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Tuesday, 5 April 2022

धरा की जिजीविषा है घग्घर


 
( डॉ. मदन गोपाल लढ़ा के कविता संग्रह 'सुनो घग्घर' को बांचते हुए...)


नदिया धीरे धीरे बहना
नदिया, घाट घाट से कहना
मीठी मीठी है मेरी धार
खारा खारा सारा संसार...

कवि प्रमोद तिवारी की यह कविता अनायास ही अवचेतन मस्तिष्क से उभरने लगती है जब आप घग्घर नदी को संबोधित कविताएं बांच रहे होते हैं.

'दरअसल, घग्घर केवल नदी भर नहीं है, धरा की जिजीविषा है.' यह कहना है थार के संवेदनशील रचनाकार डॉ मदन गोपाल लढ़ा का, जिनका ताजा कविता संग्रह 'सुनो घग्घर' इन दिनों चर्चा में है.

विश्व साहित्य में नदियों को संबोधित करते हुए पहले भी अनेक कविताएं लिखी गई हैं लेकिन जब थार का कोई कवि मन किसी नदी के नाम से अपनी अभिव्यक्ति दे तो उसे जानने की ललक उठना स्वाभाविक है. रेगिस्तान और नदी के संबंध को चुंबक के समान ध्रुवों की स्थिति से बेहतर समझा जा सकता है जो एक दूसरे से विकर्षित होते हैं. प्यास भर पानी को सहेजता थार नदी के स्वप्न अवश्य देखता है लेकिन उसकी किस्मत में हमेशा मृग मरीचिका ही रहती है.


.. इसे मेरी खुशकिस्मती ही कहिए कि मेरा बचपन घग्घर के बहाव क्षेत्र में गुजरा है जहां भूपत भाटी द्वारा स्थापित भटनेर के ऐतिहासिक किले पर पत्थर फेंकते हुए हमने कभी अठखेलियां की थी. हिमालय पर्वत श्रंखला की शिवालिक पहाड़ियों से निकलने वाली इस नदी के बहाव क्षेत्र को नाली के नाम से जाना जाता है. अखंड भारत में यह नदी पटियाला, अंबाला के रास्ते बीकानेर रियासत के गंगानगर जिले में प्रवेश करती थी. उन दिनों सरहद पार तक इस नदी का बहाव क्षेत्र था जो अब धीरे-धीरे लुप्त होने की कगार पर है.

लेकिन इस संग्रह में संकलित कविताओं में घग्गर एक बार फिर पुनर्जीवित हो उठी है. मरु मन के सपनों में हरदम बहती घग्गर इतिहास के साथ कदमताल करती नजर आती है. इन कविताओं की बानगी देखिए-

पानी के मिस 
लेकर जाती है सरहद पार 
कथाएं पुरखों की 
अतीत के उपन्यास 
निबंध गलतियों के 
और रिश्तो की कविताएं 
कितना कुछ कहना चाहती है कितना कुछ सुनना चाहती है 
सृजन धर्मी घग्गर !

कवि घग्गर को धीरज और संबल के प्रतीक रूप में देखता है. उसे नदी के लुप्त हुए स्वर में वर्तमान के साथ-साथ भूत और भविष्य के संकेत स्पष्ट नजर आते हैं. तभी तो वह कहता है-
जो कहना चाहते हो 
पुरखों से 
घग्गर को कहो 
वह पहुंचा देगी संदेश 
अनंत लोक में भी..

इस संग्रह की कविताओं को तीन भागों में बांटा गया है. 'बिसरी हुई तारीखें' फूल से झरी हुई पंखुड़ी और 'घर-बाहर' नामक इन खंडों में वर्तमान और विरासत को जोड़ने वाली रचनाएं हैं. कालीबंगा के चित्र शीर्षक से लिखी गई कविताएं भाव और शिल्प सौंदर्य की दृष्टि से बेहतरीन कही जा सकती हैं. 'दर्द की लिपि को बांचना/आसान कहां होता है भला..., या फिर, केवल घग्घर जानती है/ खुदाई में मिली काली चूड़ियों की पीर.. सरीखी पंक्तियां इन कविताओं को सार्थक वक्तव्य में बदल देती हैं.

राजस्थान साहित्य अकादमी के आर्थिक सहयोग और बोधि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह कविता संकलन संग्रहणीय है. उम्मीद की जानी चाहिए कि डॉ. लढ़ा की लेखनी से अभी और बेहतरीन कविताएं रची जानी है जो जीवन को और सुंदर बनाने का काम करेंगी.

- डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

Saturday, 2 April 2022

दक्षिण एशिया में भारत


( भारत के पड़ोसी देशों के साथ संबंधों पर डॉ. नंदकिशोर सोमानी का महत्वपूर्ण  संकलन)


दक्षिण एशिया दुनिया का वह मोहल्ला है जिस पर रूस और अमेरिका ही नहीं, अपितु यूरोप के दिग्गजों की भी हमेशा नजर लगी रहती है. इसी मोहल्ले में सदियों से भारत का परिवार आबाद है जिसने जीवन के जाने कितने रंग देखते हुए अपने अस्तित्व को बचाए रखा है. यह दीगर बात है कि भारत के कई बेटे अपने अलग घर बसा कर अब उसके परिवार के 'शरीके' बन चुके हैं. और 'शरीका' यानी कुटुंब के लोग, कैसा व्यवहार करते हैं, इसका अनुभव कमोबेश हर सामाजिक प्राणी को होता है. देशों के संदर्भ में इन्हीं अनुभवों की पड़ताल को अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के विश्लेषण का नाम दिया जाता है. 'दक्षिण एशिया में भारत' शीर्षक से प्रकाशित पुस्तक भी इन्हीं मुद्दों पर प्रकाश डालती है.

अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ डॉ. नंदकिशोर सोमानी के संपादन में प्रकाशित यह एक महत्वपूर्ण पुस्तक है जो विश्व मानचित्र पर इस भूभाग की वर्तमान परिस्थितियों का सारगर्भित विश्लेषण करती है. इस कृति में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञों द्वारा भारत के संदर्भ में लिखे गए आठ शानदार आलेख हैं. पड़ोसी मुल्कों से भारत के संबंधों की पड़ताल करते ये आलेख न सिर्फ शैक्षणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं बल्कि हिंद महासागर से हिमालय के बीच पसरे समूचे भारतीय उपमहाद्वीप को समझने के महत्वपूर्ण दस्तावेज बन पड़े हैं.

डॉ.अमित कुमार सिंह का भारत-पाक संबंधों पर लिखा गया 'अविश्वास और आशा की गाथा' एक बेहतरीन आलेख है जो भूटान के प्रधानमंत्री जिग्मी वाई. थिनले के संदेश से शुरू होता है. थिनले कहते हैं 'हर दक्षिण एशियाई जानता है कि घर में लड़ते झगड़ते रहने वाला कोई परिवार खुश नहीं रह सकता और झगड़ालू पड़ोसियों के रहते कोई समुदाय समृद्ध नहीं हो सकता.'

डॉ. दीपक कुमार पांडे अपने आलेख में भारत-बांग्लादेश संबंधों में गर्माहट तलाशते हैं तो वहीं विवेक ओझा भारत म्यांमार के समक्ष अवसर, चुनौतियों और समाधान पर बात करते हैं. डॉक्टर नीलम शर्मा अपने आलेख में भूटान के साथ भारत के संबंधों की विवेचना करती हैं और वैश्विक परिदृश्य में दोनों देशों की भूमिका पर प्रकाश डालती हैं.

भारत अफगानिस्तान के ताजा संबंधों पर बृजेश कुमार जोशी का लिखा आलेख इतिहास के पन्नों की परतें खोलता है. इसमें महाभारत कालीन गांधार जनपद और कभी अशोक के मगध साम्राज्य का हिस्सा रहे अफगानिस्तान की वर्तमान परिस्थितियों का बखूबी वर्णन किया गया है. पिछले दो दशक से भारत और नेपाल के रिश्ते कैसे हैं, इसे डॉ. राकेश कुमार मीणा के आलेख से जाना जा सकता है. लंबे समय तक तमिल और सिंहली संघर्ष से जूझता रहा श्रीलंका आज भारत के साथ कैसा व्यवहार रखना चाहता है इसकी पड़ताल डॉ. रितेश राय अपने आलेख में करते हैं.

