला


Monday, 19 May 2025

शीतल जलसेवा के माध्यम से दुनिया संवार रहे हैं नागरमल

 

(मानस के राजहंस)

शेख सादी ने कहा है, "इससे पहले कि दुनिया तुम्हें मुर्दा कहे, नेकी कर जाओ !" समाज सेवा के लिए कतई जरूरी नहीं है कि आप कोई बड़ा काम करें। मामूली से दिखने वाले कई ऐसे काम है जिन्हें आप शिद्दत से करें तब भी यह दुनिया सुंदर बन सकती है। आपके काम से किसी को राहत मिले इससे बेहतर और क्या ! 




ऐसा ही एक काम है गर्मी के दिनों में शीतल जल सेवा का। राजस्थान में इन दिनों गर्मी का प्रकोप जबरदस्त है। दिन का तापमान लगभग 45 से 50 डिग्री के करीब घूम रहा है। रेलगाड़ियों, बसों और दूर दराज के गांव से बाजार में आने वाले लोगों के लिए भट्टी सा दहकता यह मौसम किसी यातना से काम नहीं है। 


इस भयंकर गर्मी में  प्यासे लोगों को पानी पिलाने का महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं नागरमल खटीक। सूरतगढ़ में आठ महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थानों पर नागरमल द्वारा शीतल जल सेवा का प्रकल्प चलाया जा रहा है जहां प्रतिदिन हजारों की संख्या में राहगीरों को ठंडा पानी मिलता है। जन सहयोग से चलने वाली यह शीतल जल सेवा लंबे समय से रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, इंदिरा सर्किल, बड़ोपल बस स्टैंड आदि स्थानों पर निरंतर जारी है। सोमवार को भरी दुपहरी में रेलवे स्टेशन पर जल सेवा कर रहे नागरमल ने बताया कि इस प्रकल्प में 20 लीटर वाले लगभग 250 कैंपर प्रतिदिन लग जाते हैं। रेल गाड़ियों की सामान्य श्रेणी में यात्रा करने वाले लोगों के लिए यह सेवा एक वरदान साबित हो रही है। पसीने से तरबतर हुए नागरमल खटीक का जोश देखते ही बनता है जब उनके स्टाल पर पानी पीने वाले लोगों का हुजूम सा उमड़  पड़ता है। खाली कैंपर को दोबारा ठंडे पानी से भरते हुए नागरमल कहते हैं कि पेट पालने के लिए काम तो बहुत किया लेकिन मन को सुकून देने वाला काम तो अब ही किया है। ऐसे लोग मानस के राजहंस की श्रेणी में आते हैं जिनका काम दुनिया को और बेहतर बनाना है सलाम मेरे दोस्त, नागरमल खटीक लगे रहो ! 





मनमौजी स्वभाव के हैं नागरमल !

पूर्व में कबाड़ का काम करने वाले नागरमल मनमौजी स्वभाव के हैं। जिस काम में जुट जाते हैं उसे बड़ी लगन से करते हैं। उन्हें राजस्थान की भौगोलिक अवस्थिति की अद्भुत जानकारी है। वे प्रदेश के एक-एक जिले का क्षेत्रफल और उसकी सीमा का विस्तार मुखजबानी बता सकते हैं। इसके पीछे की कहानी भी बड़ी रोचक है, नागरमल ने लंबे समय से राजस्थान के समग्र विकास हेतु मरूप्रदेश बनाने की मुहिम चला रखी है। उनका मानना है कि छोटे राज्यों का विकास अपेक्षाकृत बेहतर होता है। थार के रेगिस्तान और अरावली पर्वत श्रृंखला के पश्चिमी भूभाग को जोड़कर मरूप्रदेश बनाया जा सकता है। इस अंचल की भाषा, खान-पान, वेशभूषा, और संस्कृति अरावली के पूर्वी पूर्वी प्रदेश से पूरी तरह भिन्न है।

