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Wednesday, 4 May 2022

लहना आज भी भटकता है सूबेदारनी की खातिर !


(गुलेरी की गलियों से गुजरते हुए...)


गुरू बाजार की उसी दही वाली गली से गुलेरी का लहना आज भी गुजरता है. यह और बात है कि उसे सूबेदारनी होरां तो दूर, उसकी परछाई तक नहीं दिखती. दिखते तो आजकल बंबू कार्ट वाले भी नहीं है जिनके शोर से कभी अमृतसर की गलियां गूंजा करती थी. 'बचके भा'जी, 'हटो बाशा', परां हट नीं करमांवालिए' , 'हट जा पुत्तांवालिए', नीं जीणजोगिए' जैसे जुमले सूबेदारनी की परछांई की तरह गुम हो चुके हैं.

सौ बरस से अधिक हुए, यूं कहिए 'बंबू काट' वाले जमाने में, अमृतसर के गुरू बाजार मोहल्ले की जिस गली में लहना कभी दही लेने आया करता था वो गली आज बाजार की चमक से गुलज़ार है. बाजार में दही है, लस्सी है, तरह-तरह की कुल्फियां और मिल्क बादाम है लेकिन उनमें 'कुड़माई' वाले प्रेम की मिठास कहां ! आंख वाले अंधों के इस भयावह दौर में, जबकि आंखों की नमी थार के जोहड़ों सी सूखती जा रही है, लहने का दर्द बांचने की फुर्सत किसके पास है ! ये दीगर बात है कि मुझ सरीखे ढफोल़ आज भी लस्सी के बहाने लहने की छोटी सी प्रेमकथा की खुशबोई अमृतसर की गलियों में तलाशने पहुंच ही जाते हैं.

मजे की बात यह है कि ऐसे सिरफिरों को 'द सीक्रेट' की परिकल्पना अनायास ही उसी गली में लहना सिंह से मिलवा ही देती है. इसे संयोग कहिए कि दो दिन पूर्व अमृतसर साहित्यिक यात्रा के दौरान मैं लहनासिंह की स्मृतियों को तलाशता उसी गली में जा पहुंचा जिसकी कल्पना चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' ने हिंदी साहित्य की सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ कहानी 'उसने कहा था' में की थी. जलियांवाला बाग के दर्द को समेटने वाली इन गलियों पर भले ही आधुनिकता का मुल्लम्मा चढ गया हो लेकिन  गुरू रामदास और गुरू अर्जुनदेव द्वारा स्थापित हरमंदिर साहब और गुरबाणी के प्रभाव से आज भी ये गलियां महकती हैं. आज भी यहां से गुजरने वाले हर आदमी का शीश गुरूओं की महिमा के समक्ष स्वत: ही नतमस्तक हो उठता है.


शाम के वक्त, उसी गली के नुक्कड़ की एक दुकान, जहां दही और लस्सी दोनों उपलब्ध थे, के बाहर पड़े मुड्ढे पर मैं बैठ गया. बाजार में खासा चहल-पहल थी. मैं 'उसने कहा था' की कड़ियों को जोड़ता हुआ, उस गली मे बिखरी गुलेरी की संवेदनाओं को फिर से सहेजने का यत्न कर रहा था. दही और बड़ियों की दुकान...चश्मा लगाए लाला... जूड़े पर सफेद रुमाल बांधे हुए लहना... वही बारह-तेरह साल की 'कुड़माई' वाली लड़की...धत...!
भावनाओं के उभार में दस मिनट बमुश्किल से गुजरे होंगे कि गली के दूसरे छोर पर मंथर गति से चलता हुआ एक शख्स दिखाई दिया. सिर पर पगड़ी, आंखों पर नज़र का चश्मा, कुर्ता पायजामा पहने यह आदमी जब थोड़ा नजदीक पहुंचा तो उसमें मुझे लहना सिंह का अक्स साफ-साफ दिखाई दिया जिसकी दाढ़ी सफेद पड़ चुकी थी. यकीनन वो मेरे बेतरतीब ख्यालों का लहना ही तो था. हाथ में स्टील की डोली लिए, मानो आज भी दही लेने जा रहा हो. तमाम दुनिया से बेखबर, अपनी नजरें झुकाए लहना हमेशा की तरह चुपचाप चल रहा था.