संकलन के संपादक डॉ. सोमानी ने संपादन के साथ-साथ मालदीव के और भारत के रिश्ते पर एक सूक्ष्मावलोकन आलेख प्रस्तुत कर पुस्तक की महत्ता में इजाफा किया है.

सार रूप में कहा जा सकता है कि विकास प्रकाशन बीकानेर द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'दक्षिण एशिया में भारत' अंतरराष्ट्रीय संबंध और राजनीति विज्ञान की दृष्टि से महत्वपूर्ण संकलन है. डॉ. सोमानी साहित्य सृजन और पत्रकारिता से निरंतर जुड़े रहे हैं, इसका प्रभाव उनके शैक्षणिक और शोधपरक लेखन में स्पष्ट रूप से झलकता है. संकलन में विषयों का चयन और उनका बेहतर प्रस्तुतीकरण पाठकों को बांधे रखता है. उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले दिनों में पाठकों को डॉ. सोमानी के संपादन में ऐसी कई कृतियों के रसास्वादन का आनंद मिलेगा.

- डॉ.हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

Wednesday, 23 March 2022

उस मुड़़े हुए पन्ने से आगे...


(23 मार्च 1931)

भगत सिंह के नाम से ब्रिटिश सरकार ही नहीं डरती थी अपितु स्वतंत्र भारत की सरकारें भी आज तक  खौफ खा रही हैं.

इन सरकारों का डर देखिए कि भगतसिंह सरीखे राजनीतिक विचारक को देश के  विश्वविद्यालयी  पाठ्यक्रमों में पढ़ाया ही नहीं जाता. विडंबना यह है कि कुछ महाविद्यालयों के नाम तो शहीद-ए-आजम के नाम पर रख दिए गए हैं लेकिन वहां  के पाठ्यक्रमों में भी राजनीतिक विचारक के रूप में भगत सिंह को कोई स्थान नहीं मिल सका है.

 इसका सीधा सा कारण है शहीदे आजम का राजनीतिक चिंतन, जो हमें सिखाता है कि आजादी के मायने यह नहीं होते की सत्ता गोरे हाथों से काले हाथों में आ जाए. यह तो सत्ता का अंतरण हुआ. असली आजादी तो तब आएगी जब अन्न उपजाने वाला भूखा नहीं सोए, कपड़ा बुनने वाला नंगा न रहे और मकान बनाने वाला खुद बेघर न हो. दरअसल, भगतसिंह के विचारों से परम्परागत राजनीति की चूलें हिल सकती हैं और क्रांति का ज्वार उमड़ सकता है. इसी भय के कारण देश की सरकारें उनके नाम से कतराती हैं. हां, आप पार्टी ने जरूर एक नई शुरूआत की है.

मुझे मलाल यह है कि ब्रिटिश शासन की गुलामी करने वाले अनेक नौसिखियों को राजनीतिक विचारक बता कर न सिर्फ उनका महिमामंडन किया गया है बल्कि राजनीति विज्ञान के पाठ्यक्रमों में भी उन्हें बरसों से पढ़ाया जा रहा है. विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाने वाले प्रमुख भारतीय राजनीतिक विचारकों में मनु, कौटिल्य और शुक्र को छोड़ दें तो इन विचारकों में अधिकांशत: कांग्रेसी नेताओं के नाम शामिल हैं. इनमें भी सिर्फ तिलक को छोड़कर शेष सभी पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित थे या यूं कहा जा सकता है कि सभी 'इंग्लैंड रिटर्न' थे. जब से भाजपा सत्तासीन हुई है जनसंघ के कुछ नेताओं को भी राजनीतिक विचारक का दर्जा दिया गया है और उन्हें भी पाठ्यक्रमों में जोड़ दिया गया है.

सरकारें भले ही इन सबको पढ़ाएं लेकिन देश में भगतसिंह को राजनीतिक विचारक के रूप में न पढ़ाया जाना देश का दुर्भाग्य है. क्या क्रांति के डर से हम क्रांति-बीज बोना छोड़ दें ? 

नहीं, इसीलिए मैंने आज इक्कीस कॉलेज में राजनीति विज्ञान के विद्यार्थियों को राजनीतिक विचारक के रूप में भगत सिंह को पढ़ाया है. इंकलाब जिंदाबाद !

-डॉ. हरिमोहन सारस्वत  'रूंख'

Thursday, 17 March 2022

इक कुड़ी जीं दा नाम मुहब्बत, गुम है, गुम है, गुम है...


 (शिव बटालवी की 'लूणा' का राजस्थानी अनुवाद)


'लूणा' (महाकाव्य नाटक) पंजाबी के सिरमौर कवि शिव कुमार बटालवी की एक अनूठी काव्य कृति है जिसने साहित्य अकादमी में एक नया इतिहास रच दिया था. 1967 में शिव को जब इस सृजन के लिए अकादमी पुरस्कार दिया गया तब उनकी आयु मात्र 30 वर्ष की थी. सबसे कम उम्र में अकादमी सम्मान पाने का रिकॉर्ड शिव के खाते में दर्ज है, जिसे कोई नहीं तोड़ पाया है.

इस कृति में शिव ने पूरण भगत की प्रसिद्ध लोककथा की खलनायिका लूणा के चरित्र को नई दृष्टि से प्रस्तुत किया था. कथा में एक प्रौढ़वय राजा सलवान निम्न जाति की नवयौवना लूणा से विवाह रचा लेता है. विवाह से नाखुश लूणा, सलवान के युवा पुत्र पुरण से प्रणय निवेदन करती है जिसे पूरण ठुकरा देता है. इस अपमान से ग्रसित लूणा पूरण पर झूठे अनैतिक आरोप लगाती है और सलवान के हाथों उसके पुत्र को मरवा देती है. यह कृति एक स्त्री की मनगत और उसकी बेबसी की गहरी काव्यात्मक प्रस्तुति की बदौलत शिव को अपने समकालीन रचनाकारों से अलग मुकाम देती है.

इस कृति का राजस्थानी अनुवाद करना मेरे लिए पीड़ा के क्षणों में प्रार्थना करने जैसा रहा है. कई बार तो ऐसा महसूस हुआ मानो शिव ने अर्ध रात्रि में खुद आकर जटिल पंक्तियों के शब्द और भाव मेरे सिरहाने रख दिए जिन्हें मैंने हुबहू पिरो दिया है. इस अनुवाद प्रक्रिया के दौरान आध्यात्मिकता और रहस्यवाद का गहन अनुभव हुआ है जिसे शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं है. दरअसल, 'बिरहा के सुल्तान' के नाम से मशहूर शिव नितांत अनछुई उपमाओं का प्रयोग करते हैं. ऐसी उपमाएं और अनूठा शिल्प साधारणतया बहुत कम रचनाकारों के पास देखने को मिलता है. शिव की खासियत यह है कि वे अपने रचना कर्म में हर बार नया बिंब लेकर आते हैं और कहीं भी दोहराव नहीं करते. पंजाबी भाषा के गूढतम शब्दों का चयन और पात्रों की संवेदना को चरम पर ले जाने की कला शिव बखुबी जानते हैं. शायद यही कारण है कि शिव बटालवी के सृजन की ख्याति सात समंदर पार तक गूंजती है.

साहित्य अकादमी से प्रकाशित हो रही इस अनुदित कृति का कवर प्रूफ आज अनुमोदन के लिए प्राप्त हुआ है. रंगों के त्योहार पर मिले इस विशेष उपहार के लिए साहित्य अकादमी का शुक्रिया. विशेष स्नेह रखने वाले अग्रज श्री मधु जी आचार्य, डॉ. मंगत जी बादल, दिल्ली से मखमली आवाज के शायर भाई प्रदीप 'तरकश', मानसा के श्री सुरेंद्र जी बांसल, आकाशवाणी उद्घोषक राजेश जी चड्ढा, आशाजी शर्मा, अनुज राज बिजारणियां और डॉ. मदन लड्ढा का विशेष आभार, उनके मार्गदर्शन और सहयोग के बिना यह रामसेतु कार्य संभव नहीं था. यारियां जिंदाबाद !

डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

Saturday, 27 November 2021

थुथकारा' और 'लूणराई' हैं मां के निश्छल प्रेम के उपचार


'चाल भाइड़ा, ले चाल पाछो
टैम री चकरी नै पूठी घुमा परो
उण सागी ठौड़, उण सागी ठिकाणै
जठै उमरां आपरो अरथ नीं जाणै
'टीकै' 'थुथकारै' अर 'लूणराई' रो
भेद कोई नीं पिछाणै......


बचपन की स्मृतियों के जगमगाते आकाश में अक्सर 'थुथकारा' और 'लूणराई' याद आते हैं. मां के हाथ से लगा काजल का 'टीका' और नन्ही हथेलियों में सजे 'दाम्बे' वो अमूल्य धरोहर है, जिसे मन हमेशा सहेज कर रखना चाहता है.

राजस्थानी लोक संस्कृति में 'थुथकारे' और 'लूणराई' की अनूठी महिमा है. हमारे बुजुर्गों के शुद्ध अंतःकरण और हाथ की बरकत में कितना गहरा असर है, इसे 'थुथकारे' और 'लूणराई'
से होने वाले तात्कालिक प्रभाव के जरिये महसूस किया जा सकता है. छोटी-मोटी शारीरिक तकलीफ होने पर मां और दादियां बड़ी शिद्दत के साथ इन रामबाण उपचारों से अपने बच्चों के स्वस्थ कर देती हैं. दरअसल ये निश्छल प्रेम के उपचार हैं, जो पगडंडियों के दिनों की विरासत है.


'थूथकारा' एक ऐसा रिवाज है जिसका प्रयोग किसी बुरी नजर का असर उतारने अथवा उससे बचाने के लिए किया जाता है. जब भी कोई मन को भाता है तो उस पर थुथकारा डाला जाता है. यहां तक कि भौतिक वस्तुएं भी यदि अच्छी लगें, तो उन्हें भी थुथकारा देने का रिवाज है. इसका सीधा सा अर्थ उसे बुरी नजर से बचाना है.

जब किसी बच्चे को नजर लग जाती है तो गांव में किसी ऐसे अनुभवी बुजुर्ग से थुथकारा डलवाया जाता है जिसका थुथकारा पलता हो. 'थुथकारा पलना' उसके असर को दर्शाता है. थुथकारा डालने की भी एक खास मुद्रा है. बुजुर्ग अपनी मध्यमा और अनामिका अंगुली को हथेली की तरफ मोड़ कर, तर्जनी और कनिष्ठा अंगुली को पीछे की तरफ से आपस में जोड़ लेते हैं. इन जोड़ी गई उंगलियों के मध्य से थूक उछाला जाता है जिसके छींटे बच्चे के चेहरे के आसपास गिरते हैं. और जनाब, निश्चल मन से किए गए इस उपचार का असर देखिए कि बच्चा स्वस्थ हो जाता है.

इसी कड़ी में 'लूणराई' भी नजर उतारने का एक महत्वपूर्ण घरेलू उपचार हैं जिसका प्रयोग माएं अपने बच्चों के लिए करती हैं. इस उपचार में एक कटोरी में राई के कुछ दाने, सात साबुत लाल मिर्च और थोड़ा सा नमक लेते हैं. इस कटोरी को बुरी नजर से ग्रसित बच्चे के सिर के ऊपर से सात बार घुमाया जाता है और फिर इस सारी सामग्री को जलते हुए चूल्हे या बोरसी में डाल दिया जाता है. इन मिर्चों के जलने की कोई धांस या गंध नहीं आए तो यह समझा जाता है कि बच्चे को नजर लगी हुई थी जो इस सामग्री के साथ ही जल कर भस्म हो गई. माना जाता है कि शनिवार को की गई 'लूणराई' ज्यादा असरकारक होती है .माएं अपने बड़े बच्चों पर भी अनेक बार 'लूणराई' करती हैं जिसमें उनका अगाध निश्छल प्रेम और संस्कारों के प्रति अटूट विश्वास छिपा रहता है.

छोटे बच्चों को बुरी नजर से बचाने का एक और अनूठा दुलार है 'दाम्बा'. मां जब अपने दूधमुंहे बच्चों को नहला-धुलाकर सजाती-संवारती है तो माथे पर काजल का टीका लगाने के साथ-साथ उनकी नन्ही हथेलियों और पगथलियों में 'दाम्बे' भी मांड देती है. ये 'दाम्बे' निश्छल हंसी बिखेरते शिशु की खूबसूरती में चार चांद लगा देते हैं. 'दाम्बे' के रूप में काजल की गोल टिक्की लगी नन्ही हथेलियां सबका मन मोह लेती हैं.

सूचना क्रांति के युग में बुरी नजर के प्रभाव को जड़ से समाप्त करने वाले ये उपचार भले ही साधारण दिखते हो लेकिन आज भी हमारी सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. खास बात यह है कि यह उपचार मां की ममता से जुड़े हुए हैं जिसका असर ताउम्र रहता है. धन्य है मां, और धन्य है उनकी 'लूणराई' !

-डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

Wednesday, 6 October 2021

चूल्हे को संवारने की सांस्कृतिक परंपरा है 'धौळक'


'बीनणी, धौळक दे ली के !'


घर के आंगन में जब सासूजी की आवाज गूंजती तो नई बहू को 'धौळक' याद आती और बेसाख्ता उसके मुंह से निकल जाता 'अल्लै....'


 भूल जाना हर बहू का स्वभाव है. वैवाहिक जीवन के आरंभिक काल में तो बहुएं अक्सर घर की साधारण परंपराओं को भूल जाती हैं जिससे उन्हें बहुत कुछ सुनने को मिलता है.


'धौळक' हमारी राजस्थानी संस्कृति की विरासत थी जो अब लगभग लुप्त हो चुकी है. मिट्टी वाले चूल्हों और सिगड़ी के दौर में 'धौल़क' का डिब्बा या बर्तन हर घर में हुआ करता था. इस पात्र में सफेद चिकनी मिट्टी का घोल रहता था जो धौळक कहलाती थी. इसी घोल में डूबे हुए एक कपड़े से चूल्हे को पोता जाता था. चूल्हे की बाहरी और भीतरी दीवारों के साथ-साथ उसके आसपास भी धौळक दी जाती थी.

धौळक सूखने के बाद उसकी आभा देखने लायक होती. धुएं से काले हुए चूल्हे को धौळक से नया रूप मिल जाता और रसोई साफ सुथरी दिखने लगती. सफेद मिट्टी से पुते चूल्हे के पिछले भाग में पड़ी लोहे की काली फूंकणी और चिमटे की खूबसूरती बढ़ जाती. यही धौळक धुएं से काली पड़ी मिट्टी की हांडियों और पीतल की देगचियों के तले पर पोत दी जाती. इससे रसोई में बर्तनों की शोभा की दुगनी हो जाती. जिन घरों में कोयले वाली 
बोरसी या सिगड़ी का प्रयोग होता था वहां सिगड़ी को भी धौळक देने का रिवाज था.

पगडंडियों के दिनों में धौळक रसोई की नित्य साफ-सफाई का एक जरूरी संस्कार था. बिना धौळक दिए चूल्हे पर रोटी बनाने वाली महिला को फूहड़ माना जाता था. घर की बुजुर्ग महिलाएं यह संस्कार पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी बहुओं को सौंपती थी. रसोई और चूल्हे को साफ-स्वच्छ रखने की सीख राजस्थानी संस्कृति की विरासत है.

आज जब गैस और बिजली के ऑटोमेटेड इंडक्शन चूल्हे उपयोग में लाए जा रहे हैं तो धौळक बीते दिनों की दास्तान हो चुकी है. फिर भी कभी कभार गांव देहात में जब कभी चूल्हे पर सिकी रोटियों की खुशबू महकती है तो अनायास ही स्मृतियों के आंगन में धौळक पुता चूल्हा उदासी की मुस्कुराहट बिखेरता उभर ही जाता है.