उनके मरूप्रदेश की परिकल्पना से असहमति हो सकती है,  पक्ष विपक्ष में  तर्क दिए जा सकते हैं लेकिन फिर भी उसकी महत्ता से इनकार नहीं किया जा सकता।

Tuesday, 29 April 2025

सोनी बने जननायक, संकल्प, संघर्ष और समर्पण का हुआ सम्मान

 

भाजपा नेता राजकुमार सोनी फोकस भारत, जयपुर के कांक्लेव  डायनामिक लीडर ऑफ राजस्थान में  "जननायक" चुने गए हैं। 

जयपुर, 30 अप्रेल। भाजपा के प्रखर वक्ता और दबंग कार्यकर्ता के रूप में पहचान रखने वाले राजकुमार सोनी, श्रीगंगानगर को  40 साल से जनसंघर्ष की आवाज बुलंद करने के लिए  और भाजपा के समर्पित कार्यकर्ता के रूप में पार्टी के अनेक पदों पर शानदार परफॉर्मेंस दिए जाने को लेकर फोकस भारत ने डायनमिक लीडर ऑफ राजस्थान "जननायक" चुना है। उन्होंने इस सम्मान को जमीन से जुड़े भाजपा के प्रत्येक कार्यकर्ता को समर्पित किया है। 

सोमवार को जयपुर में संपन्न हुए डायनामिक लीडर ऑफ राजस्थान "जननायक कांक्लेव 2025" में भाजपा नेता राजकुमार सोनी श्रीगंगानगर को फोकस भारत की एडिटर इन चीफ़ कविता नरूका ने स्मृति चिन्ह और पौधा भेंट कर यह सम्मान भेंट किया। 

इस कॉन्क्लेव में बोलते हुए  सोनी ने  अपने जन संघर्षों,भारतीय जनता पार्टी को जिला में मजबूत करने के लिए किए कार्य,राम जन्मभूमि आंदोलन में सक्रिय भूमिका,श्री गंगानगर क्षेत्र में गंगनहर में आ रहे प्रदूषित जल,युवाओं में बढ़ नशाखोरी,महिला सुरक्षा,युवाओं में शिक्षा के साथ स्किल डेवलपमेंट जैसे अनेक विषयों पर विस्तार से चर्चा की। 

गौरतलब है कि लेखन कला और संस्कृति के प्रति समर्पित सोनी ने साहित्य,  चित्रकारिता और एक कार्टूनिस्ट के रूप में निरंतर अपना योगदान दिया है। उनके आलेख और बेबाक विचार समाचार पत्र पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होते रहते हैं।  राजनीति के एक ऐसे दौर में जब नेता लोग कपड़ों की तरह पार्टियां बदलते हैं वही सोनी ने एक सच्चे सिपाही की तरह पार्टी के हर मोर्चे पर डटे रहकर अपनी निष्ठा और प्रतिष्ठा को एक  मिसाल के रूप में प्रस्तुत किया है। भैरोंसिंह शेखावत, वसुंधरा राजे से लेकर भजन लाल शर्मा तक के राजनीतिक सफर में सोनी ने हमेशा पार्टी को मजबूत करने का काम किया है। उनके इस धमाकेदार इंटरव्यू की  पूरे राजस्थान में जबरदस्त चर्चा हो रही है। कॉटनसिटी लाइव की तरफ से  उन्हें इस उपलब्धि के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।

Saturday, 12 April 2025

राजस्थानी गीतों को सहेजने का अनूठा प्रयास है 'राजस्थानी गीत गंगा'

-सारंग और कच्छावा के समर्पित प्रयासों से बना गीतों का महत्वपूर्ण संकलन 

शब्दों की आंतरिक लय जब अनायास ही किसी कवि के होंठों पर  थिरकने लगती है तब गीत का जन्म होता है, और जब गीत जन्म लेता है तो मानवीय संवेदना अपने श्रेष्ठतम रूप में अभिव्यक्त होती है. संसार की हर भाषा में गीत रचे और गाए जाते रहे हैं. गीतों को साहित्यिक परंपरा का श्रृंगार कहा जा सकता है जो कंठों से कंठों तक की भावभरी यात्रा करते हैं. इस यात्रा में गीत सामाजिक संवेदनाओं और सांस्कृतिक विरासत को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ले जाने का महत्वपूर्ण काम करते हैं. इसीलिए कहा जाता है, गीतों में जीवन संगीत धड़कता है. 