एकबारगी तो लगा कि मुझे उस शख्स से बात करनी चाहिए. फिर दिमाग में एक ख्याल उभरा, "नहीं, कहीं लहना दर्द के समंदर में डूबा प्रेम की प्रार्थना न बुदबुदा रहा हो." मैं जड़वत हुआ उसे सधे हुए कदमों से जाते हुए एकटक देखता रहा. फिर जैसे कोई ख्वाब हौले-हौले शून्य में विलीन हो गया हो...

दरअसल, किस्सों और यादों की खासियत यही होती है वे जे़हन में बार-बार उमड़ते हैं, ख्वाब बुनते हैं फिर पंखुड़ियों की तरह बिखर जाते हैं. हां, उनकी खुशबू हमें देर तक महकाती रहती है. 
-रूंख



Thursday, 7 April 2022

मनगत रै भतूळिया नै परोटणै रो नांव है 'अटकळ'


(डॉ. घनश्याम नाथ कच्छावा का राजस्थानी लघुकथा संग्रह 'अटकळ')


शिव बटालवी एक पंजाबी गजल मांय कैयो है कै-

जाच म्हानै आ गई गम खाण री
हौळै हौळै रो'र जी परचा'ण री
आछो होयो थे पराया होयग्या
चिंता निवड़ी आपनै अपणान री...


खरो सांच है कै मनगत रै भतूळिया नै परोटणै री अटकळ जिण खन्नै है फगत बो ही जियाजूण री घुळगांठ रा आंटा खोल सकै. सांवटणै री इणी कला सूं कथ अर कविता जलमैं जिकी आखी जगती नै सीख दिरावै. राजस्थानी रा चावा-ठावा लिखारा डॉ. घनश्यामनाथ कच्छावा मनगत री बात नै कथणै री सांगोपांग खिमता राखै. लघुकथावां री वांरी दूजी पोथी 'अटकळ' इण बात री साख भरै. 2006 मांय छपी कच्छावा री पैली आसूकथा पोथी 'ठूंठ' रो सिरजण ई राजस्थानी मांय खासो सराज्यो. इण रो सीधो कारण है कै वांरी कथावां री बुणगट जाबक ई ओपरी नीं लागै. सुजानगढ़ री धरती सूं सेठिया जी री सिरजण परम्परा नै रूखाळता घनश्याम जी खन्नै आपरो कथ्य अर रचाव है जिको वान्नै अळघी ठौड़ दिरावै. पाठक आं कथावां नै आपरै ओळै-दोळै सोधतां थकां रचाव रो आनंद लेवै अर लिखारै री दीठ साथै सगपण जोड़ै. 

एक कथा री बानगी देखो-

'ओ घर किण रो है ?'
'म्हारो!'- घरधणी बोल्यो।
'ओ खेत किण रो है ?'
म्हारो!'- किरसो बोल्यो।
'आ जमीं किण री है ?'
म्हारी!'- जमींदार बोल्यो।
'ओ धन किण रो है ?'
म्हारो!'- साहूकार बोल्यो।
'पछै, ओ देस किण रो है ?'
सगळा चुप व्हग्या.
देस रो कोई धणी धोरी नीं बण्यो.

राजस्थानी साहित मांय वात शैली री न्यारी निरवाळी ठौड़ है. जूनै बगत रो राजस्थानी लोक आसू कथा घड़नो खूब जाणतो पण बातां रै टमरकां रो वो टैम बायरियां रै साथै ई गयो परो. जणाई आधुनिक राजस्थानी साहित मांय इण विधा री पोथ्यां रो टोटो सो ई रैयो है. कदे कदास इक्की दुक्की पोथ्यां साम्ही तो आई, पण चित्त नीं चढ सकी. अबै 'अटकळ' बांच्यां पछै लागै है कै राजस्थानी मांय भी लघुकथा रै बिगसाव रा सांतरा सैनाण मण्ड रैया है. 

आस राखणी चाईजै कै कच्छावा जी री कलम सूं सांतरै रचाव री साहित धारा बैंवती रैयसी जिकी मानखै नै दिसा देंवतां थकां मिनखपणै रो बिगसाव करसी.

-डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

Tuesday, 5 April 2022

धरा की जिजीविषा है घग्घर


 
( डॉ. मदन गोपाल लढ़ा के कविता संग्रह 'सुनो घग्घर' को बांचते हुए...)


नदिया धीरे धीरे बहना
नदिया, घाट घाट से कहना
मीठी मीठी है मेरी धार
खारा खारा सारा संसार...

कवि प्रमोद तिवारी की यह कविता अनायास ही अवचेतन मस्तिष्क से उभरने लगती है जब आप घग्घर नदी को संबोधित कविताएं बांच रहे होते हैं.

'दरअसल, घग्घर केवल नदी भर नहीं है, धरा की जिजीविषा है.' यह कहना है थार के संवेदनशील रचनाकार डॉ मदन गोपाल लढ़ा का, जिनका ताजा कविता संग्रह 'सुनो घग्घर' इन दिनों चर्चा में है.

विश्व साहित्य में नदियों को संबोधित करते हुए पहले भी अनेक कविताएं लिखी गई हैं लेकिन जब थार का कोई कवि मन किसी नदी के नाम से अपनी अभिव्यक्ति दे तो उसे जानने की ललक उठना स्वाभाविक है. रेगिस्तान और नदी के संबंध को चुंबक के समान ध्रुवों की स्थिति से बेहतर समझा जा सकता है जो एक दूसरे से विकर्षित होते हैं. प्यास भर पानी को सहेजता थार नदी के स्वप्न अवश्य देखता है लेकिन उसकी किस्मत में हमेशा मृग मरीचिका ही रहती है.


.. इसे मेरी खुशकिस्मती ही कहिए कि मेरा बचपन घग्घर के बहाव क्षेत्र में गुजरा है जहां भूपत भाटी द्वारा स्थापित भटनेर के ऐतिहासिक किले पर पत्थर फेंकते हुए हमने कभी अठखेलियां की थी. हिमालय पर्वत श्रंखला की शिवालिक पहाड़ियों से निकलने वाली इस नदी के बहाव क्षेत्र को नाली के नाम से जाना जाता है. अखंड भारत में यह नदी पटियाला, अंबाला के रास्ते बीकानेर रियासत के गंगानगर जिले में प्रवेश करती थी. उन दिनों सरहद पार तक इस नदी का बहाव क्षेत्र था जो अब धीरे-धीरे लुप्त होने की कगार पर है.

लेकिन इस संग्रह में संकलित कविताओं में घग्गर एक बार फिर पुनर्जीवित हो उठी है. मरु मन के सपनों में हरदम बहती घग्गर इतिहास के साथ कदमताल करती नजर आती है. इन कविताओं की बानगी देखिए-

पानी के मिस 
लेकर जाती है सरहद पार 
कथाएं पुरखों की 
अतीत के उपन्यास 
निबंध गलतियों के 
और रिश्तो की कविताएं 
कितना कुछ कहना चाहती है कितना कुछ सुनना चाहती है 
सृजन धर्मी घग्गर !

कवि घग्गर को धीरज और संबल के प्रतीक रूप में देखता है. उसे नदी के लुप्त हुए स्वर में वर्तमान के साथ-साथ भूत और भविष्य के संकेत स्पष्ट नजर आते हैं. तभी तो वह कहता है-
जो कहना चाहते हो 
पुरखों से 
घग्गर को कहो 
वह पहुंचा देगी संदेश 
अनंत लोक में भी..

इस संग्रह की कविताओं को तीन भागों में बांटा गया है. 'बिसरी हुई तारीखें' फूल से झरी हुई पंखुड़ी और 'घर-बाहर' नामक इन खंडों में वर्तमान और विरासत को जोड़ने वाली रचनाएं हैं. कालीबंगा के चित्र शीर्षक से लिखी गई कविताएं भाव और शिल्प सौंदर्य की दृष्टि से बेहतरीन कही जा सकती हैं. 'दर्द की लिपि को बांचना/आसान कहां होता है भला..., या फिर, केवल घग्घर जानती है/ खुदाई में मिली काली चूड़ियों की पीर.. सरीखी पंक्तियां इन कविताओं को सार्थक वक्तव्य में बदल देती हैं.