-रूंख

Tuesday, 17 August 2021

पन्द्रह अगस्त, पन्द्रह चुनौतियां

देश संसद और विधानसभाओं में नहीं बनता. उसके बनने की वास्तविक प्रक्रिया अगर देखनी हो तो आपको खेत-खलिहानों से होते हुए उद्योगों की भट्टियों तक पहुंचना होगा, तपती दुपहरी में सड़क बनाते काले-कलूटे श्रम साधकों के पास जाना होगा. दरअसल, श्रम का पसीना ही देश का निर्माण करता है. राजपथ हो या लाल किले की प्राचीर, कुदाल और तगारी के बिना कुछ भी संभव नहीं है. 15 अगस्त के दिन जब हम आजादी के गीत गा रहे होते हैं उस वक्त भी हमारे करोड़ों कामगार अपने तन को श्रम की भट्टियों में झोंक रहे होते हैं. उनके कानों तक आजादी के गीतों की गूंज कैसे पहुंचे, उन्हें गरीबी और भुखमरी से कैसे निजात मिले, उनके स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधाएं कैसे बेहतर हों, यह आत्मनिर्भर होने का स्वप्न देखने वाले भारतीय गणतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती है.


75वें स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर केन्द्रीय गृह मन्त्रालय ने आह्वान किया है कि इस बार ‘आत्मनिर्भर भारत’ की थीम के साथ स्वतन्त्रता का उत्सव मनाया जाए. आजादी के 74 साल बाद आज हम जिस मुकाम पर खड़े हैं वह आत्मनिर्भर भारत का ही तो एक उदाहरण है. दरअसल, आत्मनिर्भरता की थीम तो 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि में पं. जवाहरलाल नेहरू के ऐतिहासिक भाषण ‘ए ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ के साथ ही शुरू हो गई थी जिसमें उन्होंने कहा था कि आज रात बारह बजे जब सारी दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतन्त्रता की नई चमकती सुबह के साथ उठेगा. नेहरू के शब्द थे कि भविष्य हमें बुला रहा है और हमें क्या करना चाहिए जिससे कि हम आम आदमी, किसानों और मजदूरों के लिए अवसर पैदा कर सकें, निर्धनता मिटा सकें और एक समृद्ध लोकतांन्त्रिक और प्रगतिशील देश बना सकें.


बीते सात दशकों में तमाम विपरीत परिस्थितियों और कमियों के बावजूद भारत अंतर्राष्ट्रीय मंच पर एक शक्ति के रूप में उभरा है. दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र की उपलब्धि यह है कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में हमनेे विकास के हर क्षेत्र में समय के साथ कदमताल मिलाई है. अंतरिक्ष अनुसंधान की बात हो या खाद्यान्नों में आत्मनिर्भता, सॉफ्टवेयर निर्माण हो या भारी उद्योग, भारत विकसित देशों की तुलना में कहीं कमतर नहीं दिखता. लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ‘ए ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ में जिस भारत की कल्पना की गई है उसके लिए सतत प्रयास करने होंगे. इसके लिए उपलब्धियों के साथ-साथ कमजोरियों और चुनौतियों को स्वीकार करना भी जरूरी है. राष्ट्रनिर्माण के जिन मोर्चों पर हम नाकाम रहे हैं उन्हें चिन्हित कर पुनः सुनियोजित ढंग सफल बनाना हम सबकी नैतिक जिम्मेदारी है.


15 अगस्त के अवसर पर आइए, उन 15 चुनौतियों को जानें जो आत्मनिर्भर भारत के दिव्य स्वप्न को साकार करने की दिशा में अहम हैं.


1. महामारी से कैसे मिले मुक्ति


कोरोना महामारी ने पिछले दो सालों में समूचे विश्व को हिला कर रख दिया है. एक ओर जहां लाखों लोग असमय ही काल कवलित हुए हैं वहीं लम्बे लॉकडाउन के चलते अधिकांश देशों की अर्थव्यवस्था पर भी आर्थिक संकट गहरा गया है. भारत जैसे विकासशील देश में, जहां लगभग 140 करोड़ की आबादी है, वहां यह वैश्विक आपदा कितनी भयावह रही है, इसका अंदाजा ऑक्सीजन के अभाव में दम तोड़ने वाले वाले हजारों लोगों की तस्वीरों से बखूबी लगाया जा सकता है. इस आपदा में शहरों से गांवों की ओर पैदल पलायन करते दिहाड़ी मजदूरों के दर्द ने मानवता को झकझोर कर रख दिया है. आजादी के 74 सालों बाद भी देश में पर्याप्त आधारभूत ढांचे का निर्माण न होना हमारी राजनीतिक विफलता को इंगित करता है. आज देश में स्वास्थ्य सुविधाओं का आलम यह है कि हमारे चिकित्सालयों में प्रति 1,050 मरीजों पर एक बेड उपलब्ध है. प्रति 1445 रोगियों के लिए एक डॉक्टर है. वैंटीलेटर्स युक्त बैड्स की संख्या उपलब्धता तो ऊंट के मुंह में जीरे के समान है.


समूचे विश्व में कोरोना की तीसरी लहर की आशंका जताई जा रही है. यह वायरस नित्य प्रति अपने नये वेरियंट मंे उजागर हो रहा है जिसके चलते मानव जीवन के प्रति निरंतर खतरा बना हुआ है. आज घड़ी इस महामारी से मुक्ति पाना हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है. अच्छी बात यह है कि भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों में है जिन्होंने अपने देश में ही वैक्सीन तैयार करने में सफलता पाई है. शुरुआती दिक्कतों के बाद आज देश में मुफ्त वैक्सीनेशन का काम युद्ध स्तर पर जारी है. चिकित्सा विभाग के आंकड़ों के मुताबिक देश में 50 करोड़ से अधिक लोगों का वैक्सीनेशन हो चुका है और सरकार दिसम्बर के अंत तक इसे पूरा करने की बात कर रही है. आज आवश्यकता इस बात की है कि देश में स्वास्थ्य सेवाओं के सुधार और विस्तार को सर्वोच्च प्राथमिकता मिले और समयबद्ध काम हो. संकट की इस घड़ी में सबसे जरूरी काम यह है कि हमारे डॉक्टर्स और नर्सिंग स्टाफ को बेहतरीन कार्य सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाएं ताकि उनका मनोबल बना रह सके. कोरोना की जंग को सामूहिक प्रयासों से ही जीता जा सकता है.


2. डगमगाती अर्थव्यवस्था और विनिवेश


कोरोना महामारी ने समूचे विश्व की अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया है जिससे विशेषज्ञों के सारे अनुमान और नियोजन धरे रह गए हैं. भारतीय अर्थव्यवस्था भी इससे अछूती नहीं  रही है.  हालांकि महामारी की पहली लहर के बाद, वित्तीय वर्ष 2020-21 की तीसरी तिमाही से हमारी अर्थव्यवस्था इस संकट से उबरने के संकेत देने लगी थी लेकिन कोरोना की दूसरी लहर ने देश के आर्थिक ढांचे पर पर जबरदस्त प्रहार किया है. दूसरी लहर से अर्थव्यवस्था के असंगठित क्षेत्र को विशेष रूप से गहरी चोट पहुंची है. सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए मई 2020 में 20 लाख करोड़ के आर्थिक राहत पैकेज की घोषणा के भी कोई विशेष परिणाम देखने को नहीं मिले हैं. देश में खुदरा व्यापार और लघु उद्योग धंधों पर सबसे अधिक मार पड़ी है. छोटे दुकानदारों और स्ट्रीट वेण्डर्स के काम लगभग समाप्त हो गए हैं. कमोबेश सेवा क्षेत्र में भी यही हाल है. नोटबंदी के बाद हमारा बैंकिग सैक्टर भारी एनपीए की समस्या से जूझ रहा है जिसे दूर करने के लिए हमारे पास सिर्फ सैद्धांतिक कार्य योजनाएं हैं जिनसे परिणाम की उम्मीद लगाना बेमानी है. सरकार अपने वित्तीय प्रबंधन में विनिवेश के जरिये अर्थव्यवस्था को साधने की कोशिश कर रही है जबकि यह कोई बेहतर विकल्प नहीं है.