डॉ. दिनेश कुमार जांगिड़ 'सारंग'
 राजस्थानी भाषा और गीत परम्परा की बात करें तो हमारे यहां लोकगीतों का अकूत खजाना भरा पड़ा है. डिंगल हो या पिंगल, या फिर लोक मानस में रचे बसे गीत, हमारी साहित्यिक परंपरा ही छंदबद्ध गीतों की रही है. लोक भजन हों या प्रेम और श्रृंगार के गीत, मांगलिक अवसर के फल़से, बधावे, सुख री घड़ी, ओल्यूं आदि के गीत हों या हरजस, राजस्थान के हर अंचल में गीतों की एक सशक्त परंपरा विद्यमान है. आधुनिक राजस्थानी में भी इस परंपरा का निर्वहन  वाले अनेक गीतकार हुए हैं जिन्होंने  राजस्थानी गीतों में अपनी अलग पहचान बनाई. इन गीतकारों में प्रमुख रूप से भरत व्यास, कन्हैयालाल सेठिया, रेवतदान चारण, गजानन वर्मा, मनुज देपावत, सत्येन जोशी, कल्याण सिंह राजावत, कानदान कल्पित, मोहम्मद सदीक, रघुराज सिंह हाडा, भंवर जी भंवर, शक्तिदान कविया आदि को शामिल किया जा सकता है. इन गीतकारों ने अपने गीतों के माध्यम से राजस्थानी भाषा की मिठास को जन-जन तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण काम किया. 

डॉ. घनश्याम नाथ कच्छावा
देखा जाए तो मातृभाषा का ऋण हर व्यक्ति पर, हर समाज पर होता है. यह मातृभाषा ही है जो मनुष्य को भौतिक जगत से जोड़ती है, उसे अभिव्यक्त होने का सशक्त माध्यम प्रदान करती है. उस मातृभाषा के प्रति आस्था और समर्पण का भाव ही आदमी में आदमी होने की पहचान कराता है. यह भी कटु सत्य है कि अधिकांश व्यक्ति अपनी भाषा और संस्कृति को लेकर अधिक संवेदनशील नहीं होते क्योंकि उनके लिए रोजी-रोटी से जुड़े अनेक मसले अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं. फिर  बाजारवाद और प्रगतिशीलता के दौर में संवेदना और अहसास जैसे शब्द भी क्षणिक हो चले हैं. ऐसे में यदि कोई भाषा और सांस्कृतिक विरासत को सहजने की दिशा में ठोस प्रयास करे तो उसकी पीठ थपथपाई जानी चाहिए. 

आधुनिक राजस्थानी भाषा के लोकप्रिय गीतों का संकलन कर ऐसा ही एक ठोस प्रयास किया है डॉ. दिनेश कुमार जांगिड़ 'सारंग' और डॉ. घनश्याम नाथ कच्छावा ने. नवचेतना संस्थान, जयपुर की ओर से 'सारंग' और  कच्छावा के संयुक्त संपादन में एक महत्वपूर्ण पुस्तक 'राजस्थानी गीत गंगा' प्रकाशित हुई है. शब्द साधक और बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ.सारंग भारतीय प्रशासनिक सेवा में कार्यरत है तो वहीं सुजानगढ़ के साहित्य मनीषी और विधिवेत्ता डॉ. कच्छावा राजस्थानी साहित्य सृजन में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं.  इन संपादक द्वय ने राजस्थानी गीतों की एक अनूठी और उपयोगी संचयन कल्पना को मूर्त रूप देकर महताऊ काम किया है. 