राजस्थान साहित्य अकादमी के आर्थिक सहयोग और बोधि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह कविता संकलन संग्रहणीय है. उम्मीद की जानी चाहिए कि डॉ. लढ़ा की लेखनी से अभी और बेहतरीन कविताएं रची जानी है जो जीवन को और सुंदर बनाने का काम करेंगी.

- डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

Saturday, 2 April 2022

दक्षिण एशिया में भारत


( भारत के पड़ोसी देशों के साथ संबंधों पर डॉ. नंदकिशोर सोमानी का महत्वपूर्ण  संकलन)


दक्षिण एशिया दुनिया का वह मोहल्ला है जिस पर रूस और अमेरिका ही नहीं, अपितु यूरोप के दिग्गजों की भी हमेशा नजर लगी रहती है. इसी मोहल्ले में सदियों से भारत का परिवार आबाद है जिसने जीवन के जाने कितने रंग देखते हुए अपने अस्तित्व को बचाए रखा है. यह दीगर बात है कि भारत के कई बेटे अपने अलग घर बसा कर अब उसके परिवार के 'शरीके' बन चुके हैं. और 'शरीका' यानी कुटुंब के लोग, कैसा व्यवहार करते हैं, इसका अनुभव कमोबेश हर सामाजिक प्राणी को होता है. देशों के संदर्भ में इन्हीं अनुभवों की पड़ताल को अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के विश्लेषण का नाम दिया जाता है. 'दक्षिण एशिया में भारत' शीर्षक से प्रकाशित पुस्तक भी इन्हीं मुद्दों पर प्रकाश डालती है.

अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ डॉ. नंदकिशोर सोमानी के संपादन में प्रकाशित यह एक महत्वपूर्ण पुस्तक है जो विश्व मानचित्र पर इस भूभाग की वर्तमान परिस्थितियों का सारगर्भित विश्लेषण करती है. इस कृति में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञों द्वारा भारत के संदर्भ में लिखे गए आठ शानदार आलेख हैं. पड़ोसी मुल्कों से भारत के संबंधों की पड़ताल करते ये आलेख न सिर्फ शैक्षणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं बल्कि हिंद महासागर से हिमालय के बीच पसरे समूचे भारतीय उपमहाद्वीप को समझने के महत्वपूर्ण दस्तावेज बन पड़े हैं.

डॉ.अमित कुमार सिंह का भारत-पाक संबंधों पर लिखा गया 'अविश्वास और आशा की गाथा' एक बेहतरीन आलेख है जो भूटान के प्रधानमंत्री जिग्मी वाई. थिनले के संदेश से शुरू होता है. थिनले कहते हैं 'हर दक्षिण एशियाई जानता है कि घर में लड़ते झगड़ते रहने वाला कोई परिवार खुश नहीं रह सकता और झगड़ालू पड़ोसियों के रहते कोई समुदाय समृद्ध नहीं हो सकता.'

डॉ. दीपक कुमार पांडे अपने आलेख में भारत-बांग्लादेश संबंधों में गर्माहट तलाशते हैं तो वहीं विवेक ओझा भारत म्यांमार के समक्ष अवसर, चुनौतियों और समाधान पर बात करते हैं. डॉक्टर नीलम शर्मा अपने आलेख में भूटान के साथ भारत के संबंधों की विवेचना करती हैं और वैश्विक परिदृश्य में दोनों देशों की भूमिका पर प्रकाश डालती हैं.

भारत अफगानिस्तान के ताजा संबंधों पर बृजेश कुमार जोशी का लिखा आलेख इतिहास के पन्नों की परतें खोलता है. इसमें महाभारत कालीन गांधार जनपद और कभी अशोक के मगध साम्राज्य का हिस्सा रहे अफगानिस्तान की वर्तमान परिस्थितियों का बखूबी वर्णन किया गया है. पिछले दो दशक से भारत और नेपाल के रिश्ते कैसे हैं, इसे डॉ. राकेश कुमार मीणा के आलेख से जाना जा सकता है. लंबे समय तक तमिल और सिंहली संघर्ष से जूझता रहा श्रीलंका आज भारत के साथ कैसा व्यवहार रखना चाहता है इसकी पड़ताल डॉ. रितेश राय अपने आलेख में करते हैं.