ऐसा नहीं है कि देश पर इस तरह के संकट पूर्व में नहीं आए हों. 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी देश में अर्थव्यवस्था के पुर्ननिर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई थी. हौसले के साथ लागू की गई विभिन्न नीतियों और पंचवर्षीय योजनाओं ने देश की विकास गाथा में अहम रोल निभाया. हालांकि उस दौर में भी देशवासियों को काफी उतार-चढ़ाव भरे दिन देखने पड़े. जनता ने जहां खुशहाली का दौर देखा तो वहीं आर्थिक संकट का समय भी बखूबी झेल़ा. एक वक्त में तो देश के खजाने तक को गिरवी रखने जैसे हालात पैदा हो गए थे.

इस गिरावट से उबरने के लिए भी सरकार को वैसे ही हौसले के साथ महामारी प्रबंधन की रणनीति और विद्यमान परिस्थितियों में समन्वय बिठाने की जरूरत है. संकट की घड़ी में खर्चों में कटौती और तात्कालिक आय की अवधारणा हमेशा श्रेयस्कर रहती है, इसे अमल में लाना नितांत आवश्यक है. लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं के नाम पर देश की आय का एक बड़ा हिस्सा हमारे माननीय और प्रशासनिक अधिकारियों की सुविधाओं पर खर्च होता है, सरकार को उसे नियंत्रित कर बेहतर प्रबंधन की मिसाल प्रस्तुत करनी चाहिए. कोरोना के कारण कारोबारों और रोजगार पर पड़े बुरे प्रभाव से अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए सरकार को कड़े कदम उठाने की जरूरत है.


3. वैश्विक मंच पर हो प्रभावी उपस्थिति 


विश्व समुदाय में भारत की छवि एक शांतिप्रिय देश की है जहां विकास की अपार संभावनाएं मौजूद हैं. लेकिन उपलब्ध संसाधनों का समुचित उपयोग न कर पाने के कारण हमारा देश आज भी विकसित देशों की श्रेणी में नहीं आ पाया है. सबसे बड़ा लोकतन्त्र होने के बावजूद भारत आज भी संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में स्थायी सीट के लिए तरस रहा है. यह हमारी विदेश नीति की विफलता का बड़ा उदाहरण है. आज हम अमेरिका के पिछलग्गू बनते जा रहे हैं जबकि रूस जैसे पुराने मित्र राष्ट्र की अनदेखी कर हो रही है. इसका परिणाम यह है कि रूस अब पाकिस्तान से नजदीकियां बढ़ा रहा है जो हमारे लिए कतई ठीक नहीं है.


प्रति व्यक्ति आय के मामले में हम विश्व के अनेक छोटे-छोटे देशों से बहुत पीछे हैं. ग्लोबल सिटी के नाम पर हमारे देश का एक भी शहर ऐसा नहीं है जो विश्वस्तरीय शहरों के मुकाबले में खड़ा हो. देहात की बात तो छोड़ ही दें, हम अपने शहरों में बिजली, पानी और सीवरेज जैसी आधारभूत सुविधाओं का निर्माण ठीक ढंग से नहीं कर पाए हैं. अभियांत्रिकी और तकनीक के मामले में जापान और कोरिया जैसे अपेक्षाकृत छोटे देशों से बहुत पीछे हैं. हमारी शैक्षणिक और स्वास्थ्य सुविधाएं विकसित देशों के मुकाबले कहीं नहीं ठहरती. परिवहन और संचार के साधनों की समुचित अनुपलब्धता भी हमें वैश्विक विकास मंच पर पीछे धकेल देती है. ं140 करोड़ की जनसंख्या होने के बावजूद हम ओलम्पिक और विश्व खेल प्रतिस्पर्धाओं में स्वर्ण पदक को तरसते रहते हैं. ओलम्पिक के आयोजन का तो हम सिर्फ ख्वाब ही देख सकते हैं.


वैश्विक मंच पर प्रभावी उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए जरूरी है कि हम अपने आत्मबल को बढ़ाने का काम करें. संसद और विधानसभाओं में बैठे हमारे माननीयों का दायित्व है कि वे राष्ट्रनिर्माण की अनूठी मिसाल पेश करें. गांधी बनने के लिए जीवन में गांधी सा आचरण उतारना जरूरी है जिसने नंगे देशवासियों को देखकर सिर्फ लंगोटी में अपना जिंदगी गुजार दी थी. हमारे सपने उस वक्त धूमिल होते नजर आते हैं जब हमारे मुखिया देश की ब्रांडिंग करने की बजाय खुद की छवि को निखारने का काम करते दिखाई देते हैं.


4. सड़कों पर बैठा है देश का अन्नदाता


आजादी के 75वें वर्ष में देश के किसान केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ सड़कों पर बैठे हैं, यह अपने आप में चिंता का विषय है. पिछले आठ माह से चल रहे इस किसान आंदोलन में अब तक 600 से अधिक किसानों की शहादत हो चुकी है जिसकी गूंज अंतरराष्ट्रीय मंचों तक जा पहुंची है. आंदोलनकारी किसान केंद्र सरकार द्वारा कोरोना काल में पारित किए गए तीन कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं वहीं सरकार इन कानूनों को किसान हितैषी बता रही है. गतिरोध समाप्त करने के लिए सरकार और किसानों के बीच ग्यारह दौर की वार्ता में भी कोई नतीजा नहीं निकल पाया है. जहां सरकार इन कानूनों में संशोधन करने की बात कह रही है वहीं किसान संगठन इनकी वापसी पर अड़े हैं. दरअसल, यह मामला स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू करने और उपज के न्यूनतम समर्थन मूल्य से जुड़ा हुआ है जिस पर सरकार कानून बनाने से बचना चाहती है. सरकार पर यह भी आरोप है कि उसने व्यापार संवर्धन की आड़ में आवश्यक वस्तुओं के भंडारण को नियंत्रण मुक्त कर दिया है. इससे आम धारणा है यह बनी है कि सरकार के इस फैसले से कालाबाजारी और जमाखोरी को बढ़ावा मिलेगा और महंगाई बेलगाम हो जाएगी.


सत्ता और किसानों के बीच जारी यह गतिरोध देश के विकास में बाधक बन रहा है. किसान अपना आंदोलन खत्म कर खेतों की ओर कैसे लौटंे, यह बड़ी चुनौती है. बातचीत से हर समस्या का समाधान संभव है इसलिए देश के मुखिया, यानि प्रधानमंत्री को चाहिए कि वे एक कदम आगे बढ़कर इस आंदोलन को समाप्त करवाने की पहल करंे. सरकारें जनभावनाओं की अनदेखी कर कभी भी सफल नहीं हो सकती हैं, राजनीति में सफलता का यही मूलमंत्र है.


5. महंगाई डायन खाए जात है !


कोरोना महामारी के बीच बढ़ती महंगाई का मुद्दा कोढ़ में खाज होने सरीखा है. काम-धंधे चौपट होने के साथ-साथ आसमान छूती महंगाई ने आम आदमी का जीना ही दूभर कर दिया है. पेट्रोल-डीजल पर लगातार टैक्स बढ़ाए जाने से इनकी कीमतों में भारी वृद्धि हुई है जिसने देश के मध्यम वर्ग की कमर तोड़ कर रख दी है. रोजमर्रा की घरेलू चीजों के अलावा खाद्य तेलों के दामों में भी बढ़ोत्तरी हुई है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार खाद्य तेलों के दाम पिछले एक दशक के अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गए हैं. इसके चलते देश में अप्रैल, 2021 के आंकड़ों के मुताबिक थोक मंहगाई दर रिकॉर्ड स्तर (डब्ल्यूपीआई) 10.49 फीसदी पर जा पहुंची है. थोक महंगाई दर का ये ऑल टाइम हाई (सर्वकालिक उच्च स्तर) है.


महामारी संकट के इस दौर में सरकारंे महंगाई पर काबू पाने में नाकामयाब रही हैं. उनकी गलत नीतियों और फैसलों के कारण महंगाई में बेतहाशा इजाफा हुआ है. आज चुनौती इस बात की है कि बढ़ती हुई कीमतों को कैसे नियंत्रित किया जाए. महामारी प्रबंधन और आधारभूत ढांचे के निर्माण के नाम पर सरकार टैक्स वृद्धि को तो जरूरी मानती है लेकिन आय के साधन बढ़ाने और रोजगार उपलब्ध करवाने के नाम पर चुप्पी साध लेती है.