इस संकलन में राजस्थानी भाषा के 25 प्रमुख गीतकारों के चुनिंदा प्रतिनिधि गीत हैं जिनकी खुशबू प्रदेश में ही नहीं अपितु देश-विदेश में बसे राजस्थानियों के दिलों तक महकती है. संकलन की खास बात यह है कि गीतों के साथ गीतकारों का  संक्षिप्त परिचय भी दिया गया है. पुस्तक में मारवाड़ी, मेवाड़ी, हाड़ौती, ढूंढ़ाड़ी और शेखावाटी के गीतों का समान रूप से संचयन होना यह दर्शाता है कि संपादक द्वय ने अपने कर्तव्य का बखूबी निर्वहन किया है. एक ऐसे दौर में, जब राजनीति प्रेरित कुछ स्वार्थी लोग 'कुण सी राजस्थानी' का सवाल उठाते हैं तो उसका जवाब इस पुस्तक में संकलित राजस्थान के हर अंचल के गीतों में खोजा जा सकता है. भाषायी एकरूपता की दिशा में भी संपादकों द्वारा सराहनीय काम किया गया है. 

पुस्तक में बॉलीवुड के प्रसिद्ध गीतकार रहे पंडित इंद्र दाधीच और भरत व्यास की जानकारी राजस्थानी पाठकों के लिए संग्रहणीय बन पड़ी है. भरत व्यास का लोकप्रिय संवाद गीत 'थान्नै काजल़ियो बणाल्यूं...' आधुनिक राजस्थानी के प्रणय गीतों में खासा लोकप्रिय रहा है. वहीं कन्हैयालाल सेठिया का 'धरती धोरां री...', मेघराज मुकुल का 'सैनाणी', गजानन वर्मा का 'सुण दिखणादी बादल़ी', रघुराज सिंह हाडा का 'कतना मांडूं गीत', कानदान 'कल्पित' का 'सीखड़ली'", मोहम्मद सदीक भाटी का 'बाबा थारी बकरी बिदाम खावै रे' और कल्याण सिंह राजावत का बागां बिचै बेलड़ी' गीत भी इस संकलन को प्रभावी बनाते हैं. 

पुस्तक में राजस्थानी के अन्य लोकप्रिय गीतकारों मोहन मंडेला, माधव दरक, भंवर जी भंवर, कालूराम प्रजापति, ताऊ शेखावाटी, प्रेम जी प्रेम, इकराम राजस्थानी, दुर्गादानसिंह गौड़,  भागीरथ सिंह भाग्य और मुकुट मणिराज के  बेहद खूबसूरत गीतों को भी संजोया गया है. इनमें से अधिकांश गीत कवि सम्मेलनों, आकाशवाणी और दूरदर्शन पर अक्सर सुने जाते रहे हैं. 

संकलन के हर गीत में व्यक्त भाव का संक्षिप्त हिंदी वर्णन भी गीत के अंत में दिया गया है ताकि पढ़ने वाले को भावार्थ समझने में आसानी रहे. पुस्तक की भूमिका राजस्थानी के समर्थ रचनाकार सत्यदेव संवितेंद्र द्वारा लिखी गई है. पुस्तक की छपाई और साज सज्जा भी आकर्षक बन पड़ी है. 

सार रूप से यह कहा जा सकता है कि लोकप्रिय राजस्थानी गीतों का एक ही संकलन में उपलब्ध होना 'राजस्थानी गीत गंगा' की विशेषता कही जा सकती है.  डॉ. सारंग और डॉ. कच्छावा ने जिस समर्पण भाव और मेहनत के साथ यह संकलन तैयार किया है उससे उम्मीद तो यह भी बंधती है कि राजस्थानी के नए गीतकारों का संकलन भी यथाशीघ्र प्रकाश में आएगा.

- डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

Sunday, 30 March 2025

एक था इंदिरा सर्किल !