संकलन के संपादक डॉ. सोमानी ने संपादन के साथ-साथ मालदीव के और भारत के रिश्ते पर एक सूक्ष्मावलोकन आलेख प्रस्तुत कर पुस्तक की महत्ता में इजाफा किया है.

सार रूप में कहा जा सकता है कि विकास प्रकाशन बीकानेर द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'दक्षिण एशिया में भारत' अंतरराष्ट्रीय संबंध और राजनीति विज्ञान की दृष्टि से महत्वपूर्ण संकलन है. डॉ. सोमानी साहित्य सृजन और पत्रकारिता से निरंतर जुड़े रहे हैं, इसका प्रभाव उनके शैक्षणिक और शोधपरक लेखन में स्पष्ट रूप से झलकता है. संकलन में विषयों का चयन और उनका बेहतर प्रस्तुतीकरण पाठकों को बांधे रखता है. उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले दिनों में पाठकों को डॉ. सोमानी के संपादन में ऐसी कई कृतियों के रसास्वादन का आनंद मिलेगा.

- डॉ.हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

Wednesday, 23 March 2022

उस मुड़़े हुए पन्ने से आगे...


(23 मार्च 1931)

भगत सिंह के नाम से ब्रिटिश सरकार ही नहीं डरती थी अपितु स्वतंत्र भारत की सरकारें भी आज तक  खौफ खा रही हैं.

इन सरकारों का डर देखिए कि भगतसिंह सरीखे राजनीतिक विचारक को देश के  विश्वविद्यालयी  पाठ्यक्रमों में पढ़ाया ही नहीं जाता. विडंबना यह है कि कुछ महाविद्यालयों के नाम तो शहीद-ए-आजम के नाम पर रख दिए गए हैं लेकिन वहां  के पाठ्यक्रमों में भी राजनीतिक विचारक के रूप में भगत सिंह को कोई स्थान नहीं मिल सका है.

 इसका सीधा सा कारण है शहीदे आजम का राजनीतिक चिंतन, जो हमें सिखाता है कि आजादी के मायने यह नहीं होते की सत्ता गोरे हाथों से काले हाथों में आ जाए. यह तो सत्ता का अंतरण हुआ. असली आजादी तो तब आएगी जब अन्न उपजाने वाला भूखा नहीं सोए, कपड़ा बुनने वाला नंगा न रहे और मकान बनाने वाला खुद बेघर न हो. दरअसल, भगतसिंह के विचारों से परम्परागत राजनीति की चूलें हिल सकती हैं और क्रांति का ज्वार उमड़ सकता है. इसी भय के कारण देश की सरकारें उनके नाम से कतराती हैं. हां, आप पार्टी ने जरूर एक नई शुरूआत की है.

मुझे मलाल यह है कि ब्रिटिश शासन की गुलामी करने वाले अनेक नौसिखियों को राजनीतिक विचारक बता कर न सिर्फ उनका महिमामंडन किया गया है बल्कि राजनीति विज्ञान के पाठ्यक्रमों में भी उन्हें बरसों से पढ़ाया जा रहा है. विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाने वाले प्रमुख भारतीय राजनीतिक विचारकों में मनु, कौटिल्य और शुक्र को छोड़ दें तो इन विचारकों में अधिकांशत: कांग्रेसी नेताओं के नाम शामिल हैं. इनमें भी सिर्फ तिलक को छोड़कर शेष सभी पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित थे या यूं कहा जा सकता है कि सभी 'इंग्लैंड रिटर्न' थे. जब से भाजपा सत्तासीन हुई है जनसंघ के कुछ नेताओं को भी राजनीतिक विचारक का दर्जा दिया गया है और उन्हें भी पाठ्यक्रमों में जोड़ दिया गया है.

सरकारें भले ही इन सबको पढ़ाएं लेकिन देश में भगतसिंह को राजनीतिक विचारक के रूप में न पढ़ाया जाना देश का दुर्भाग्य है. क्या क्रांति के डर से हम क्रांति-बीज बोना छोड़ दें ? 