6. बेरोजगारी से त्रस्त है देश की युवा शक्ति


जिस देश में दुनिया की सबसे बड़ी युवाशक्ति निवास करती हो वहां अगर बेरोजगारी पांव पसारे बैठी है तो विकास की कल्पना करना ही बेमानी है. यथार्थ का धरातल ही नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन और अन्य एजेंसियों के ताजा सर्वेक्षण भी स्पष्ट उल्लेख कर रहे हैं कि भारत में बेरोजगारी का ग्राफ बढ़ा है. आईएलओ की मानें तो 2020 में भारत की बेरोजगारी दर बढ़ कर 7.11 फीसदी हो चुकी थी. यह पिछले तीन दशकों की सबसे ज्यादा है. मई 2021 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में शहरी बेरोजगारी दर 17.41 फीसदी पर पहुंच चुकी है. ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं. शिक्षित लोगों मे बेरोजगारी के हालात ये हैं कि चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पद के लिए एमबीए और इंजीनियरिंग के डिग्रीधारी भी आवेदन करते हैं. सरकारी भर्तियों में बेरोजगारों की भीड़ के सामने पदों की संख्या ‘एक अनार सौ बीमार’ वाली हो जाती है. 

जिन युवाओं के दम पर हम उज्ज्वल भविष्य की उम्मीदें लगा रहे हैं, उनके हालात बेरोजगारी के चलते बेहद निराशाजनक हैं. इसका नतीजा यह है कि हमारा युवावर्ग नशे की राह पर चल पड़ा है. युवाओं में आत्महत्या के बढ़ते मामले भी चिंता का विषय हैं. विशेषज्ञों के अनुसार केंद्र व राज्य सरकारें देश में रोजगार आधारित उद्योग और नयी नौकरियां पैदा करने में नाकाम रही हैं. प्रधानमन्त्री की जिस कौशल विकास योजना को लेकर बड़े-बड़े दावे किये जा रहे थे उसके नतीजे भी ढाक के तीन पात वाले रहे हैं. सरकार को चाहिए कि इस मसले पर वह पुनः गंभीरता से विचार करे. देश में बेरोजगारी की दर कम किए बिना विकास का दावा करना कभी भी न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता. .

7. भ्रष्टाचार की बीमारी से जूझता भारत़


‘जल में रहने वाली मछली कब पानी पी ले, किसी को पता ही नहीं चलता’ मौर्यकाल में कही गई चाणक्य की यह उक्ति शासन तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार की समस्या को गंभीरता से व्यक्त करती है. भारत में भ्रष्टाचार की जड़ें अत्यंत गहरी हैं जिन्हें उखाड़ना बड़ी चुनौती है. अंतर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन ‘ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल’ द्वारा हाल ही में जारी ‘भ्रष्टाचार बोध सूचकांक’ (ब्च्प्) में भारत छह पायदान खिसककर 180 देशों में 86वें स्थान पर आ गया है जबकि वर्ष 2019 में वह इस सूची में 80वें स्थान पर था. इसका सीधा अर्थ है कि देश में भ्रष्टाचार निरंतर फल फूल रहा है. राजनीतिक संरक्षण में नौकरशाही ने भ्रष्टाचार के नए आयाम स्थापित किए हैं जो गाहे-बगाहे देश में उजागर होते रहते हैं. यहां तक कि विधायिका के साथ-साथ न्यायपालिका भी इसके प्रभाव से अछूती नहीं रही है.


आंकड़ों और तथ्यों से परे हटकर अगर बात की जाए तो यह मुद्दा मनुष्य की लालची वृत्ति और नैतिक संस्कारों से जुड़ा है. भौतिकवादी विचारधारा के चलते हमारी शिक्षा व्यवस्था से नैतिक मूल्य और संस्कार गायब हो चुके हैं. अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए हम दूसरे का गला काटने से परहेज नहीं करते. फिर भ्रष्ट तरीकों से चुनाव जीत कर आने वाले जनप्रतिनिधियों से आप कितनी उम्मीद कर सकते हैं !


राज्य सरकारों ने भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए अलग से विभाग बना रखे हैं लेकिन विडम्बना यह है कि लचर कानून और प्रक्रियागत खामियों के चलते लोगों में इसका रत्ती भर भी भय नहीं है. कई बार तो स्वयं भ्रष्टाचार निरोधक विभाग के अधिकारी ही रिश्वत लेते पकड़े गए हैं. आलम यह है कि भ्रष्टाचार के आरोप में पकड़े गए अधिकारी और कर्मचारियों को मामले के विचाराधीन रहने के दौरान सरकार पुनः नियुक्ति दे देती है, जिससे रहा सहा भय भी निकल जाता है. जब सत्ता का आधार ही भ्रष्ट तौर तरीकों और जनप्रतिनिधियों की खरीद फरोख्त पर टिका हो तो वहां उम्मीद करना बेमानी हो जाता है.


8. राजनीति में बढ़ता अपराधीकरण


जब संसद और विधानसभाओं में आपराधिक वृत्ति के लोग जनप्रतिनिधि का चोगा पहनकर पहुंचने लगें, तब समझ लेना चाहिए कि लोकतन्त्र के दुर्दिन शुरू हो चुके हैं. भारतीय लोकतन्त्र में भी अपराधीकरण ग्राफ निरन्तर बढ़ रहा है. पिछले दिनों एक बड़ी राष्ट्रीय पार्टी के मुखिया ने तो यहां तक कह दिया था कि उन्हें सिर्फ जिताऊ उम्मीदवार चाहिए भले ही उस पर लाख मुकदमे क्यों ना हों !  


राजनीति में बढ़ता अपराधीकरण देश के समक्ष एक अहम चुनौती है. आज घड़ी संसद और राज्य विधानसभाओं में हमारे कितने ही माननीय हैं जिन पर हत्या, डकैती और बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों के अनेक मामले विभिन्न न्यायालयों में विचाराधीन है. सत्ता हासिल करने के लिए कमोबेश सभी राजनीतिक दल ऐसे लोगों को टिकट थमा देते हैं और उसके बाद ये लोग धन और बाहुबल के प्रयोग से चुनाव भी जीत जाते हैं. जरा सोचिए, आपराधिक वृत्ति के ऐेसे खद्दरधारी लोग देश के विकास में कैसी भूमिका निभा रहे हैं ?

 

हालांकि इस चुनौती को निर्वाचन आयोग ने अपने चुनाव सुधारों के तहत नियंत्रित करने का प्रयास किया है लेकिन कड़े कानून के अभाव में आयोग भी खुद को असहाय पाता है. दरअसल, यह दायित्व देश की सर्वोच्च संसद का है जो अपनी पवित्रता बनाए रखने के लिए इस गंभीर मुद्दे पर इतने कठोर कानून बनाए कि सांसद और विधायक के वेश में कोई अपराधी उनकी चौखट न लांघ सके. अपराधियों का ठिकाना संसद नहीं बल्कि जेल होना चाहिए.


9. कैसे खत्म हो नक्सलवाद


देश की आंतरिक सुरक्षा के मामले में सबसे बड़ी चुनौती नक्सलवाद के खात्मे की है. पिछले एक दशक की बात करें तो नक्सली हमलों में हजारों लोगों की मौत हुई है जिनमें ज्यादातर हमारे सुरक्षा बलों के जवान हैं. देश के पांच बड़े राज्यों में पसरी इस समस्या के मूल में सामाजिक और आर्थिक विषमता है जिसके चलते भूखमरी, गरीबी और बेरोजगारी की मार झेल रहे नक्सल प्रभावित इलाकों में सत्ता के विरुद्ध आक्रोश जमा हुआ है.  इस जनाक्रोश ने वहां के युवा दिमाग में माओ की सोच और हाथों में हथियार थमा दिए हैं. आंदोलन लंबा खींचने की वजह से इसके स्वरूप में भी बदलाव आ गया है और आज नक्सलवाद एक राजनीतिक समस्या का रूप धारण कर चुका है.


हालांकि आंकड़ों पर गौर करें तो नक्सली हिंसा में कमी आई है. गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक 2008 में 5 राज्यों के 223 जिले नक्सली हिंसा से प्रभावित थे लेकिन बातचीत के प्रयासों से 2017 में यह संख्या घटकर 126 रह गई. वर्तमान में केवल 90 जिले नक्सल प्रभावित बताए गए हैं जो देश के 11 राज्यों में फैले हैं.