 - विकास का पुल लील गया थार का प्रवेश द्वार

- 40 साल पहले हुआ था चौक का नामकरण 

इतिहास लिखने के लिए अलग कलम नहीं होती, उसे तो सिर्फ घटनाएं और तथ्य चाहिए। घटना अच्छी हों या बुरी, इतिहास के पन्नों पर कोई फर्क नहीं पड़ता। सूरतगढ़ स्थित थार के प्रवेश द्वार 'इंदिरा सर्किल' का जमींदोज़ होना भी ऐसा ही एक तथ्य है जो देखते-देखते ही इतिहास बनने जा रहा है।  आने वाली पीढ़ियां बमुश्किल से यकीन कर पाएंगी कि कभी यहां शहर का सबसे व्यस्त चौक हुआ करता था।

सूरतगढ़। शहर की दक्षिणी पूर्वी दिशा में स्थित इंदिरा सर्किल, जिसे थार का प्रवेश द्वार माना जाता था, अब गुजरे जमाने की दास्तां बनने जा रहा है। अपनी आखिरी सांसे गिनता यह सर्किल विकास के पुल तले दफ़न होने की तैयारी में है। हालांकि शहर के इतिहास में यह पहली बार नहीं है। इससे पहले लाइनपार स्थित किसान नेता चौधरी चरण सिंह की स्मृति में बने चौक का भी ऐसा ही हश्र हुआ था। 

'घूमचक्कर' के नाम से प्रसिद्ध 'इंदिरा सर्किल' के इतिहास की बात करें तो लगभग 40 वर्ष पूर्व स्व. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की स्मृति में युवा कांग्रेस के कुछ उत्साही कार्यकर्ताओं ने यहां एक झंडा और फोटो लगाकर इस स्थल को इंदिरा सर्किल का नाम  दिया था। उन दिनों चौतरफा कांग्रेस राज हुआ करता था ऐसे में आपत्ति भी कौन करता ! बस, देखते ही देखते सूरतगढ़ के इतिहास में इंदिरा सर्किल ने अपनी जगह बना ली जहां से बीकानेर और श्रीगंगानगर के लिए सड़कें निकलती थी। ठीक सामने की तरफ जाल वाले बाबा रामदेव का प्राचीन मंदिर स्थित था। उन दिनों आबादी से ठीक बाहर धोरों के बीच स्थित यह सर्किल शहर के लिए प्रवेश द्वार का भी काम करता था। बीकानेर और श्रीगंगानगर से आने वाली बसें यहां विश्राम लिया करती थी जिसके चलते कुछ होटल और रेस्टोरेंट भी यहां खुल गए थे। तथ्य तो यह भी है कि इस चौक के पश्चिम दिशा की सैकड़ों बीघा सरकारी भूमि पर भूमाफियाओं ने कब्जे कर खूब चांदी काटी। अवैध कब्जों के इस खेल में सत्ता और प्रशासन की भागीदारी भी बराबर बनी रही। 

इस चौक के दुर्दिन तो 2014-15 से ही शुरू हो गए थे जब सत्ता और प्रशासन की शह के चलते बांगड़ ग्रुप की कंपनी 'श्री सीमेंट' ने यहां अपना झंडा और 'लोगो' रोप दिया था। कंपनी के इस कृत्य पर विपक्ष और जन विरोध के सुर भी उठे थे लेकिन उनमें वह ताकत नहीं थी जो किसी कॉरपोरेट की मनमानी को रोक सके। उस समय श्री सीमेंट प्रबंधन ने इंदिरा सर्किल के सौंदर्यकरण को लेकर बड़ी-बड़ी बातें की थी। दिखावटी तौर चौक की रेलिंग रिपेयर की गई और  कुछ पौधे भी लगाए गए  मगर सार-संभाल के अभाव में सब दम तोड़ गये। आलम यह बना कि सर्कल की साज़-सज्जा तो दूर, चौक के चारों तरफ घूमते टूटे हुए हाईवे से उड़ती धूल के गुबार चौतरफा छाने लगे। 