नहीं, इसीलिए मैंने आज इक्कीस कॉलेज में राजनीति विज्ञान के विद्यार्थियों को राजनीतिक विचारक के रूप में भगत सिंह को पढ़ाया है. इंकलाब जिंदाबाद !

-डॉ. हरिमोहन सारस्वत  'रूंख'

Thursday, 17 March 2022

इक कुड़ी जीं दा नाम मुहब्बत, गुम है, गुम है, गुम है...


 (शिव बटालवी की 'लूणा' का राजस्थानी अनुवाद)


'लूणा' (महाकाव्य नाटक) पंजाबी के सिरमौर कवि शिव कुमार बटालवी की एक अनूठी काव्य कृति है जिसने साहित्य अकादमी में एक नया इतिहास रच दिया था. 1967 में शिव को जब इस सृजन के लिए अकादमी पुरस्कार दिया गया तब उनकी आयु मात्र 30 वर्ष की थी. सबसे कम उम्र में अकादमी सम्मान पाने का रिकॉर्ड शिव के खाते में दर्ज है, जिसे कोई नहीं तोड़ पाया है.

इस कृति में शिव ने पूरण भगत की प्रसिद्ध लोककथा की खलनायिका लूणा के चरित्र को नई दृष्टि से प्रस्तुत किया था. कथा में एक प्रौढ़वय राजा सलवान निम्न जाति की नवयौवना लूणा से विवाह रचा लेता है. विवाह से नाखुश लूणा, सलवान के युवा पुत्र पुरण से प्रणय निवेदन करती है जिसे पूरण ठुकरा देता है. इस अपमान से ग्रसित लूणा पूरण पर झूठे अनैतिक आरोप लगाती है और सलवान के हाथों उसके पुत्र को मरवा देती है. यह कृति एक स्त्री की मनगत और उसकी बेबसी की गहरी काव्यात्मक प्रस्तुति की बदौलत शिव को अपने समकालीन रचनाकारों से अलग मुकाम देती है.

इस कृति का राजस्थानी अनुवाद करना मेरे लिए पीड़ा के क्षणों में प्रार्थना करने जैसा रहा है. कई बार तो ऐसा महसूस हुआ मानो शिव ने अर्ध रात्रि में खुद आकर जटिल पंक्तियों के शब्द और भाव मेरे सिरहाने रख दिए जिन्हें मैंने हुबहू पिरो दिया है. इस अनुवाद प्रक्रिया के दौरान आध्यात्मिकता और रहस्यवाद का गहन अनुभव हुआ है जिसे शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं है. दरअसल, 'बिरहा के सुल्तान' के नाम से मशहूर शिव नितांत अनछुई उपमाओं का प्रयोग करते हैं. ऐसी उपमाएं और अनूठा शिल्प साधारणतया बहुत कम रचनाकारों के पास देखने को मिलता है. शिव की खासियत यह है कि वे अपने रचना कर्म में हर बार नया बिंब लेकर आते हैं और कहीं भी दोहराव नहीं करते. पंजाबी भाषा के गूढतम शब्दों का चयन और पात्रों की संवेदना को चरम पर ले जाने की कला शिव बखुबी जानते हैं. शायद यही कारण है कि शिव बटालवी के सृजन की ख्याति सात समंदर पार तक गूंजती है.

साहित्य अकादमी से प्रकाशित हो रही इस अनुदित कृति का कवर प्रूफ आज अनुमोदन के लिए प्राप्त हुआ है. रंगों के त्योहार पर मिले इस विशेष उपहार के लिए साहित्य अकादमी का शुक्रिया. विशेष स्नेह रखने वाले अग्रज श्री मधु जी आचार्य, डॉ. मंगत जी बादल, दिल्ली से मखमली आवाज के शायर भाई प्रदीप 'तरकश', मानसा के श्री सुरेंद्र जी बांसल, आकाशवाणी उद्घोषक राजेश जी चड्ढा, आशाजी शर्मा, अनुज राज बिजारणियां और डॉ. मदन लड्ढा का विशेष आभार, उनके मार्गदर्शन और सहयोग के बिना यह रामसेतु कार्य संभव नहीं था. यारियां जिंदाबाद !

डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

Saturday, 27 November 2021

थुथकारा' और 'लूणराई' हैं मां के निश्छल प्रेम के उपचार


'चाल भाइड़ा, ले चाल पाछो
टैम री चकरी नै पूठी घुमा परो
उण सागी ठौड़, उण सागी ठिकाणै
जठै उमरां आपरो अरथ नीं जाणै
'टीकै' 'थुथकारै' अर 'लूणराई' रो
भेद कोई नीं पिछाणै......


बचपन की स्मृतियों के जगमगाते आकाश में अक्सर 'थुथकारा' और 'लूणराई' याद आते हैं. मां के हाथ से लगा काजल का 'टीका' और नन्ही हथेलियों में सजे 'दाम्बे' वो अमूल्य धरोहर है, जिसे मन हमेशा सहेज कर रखना चाहता है.

राजस्थानी लोक संस्कृति में 'थुथकारे' और 'लूणराई' की अनूठी महिमा है. हमारे बुजुर्गों के शुद्ध अंतःकरण और हाथ की बरकत में कितना गहरा असर है, इसे 'थुथकारे' और 'लूणराई'
से होने वाले तात्कालिक प्रभाव के जरिये महसूस किया जा सकता है. छोटी-मोटी शारीरिक तकलीफ होने पर मां और दादियां बड़ी शिद्दत के साथ इन रामबाण उपचारों से अपने बच्चों के स्वस्थ कर देती हैं. दरअसल ये निश्छल प्रेम के उपचार हैं, जो पगडंडियों के दिनों की विरासत है.


'थूथकारा' एक ऐसा रिवाज है जिसका प्रयोग किसी बुरी नजर का असर उतारने अथवा उससे बचाने के लिए किया जाता है. जब भी कोई मन को भाता है तो उस पर थुथकारा डाला जाता है. यहां तक कि भौतिक वस्तुएं भी यदि अच्छी लगें, तो उन्हें भी थुथकारा देने का रिवाज है. इसका सीधा सा अर्थ उसे बुरी नजर से बचाना है.

जब किसी बच्चे को नजर लग जाती है तो गांव में किसी ऐसे अनुभवी बुजुर्ग से थुथकारा डलवाया जाता है जिसका थुथकारा पलता हो. 'थुथकारा पलना' उसके असर को दर्शाता है. थुथकारा डालने की भी एक खास मुद्रा है. बुजुर्ग अपनी मध्यमा और अनामिका अंगुली को हथेली की तरफ मोड़ कर, तर्जनी और कनिष्ठा अंगुली को पीछे की तरफ से आपस में जोड़ लेते हैं. इन जोड़ी गई उंगलियों के मध्य से थूक उछाला जाता है जिसके छींटे बच्चे के चेहरे के आसपास गिरते हैं. और जनाब, निश्चल मन से किए गए इस उपचार का असर देखिए कि बच्चा स्वस्थ हो जाता है.

इसी कड़ी में 'लूणराई' भी नजर उतारने का एक महत्वपूर्ण घरेलू उपचार हैं जिसका प्रयोग माएं अपने बच्चों के लिए करती हैं. इस उपचार में एक कटोरी में राई के कुछ दाने, सात साबुत लाल मिर्च और थोड़ा सा नमक लेते हैं. इस कटोरी को बुरी नजर से ग्रसित बच्चे के सिर के ऊपर से सात बार घुमाया जाता है और फिर इस सारी सामग्री को जलते हुए चूल्हे या बोरसी में डाल दिया जाता है. इन मिर्चों के जलने की कोई धांस या गंध नहीं आए तो यह समझा जाता है कि बच्चे को नजर लगी हुई थी जो इस सामग्री के साथ ही जल कर भस्म हो गई. माना जाता है कि शनिवार को की गई 'लूणराई' ज्यादा असरकारक होती है .माएं अपने बड़े बच्चों पर भी अनेक बार 'लूणराई' करती हैं जिसमें उनका अगाध निश्छल प्रेम और संस्कारों के प्रति अटूट विश्वास छिपा रहता है.