इस गंभीर और संवेदनशील मुद्दे पर सरकार को खुले मन से समझना होगा कि हर व्यक्ति सम्मान के साथ रोटी कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी सुविधाएं पाने का हकदार है. यदि उसे जीवन यापन की आधारभूत सुविधाएं भी ना मिल पाएं वह आक्रोशित होकर हिंसा का रास्ता अपनाने में देर नहीं लगाता. नक्सलवाद के मुद्दे पर सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की ये पंक्तियां जेहन में चुनौती बनकर खड़ी हो जाती हैं -


देश कागज पर बना

नक्शा नहीं होता

कि एक हिस्से के फट जाने पर

बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें

और नदियां, पर्वत, शहर, गांव

वैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखें

अनमने रहें....


देश में चहुंओर शांति और सौहार्द का वातावरण बना रहे, इसके लिए जरूरी है कि सरकार नक्सलवाद के अंत के लिए सकारात्मक सोच के साथ बातचीत आगे बढ़ाए और पथ भटके हुए नौजवानों को विकास की मुख्य धारा में लाए.


10. धर्म और जातियों में बढ़ता वर्ग संघर्ष


प्राचीनकाल से ही भारतीय समाज धार्मिक और जातिगत विविधता की खूबसूरती को धारण किए हुए है. यहां का हर समाज छोटी-बड़ी जातियों, उप जातियों में बंटा है जिनकी स्वतंत्र धार्मिक मान्यताएं और अपने-अपने रीति रिवाज हैं. इतनी विविधता के बावजूद भारत पूरी दुनिया में सांप्रदायिक सौहार्द की एक अनूठी मिसाल है. जिसे स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी लगातार सहेजने के प्रयास हुए हैं. संविधान में भी इस विविधता की महत्ता को स्वीकारते हुए धर्मनिरपेक्षता को आत्मसात किया गया है. 


लेकिन पिछले कुछ समय से राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए इस धार्मिक और जातिगत विविधता को कट्टरता में बदलने की कोशिशें की जा रही हैं. देश का आम नागरिक जहां ‘हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, आपस में है भाई-भाई‘ के पुरातन सिद्धांत पर जीना चाहता है वहीं ओछी राजनीति हमारे समाज को जातिगत टुकड़ों में तोड़ने पर उतारू है. हिंदू मुस्लिम विभेद की खाई खोदने वाले स्वार्थी तत्वों ने अब एक कदम आगे बढ़कर जातिगत कार्ड खेलने शुरू कर दिए हैं. स्वर्णो में दलित और दलितों में स्वर्ण चिन्हित करने की कवायद जारी है. ‘हर जाति को अपना हक चाहिए’ के स्लोगन चारों ओर उठने लगे हैं. अधिकारी हो या जनप्रतिनिधि, आज सब अपनी जाति और संप्रदाय को महत्त्व देने लगे हैं जिसके चलते अनायास ही हम जातिगत विखण्डन के मार्ग पर बढ़ चले हैं. जातिगत जनगणना की कवायद भी इसी ओछी राजनीति की सोच है जिसने वर्ग संघर्ष को बढ़ाने का काम किया है. यह गंभीर चिंता का विषय है जो प्रत्यक्ष रूप से देश की एकता और अखंडता को प्रभावित करता है. हम भारतीय होने की बजाय अपनी जातियों और धर्मों के गुटों में बंटते जा रहे हैं, यह भारतीय लोकतन्त्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है. 


11. शिक्षा का गिरता स्तर


आजाद भारत के समक्ष आज जितनी भी समस्याएं विद्यमान हैं उन सब के मूल में कमोबेश शैक्षिक व्यवस्था का अवमूल्यन ही है. एक वक्त था जब भारत भूमि पर नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय स्थापित थे जहां दुनिया भर के जिज्ञासु विद्यार्थी अध्ययन के लिए आते थे. लेकिन विदेशी आक्रमणकारियों और लंबी ब्रिटिश दासता के चलते हम ऐसी गौरवशाली विरासत को संभाल नहीं पाए. रही सही कसर लॉर्ड मैकाले की शिक्षा पद्धती ने पूरी कर दी.


आज हमारे शैक्षिक संस्थान गुणवत्ता की दृष्टि से वैश्विक संस्थानों के सामने कहीं नहीं ठहरते. शैक्षिक शोध और अनुसंधान के मामलों में हम बहुत पीछे हैं. अधिकांश विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम वर्षों से नहीं बदले गए हैं. इन पाठ्यक्रमों को अद्यतन (नचकंजम) करना तो दूर, गंभीर त्रुटियों तक को नहीं सुधारा गया है. रही सही कसर निजी विश्वविद्यालयों की व्यवसायिक होड़ ने पूरी कर दी है जहां आज पीएच.डी. तक की डिग्रियां बेची जाती है.


प्राथमिक शिक्षा के हालात तो और ज्यादा खराब हैं. जनकल्याणकारी नीतियों की आड में सरकारों ने विद्यालयों में शैक्षिक उन्नयन को गौण कर दिया है. मिड-डे मील और दुग्ध वितरण जैसी योजनाओं ने स्कूलों के शैक्षिक वातावरण को बुरी तरह से प्रभावित किया है. जरा सोचिए, जिस देश की शैक्षिक व्यवस्था से खेल गायब हो चुके हों, वहां हम ओलम्पिक में पदक लाने की बात करते हैं. यह मज़ाक नहीं ंतो और क्या है ! गंभीर बात यह है कि देश की प्रशासनिक व्यवस्था शिक्षक वर्ग को हमेशा स्टेपनी के रूप में इस्तेमाल करती आई है जिससे शिक्षकों में हमेशा नैराश्य का भाव बना रहता है. नैतिक शिक्षा और मानवीय मूल्यों के संस्कार हमारी शिक्षा व्यवस्था से लगभग गायब हो चुके हैं. 


ऐसी विषम परिस्थितियों में नई शिक्षा नीति के माध्यम से देश की शैक्षिक व्यवस्था को पटरी पर लाना बड़ी चुनौती है. यदि हमारे नेतृत्वकर्ता शिक्षा और शिक्षक की महत्ता को समझ पाएं और उसे ध्यान में रखते हुए नीति निर्माण और क्रियान्वयन हो तो इस चुनौती पर पार पाया जा सकता है.


12. महिलाओं के प्रति अपराध का बढ़ता ग्राफ


जिस देश में ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते‘, ‘नारी तू नारायणी’ जैसे आदर्श रचे गए हों वहां यदि आजादी के 74 साल बाद भी मातृशक्ति को सुरक्षित वातावरण न मिल सके तो यह शासन व्यवस्था के मुंह पर गहरा तमाचा है. आज भी देश में महिलाओं के प्रति हो रहे अपराधों का ग्राफ निरंतर बढ़ रहा है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक, पिछले साल महिला उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और बलात्कार के कुल 4,05,861 मामले दर्ज किए गए हैं जिनमें प्रति दिन औसतन 87 मामले बलात्कार के हैं. यह स्थिति तब है जबकि सामाजिक प्रताड़ना के भय से महिला उत्पीड़न के अधिकांश मामले तो उजागर ही नहीं होते.


हालांकि निर्भया और हाथरस जैसे वीभत्स मामलों के बाद सरकार ने महिला उत्पीड़न के अपराधों से निपटने के लिए कड़े कानून बनाए हैं लेकिन लचर न्याय व्यवस्था के चलते प्रभावशाली अपराधी बच निकलते हैं. दरअसल, महिला सुरक्षा का मुद्दा हमारी सामाजिक मानसिकता से जुड़ा हुआ है जिसमें बदलाव की जरूरत है. सरकारों के साथ-साथ यह हम सबकी सामाजिक जिम्मेदारी है कि देश में मातृशक्ति के लिए सुरक्षित वातावरण का निर्माण करें. समाज में महिलाओं के प्रति हो रहे अपराधों का मुखरता से विरोध करें और पीड़िता को न्याय दिलाने में मदद करें. 