पिछले 7-8 साल से नेशनल हाईवे पर कमल  होटल से स्टेडियम तक फ्लाईऑवर का निर्माण जारी है। 'कानी के ब्याह में सौ कौतुक' जैसी कथा वाले इस ओवरब्रिज ने इंदिरा सर्किल के अस्तित्व को मिट्टी में मिला दिया है। जो थोड़े बहुत अवशेष बचे हुए हैं वह भी बड़ी जल्दी सूरतगढ़ के इतिहास में दफन होने वाले हैं। विकास की कुछ कीमत तो आखिर शहरवासियों को चुकानी ही पड़ेगी । ऐसे में गीतकार नीरज की पंक्तियां याद आती है- 

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से,

लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,

और हम खड़े खड़े बहार देखते रहे

कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे...! 

-डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

Thursday, 13 March 2025

बीकानेर थियेटर फेस्टिवल : कला और संस्कृति का कुंभ

 

मुझे लगता है मैं महाकुंभ न सही, कुंभ  स्नान तो कर ही आया हूं। 'बीकानेर थियेटर फेस्टिवल' में भाग लेने की अनुभूति किसी भागवत कथा के श्रवण समान ही सुखदायी रही, मन संवेदना और भावनाओं के सागर में डुबकियां लगता रहा। मेरे जैसे ढोल के लिए तो यह कुंभ स्नान ही हुआ ना ! 


दरअसल, 'बीकानेर थिएटर फेस्टिवल' रंगमंच, साहित्य और कला का समुच्चय भर नहीं है बल्कि यह दुनियाभर की सांस्कृतिक विरासत, नाट्य शास्त्र की परंपराओं और कलाओं को समसामयिक संदर्भों में बांचने का अद्भुत आयोजन है। यह फेस्टिवल पिछले 9 सालों से प्रतिवर्ष आयोजित हो रहा है। इस बार 8 मार्च को शुरू हुए पांच दिवसीय उत्सव में 20 से अधिक नाटकों का मंचन हुआ, नुक्कड़ नाटक खेले गए, नाट्य प्रशिक्षण कार्यशाला और रंग संवाद आयोजित किये गए । इन नाटकों का मंचन बीकानेर के टाउन हॉल, रविंद्र रंगमंच, और टीएन ऑडिटोरियम में हुआ। मेट्रोपोलिटन शहरों में होने वाली नाटक प्रस्तुतियों में अक्सर दर्शकों का अकाल रहता है, वहीं एशिया के सबसे बड़े गांव कहे जाने वाले बीकानेर में सभी हॉल दर्शकों से खचाखच भरे रहे। 


इस फेस्टिवल में देश भर के नाट्य मंडलों ने अपनी शानदार प्रस्तुतियां दी। इन प्रस्तुतियों में लखनऊ ग्रुप के नाटक 'भगवद्ज्जुकीयम',  जोरहाट असम की प्रस्तुति 'द रिलेशन', राष्ट्रीय कला मंदिर श्रीगंगानगर का नाटक 'ये लोग ये चूहे' और मुंबई ग्रुप का 'गोल्डन बाजार' अभिनय और कल की दृष्टि से बेहद शानदार रहे। दिल्ली ग्रुप के नुक्कड़ नाटक भी अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब रहे। वरिष्ठ रंग कर्मी और साहित्यिकार मधु आचार्य मानते हैं कि नाटक का प्रस्तुतीकरण ऋषि कर्म है। उनकी बात से सहमत हुआ जा सकता है क्योंकि नाटक में साहित्य, संगीत, नृत्य, वेशभूषा, चित्रकला, वास्तु शास्त्र सहित नवरस विद्यमान रहते हैं। इन सब विधाओं का सामूहिक निर्वहन अत्यंत दुष्कर है, इसके लिए पूर्ण समर्पण, निष्ठा और अनुशासन आवश्यक तत्व हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है की नाटक में रिटेक जैसा कुछ भी नहीं होता। अच्छा हो या बुरा, जो भी घटित होना है, दर्शकों के सामने होना है। शायद यही कारण है कि रंगमंच को समस्त कलाओं में सर्वोपरि माना जाता है। 