छोटे बच्चों को बुरी नजर से बचाने का एक और अनूठा दुलार है 'दाम्बा'. मां जब अपने दूधमुंहे बच्चों को नहला-धुलाकर सजाती-संवारती है तो माथे पर काजल का टीका लगाने के साथ-साथ उनकी नन्ही हथेलियों और पगथलियों में 'दाम्बे' भी मांड देती है. ये 'दाम्बे' निश्छल हंसी बिखेरते शिशु की खूबसूरती में चार चांद लगा देते हैं. 'दाम्बे' के रूप में काजल की गोल टिक्की लगी नन्ही हथेलियां सबका मन मोह लेती हैं.

सूचना क्रांति के युग में बुरी नजर के प्रभाव को जड़ से समाप्त करने वाले ये उपचार भले ही साधारण दिखते हो लेकिन आज भी हमारी सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. खास बात यह है कि यह उपचार मां की ममता से जुड़े हुए हैं जिसका असर ताउम्र रहता है. धन्य है मां, और धन्य है उनकी 'लूणराई' !

-डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

Wednesday, 6 October 2021

चूल्हे को संवारने की सांस्कृतिक परंपरा है 'धौळक'


'बीनणी, धौळक दे ली के !'


घर के आंगन में जब सासूजी की आवाज गूंजती तो नई बहू को 'धौळक' याद आती और बेसाख्ता उसके मुंह से निकल जाता 'अल्लै....'


 भूल जाना हर बहू का स्वभाव है. वैवाहिक जीवन के आरंभिक काल में तो बहुएं अक्सर घर की साधारण परंपराओं को भूल जाती हैं जिससे उन्हें बहुत कुछ सुनने को मिलता है.


'धौळक' हमारी राजस्थानी संस्कृति की विरासत थी जो अब लगभग लुप्त हो चुकी है. मिट्टी वाले चूल्हों और सिगड़ी के दौर में 'धौल़क' का डिब्बा या बर्तन हर घर में हुआ करता था. इस पात्र में सफेद चिकनी मिट्टी का घोल रहता था जो धौळक कहलाती थी. इसी घोल में डूबे हुए एक कपड़े से चूल्हे को पोता जाता था. चूल्हे की बाहरी और भीतरी दीवारों के साथ-साथ उसके आसपास भी धौळक दी जाती थी.

धौळक सूखने के बाद उसकी आभा देखने लायक होती. धुएं से काले हुए चूल्हे को धौळक से नया रूप मिल जाता और रसोई साफ सुथरी दिखने लगती. सफेद मिट्टी से पुते चूल्हे के पिछले भाग में पड़ी लोहे की काली फूंकणी और चिमटे की खूबसूरती बढ़ जाती. यही धौळक धुएं से काली पड़ी मिट्टी की हांडियों और पीतल की देगचियों के तले पर पोत दी जाती. इससे रसोई में बर्तनों की शोभा की दुगनी हो जाती. जिन घरों में कोयले वाली 
बोरसी या सिगड़ी का प्रयोग होता था वहां सिगड़ी को भी धौळक देने का रिवाज था.

पगडंडियों के दिनों में धौळक रसोई की नित्य साफ-सफाई का एक जरूरी संस्कार था. बिना धौळक दिए चूल्हे पर रोटी बनाने वाली महिला को फूहड़ माना जाता था. घर की बुजुर्ग महिलाएं यह संस्कार पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी बहुओं को सौंपती थी. रसोई और चूल्हे को साफ-स्वच्छ रखने की सीख राजस्थानी संस्कृति की विरासत है.

आज जब गैस और बिजली के ऑटोमेटेड इंडक्शन चूल्हे उपयोग में लाए जा रहे हैं तो धौळक बीते दिनों की दास्तान हो चुकी है. फिर भी कभी कभार गांव देहात में जब कभी चूल्हे पर सिकी रोटियों की खुशबू महकती है तो अनायास ही स्मृतियों के आंगन में धौळक पुता चूल्हा उदासी की मुस्कुराहट बिखेरता उभर ही जाता है.

-रूंख

तीज तिंवारां बावड़ी...!

पुन्न बडेरां  रा  आछा, बरकत है बां  री रीतां  में तिंवार बणाया इस्या इस्या गाया जावै जका गीतां में राजी राखै रामजी ! आज बात आपणै तिंवारां री...

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