बीकानेर के इस उत्सव में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए विद्वजनों और समर्पित कलाकारों से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ। नए विचार और गहन चिंतन भरे संवाद दिल दिमाग में अब भी गूंज रहे हैं। सच कहूं तो शब्द और कला के कुशल चितरे भायले हरीश बी. शर्मा के स्नेहिल निमंत्रण से यह कुंभ यात्रा अनूठी बन पड़ी है। कला संगम  की इस यात्रा में श्री राजूराम बिजारणिया और श्रीमती आशा शर्मा सहयात्री बने, उन्होंने भी इस उत्सव का भरपूर आनंद लिया। हम सबकी तरफ से बीकानेर थिएटर फेस्टिवल के आयोजकों को अलेखूं बधाइयां और उत्तरोत्तर प्रगति की मंगल कामनाएं। 

थियेटर संग पुस्तक दीर्घा : हरीश बी शर्मा का नवाचार 

बीकानेर थियेटर फेस्टिवल में बिखरे  रंगों के बीच हरीश बी. शर्मा द्वारा किया गया पुस्तकीय नवाचार एक सराहनीय कदम है । गायत्री प्रकाशन और पारायण फाउंडेशन की इस पुस्तक-दीर्घा योजना में लोगों का खासा उत्साह रहा। हंसा गेस्ट हाउस में इस बार दीर्घा के साथ किताबें बैठकर पढ़ने के लिए भी इंतजाम किए गए ताकि पाठक यहां बैठकर भी अपनी पसंद की किताबें पढ़ सकें। इस योजना के तहत देशभर के लेखकों की पुस्तकें समान भाव से रखी जाती है ताकि पाठक को प्रकाशक के बैरियर और मनोपोली का नुकसान नहीं हो। दीर्घा में प्रदर्शित पुस्तकें अगर किसी पाठक को खरीदनी हो तो वो संबंधित लेखक या प्रकाशक से संपर्क कर सकता है। लेखक और पाठक के बीच सेतु के रूप में यह कार्य पूरी तरह से अव्यवसायिक है जिसका एकमात्र उद्देश्य पुस्तकों के प्रति पाठकों में संवेदना जागृत करना है जिससे वे किताब पढ़ने के मार्ग पर पुन: लौट सकें। 

-डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

Tuesday, 5 November 2024

भाषायी लालित्य लिए मन को छूनेवाली कहानियां


- मनोहर सिंह राठौड़

(पांख्यां लिख्या ओळमा की समीक्षा) राजस्थानी और हिंदी भाषा के वरिष्ठ साहित्यकार मनोहर सिंह जी राठौड़ का कला और संस्कृति से गहरा नाता है। लेखक होने के साथ-साथ वे एक कुशल चित्रकार और प्रतिबद्ध समीक्षक भी हैं। शेखावाटी की ठसक और जोधपुर की मिठास को एक साथ संजोने वाले राठौड़ साहब पिछले कई दिनों से स्वास्थ्य लाभ पर थे। उन्होंने 'पांख्यां लिख्या ओळमा' की कहानियों पर सारगर्भित टिप्पणी की है। लखदाद राठौड़ साहब, आपका आशीर्वाद सिर माथे ! आप मित्र लोग भी उनकी समीक्षा को बांचिए-

कहानीकार - डा. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

पुस्तक - पांख्यां लिख्या ओळमा [राजस्थानी ]


पिछले साल छपा यह कहानी संग्रह नौ कहानियों को 80 पेज में समेटे हुए है। राजस्थानी भाषा की मान्यता के जुझारु सिपाही डा.सारस्वत मूल रूप से कवि हैं लेकिन उन्होंने राजस्थानी भाषा में बहुत सुंदर कहानियां भी लिखी हैं। 

इस संग्रह की टाइटल कहानी '' पांख्यां लिख्या ओळमा '' मानवीय भावना से ओतप्रोत है। खाड़ी देश में कमाने गए व्यक्ति को उस समय की मजबूरी के हिसाब से उसकी पत्नी अनेक बार में रिकार्ड किए गए मनोभावों की कैसेट किसी के साथ भेजती है।वह कस्बे से निकलते ही बस में रह जाती है। लेखक को कैसेट मिलती है। पेंतीस बरस बीत गए। इस बीच कथा नायक की पत्नी की मृत्यु हो जाती है।लेखक द्वारा फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम पर सूचना भेजने से कथा नायक आकर कैसेट प्राप्त करता है। मृत पत्नी की आवाज पैंतीस बरस बाद कैसेट से सुनकर भावुक हो जाता है।कहानी का अंत सुखांत परिस्थिति उत्पन्न कर मानवीय कोमलतम भावों को बड़ी मार्मिकता से उजागर करता है।


इसी प्रकार पहली कहानी, '' संकै री सींव '' में प्राचीन परंपरा से बंधे छोटे से गांव की मानसिकता का अंकन सुंदर ढंग से किया है।गांव में परिवार नियोजन के सुरक्षा कवच की फैक्ट्री लगने की बात पर बवाल मचता है। गांव की औरतों को फैक्ट्री में काम मिलने व आर्थिक विकास की बात समझाने पर भी सहमति न होना फिर नाटकीय ढंग से महिला सरपंच द्वारा आगे आकर स्वीकृति देना, मजबूत कदम साबित होता है। गांव की मानसिकता, महिला सशक्तिकरण, विकास की दौड़, देश की योजना में सहयोगी बनना आदि कई मुद्दे सामने आते हैं।


' प्रीत रो परचो ' कहानी में आज की प्रमुख समस्या पेपर लीक को बड़े सशक्त ढंग से प्रस्तुत किया है। इसमें एक नवयुवक और नवयुवती के बीच पनपने वाले प्यार के कोमल तंतुओं को बहुत कोमलता, शालीनता से उजागर किया है।सारी यातनाएं झेलने के पश्चात उनका प्रेम विवाह नवयुवती के साहसिक कदम से आकार लेता है। संग्रह की सभी कहानियों को डा. सारस्वत ने राजस्थानी जन जीवन की गरिमा को बनाए रखते हुए पूरी संजीदगी, सावधानी से प्रस्तुत किया है।आज के कथानकों को बहुत खूबसूरती से आगे बढा कर मन को छूनेवाली कहानियां लिखी हैं।ये सभी कहानियां अपने आस-पास की लगती हैं।पात्रों का शानदार चयन, सटीक संवाद, सुंदर शैली और भाषा का लालित्य मन मोह लेता है। हनुमान गढ, श्री गंगानगर जिलों की भाषा का प्रभाव , कहावतों-मुहावरों के नगीने राजस्थानी भाषा के एक अनूठे तेवर को प्रस्तुत करते हैं। उस क्षेत्र की माटी की खुशबू सर्वत्र फैली हुई हे।


राजस्थान के सभी क्षेत्रों के पाठक इन कहानियों की भाषायी सरलता, शब्दों के चयन के कारण इनके मर्म तक आसानी से पहुंच सकते हैं। किसी भी कृति की पठनीयता उसे पाठकों के आकर्षण का केन्द्र बिंदु बनाती है। यह कथा संग्रह एक बार पढ़ना प्रारंभ करने पर पूरा पढे बिना हाथ से छूट नहीं सकेगी।

तीज तिंवारां बावड़ी...!

पुन्न बडेरां  रा  आछा, बरकत है बां  री रीतां  में तिंवार बणाया इस्या इस्या गाया जावै जका गीतां में राजी राखै रामजी ! आज बात आपणै तिंवारां री...

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