13. साइबर क्राइम के बढ़ते खतरे 


पिछले दो दशकों में सूचना प्रौद्योगिकी ने अत्यंत तीव्र गति से विकास किया है. इसके चलते मनुष्य की इंटरनेट पर निर्भरता भी बढ़ी है. आज सोशल नेटवर्किंग, ऑनलाइन शॉपिंग, डेटा स्टोर, गेमिंग, ऑनलाइन स्टडी, ऑनलाइन जॉब आदि गतिविधियां मानव जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी हैं. लेकिन इस विकास के साथ-साथ दुनिया भर में साइबर अपराधों की अवधारणा भी तेजी से विकसित हुई है जबकि उनकी तुलना में हमारे यहां इन अपराधों की रोकथाम के लिए प्रभावी नियंत्रण व्यवस्था विकसित नहीं हो पाई है. 

भारत जैसे विकासशील देश में, जहां सूचना प्रौद्योगिकी की जटिल तकनीक को समझने के लिए समुचित शैक्षिक वातावरण उपलब्ध नहीं है, वहां ऐसे साइबर अपराधों के खतरे अधिक है. आज घड़ी भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बन चुका है. इसलिए जरूरी है कि साइबर क्राइम की रोकथाम के लिए प्रभावी व्यवस्थाएं विकसित की जाएं.


हालांकि देश में साइबर क्राइम से निपटने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम सन् 2000 से लागू है लेकिन पुलिस और अन्य जांच एजेंसियों के पास ऐसे आपराधिक मामलों में कार्यवाही करने हेतु न तो पर्याप्त संसाधन हैं और न ही तकनीक विशेषज्ञ हैं. आज हैकर्स और सभी वैश्विक आतंकवादी संगठन अत्याधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग कर रहे है, ऐसे में देश की सुरक्षा के लिए जरूरी हो जाता है कि हम भी इस दिशा में अपनी व्यवस्थाओं को आधुनिक रूप देकर मजबूत बनाएं.


14. न्यायपालिका पर बढ़ता मुकदमों का बोझ


आजादी के 74 वर्ष बीतने के बाद भी भारतीय न्याय व्यवस्था की स्थिति सुखद नहीं है. जनसंख्या के अनुपात में न्यायालयों और न्यायाधीशों की कमी के चलते देश में मुकदमों की संख्या निरंतर बढ़ रही है. सर्वोच्च न्यायालय के आंकड़े बताते हैं कि जुलाई, 2020 में देश की जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों में 3.33 करोड़ और उच्च न्यायालयों में 41 लाख मुकदमे लंबित हैं.   उच्चतम न्यायालय का कहना है कि ‘आपराधिक अपीलों का लंबे वक्त से लटका होना’ न्याय व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती है. आर्थिक नजरिए से देखें तो मुकदमों में न्यायिक देरी की भारी कीमत चुकानी पड़ती है. कई बार तो न्याय की उम्मीद में बैठे वादी की मौत भी हो जाती है लेकिन न्याय नहीं मिल पाता.


भारतीय न्यायपालिका में इस स्थिति को सुधारने के लिए गंभीरता से प्रयास करने की जरूरत है. देशभर के न्यायालयों में न्यायाधीशों के रिक्त पदों पर त्वरित भर्ती हो, नए अधीनस्थ न्यायालयों की स्थापना हो, आपराधिक और दीवानी प्रक्रिया संहिता में सामयिक बदलाव हो जिससे मामलों का शीघ्र निस्तारण संभव हो सके. फास्टट्रैक न्यायालयों की तर्ज पर विशेष प्रयोजन से न्यायालय गठन की प्रक्रिया में तेजी लाई जाए तो नई व्यवस्था में सुधार की उम्मीद बनती है.


15. संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता कैसे रहे बरकरार


लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवैधानिक संस्थाओं की अपनी महत्ता है जो बिना किसी राजनीतिक दबाव के शासन प्रणाली के सफल संचालन हेतु काम करती हैं. रिजर्व बैंक, निर्वाचन आयोग, सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय, सीएजी, सीबीडीटी और संघ लोक सेवा आयोग जैसे संस्थानों को भारतीय संविधान में इसीलिए स्वायत्तता प्रदान की गई है ताकि वे सरकारों की कठपुतली न बन सकें. शासन व्यवस्था में लोकतांत्रिक संतुलन बनाए रखने के लिए किए गए ये प्रावधान संवैधानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं.


लेकिन अक्सर देखने में आया है कि सरकारें अपने राजनीतिक हित साधने के लिए इन संस्थानों की कार्यप्रणाली को प्रभावित करती हैं. सीबीआई को तो बहुत बार केंद्र सरकार का तोता तक कहा गया है. हाल ही में संपन्न बंगाल विधान सभा चुनावों में राजनीतिक दलों ने निर्वाचन आयोग के क्रियाकलापों पर उंगली उठाई है. आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय के तो अनेक मामले हैं जहां स्पष्ट रूप से इन संस्थानों का दुरुपयोग दिखाई देता है.


आजाद भारत के समक्ष इन स्वायत्तशासी संस्थानों की स्वतंत्रता बनाए रखना बड़ी चुनौती है. यदि हमारे जनप्रतिनिधि वाकई राष्ट्रवाद और देशहित की बात करते हैं तो उन्हें इन संस्थानों की स्वतंत्रता के हर मामले पर गंभीरता से बोलना चाहिए. संसदीय नियमावली को इतना सुदृढ़ बनाया जाना चाहिए कि ये संस्थान बेखौफ होकर अपना काम कर सकें. लोकतान्त्रिक व्यवस्था की सफलता के लिए सरकारों को इन संस्थाओं की स्वायत्तता से छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए.


भारत के जनगण में इन चुनौतियों का स्वीकार करने की भरपूर क्षमता है. वह तो अपनी करोड़ों आखांे से समय पटल पर नजरें गड़ाए बैठा है. जिस दिन वह उठ खड़ा हुआ, विश्व मंच पर  भारत का परिदृश्य बदल जाएगा. आइए, स्वतन्त्रता दिवस पर अपने जनगण के उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करें. 

-डॉ. हरिमोहन सारस्वत ‘रूंख’



Saturday, 31 July 2021

सेल्यूट सिस्टर्स !

 
 श्रृंखला-मानस के राजहंस )


-वैक्सीनेशन प्रोग्राम में नींव प्रस्तर हैं महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता
- 35000 से अधिक से वैक्सीन लगा चुकी हैंं मनोज कुमारी यादव
- कार्य समय के बाद भी दे रही हैं अमूल्य सेवाएं

क्या आपने कोरोना वैक्सीन डॉज लगवाई है ? यदि हां, तो एक बार वैक्सीनेशन सेंटर पर इंजेक्शन लगाने वाले नर्सिंगकर्मी के चेहरे को दुबारा याद कीजिए. उनके द्वारा लगाए गए टीके ने आपके लिए न सिर्फ कोरोना के खतरे को घटाया है बल्कि जीवन के प्रति डगमगा रहे आपके विश्वास को भी पुनर्स्थापित किया है. क्या इस पुनीत काम के लिए हमें उनका ह्रदय से आभारी नहीं होना चाहिए !

आइए, आज 'मानस के राजहंस' श्रृंखला में टीकाकरण टीम की कुछ समर्पित महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं से रूबरू होते हैं. सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सूरतगढ़ में कार्यरत मनोज कुमारी यादव, प्रेमलता और राजवीर कौर बराड़ राष्ट्रव्यापी वैक्सीनेशन प्रोग्राम में नींव के वे प्रस्तर हैं जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद टीकाकरण को सफल बनाया है. भारत जैसे विकासशील देश में, जहां राजकीय चिकित्सालयों की व्यवस्थाएं किसी से छिपी हुई नहीं है, वहां वैक्सीन प्रोग्राम की अंतिम कड़ी के रूप में इन स्वास्थ्यकर्मियों ने पूरी जिम्मेदारी के साथ समर्पित होकर अपने कर्तव्य का निर्वहन किया है, वह वाकई सराहनीय है.


समीपवर्ती गांव सिधुवाला की मनोज कुमारी यादव पिछले 23 वर्षों से स्वास्थ्य कार्यकर्ता के रूप में सेवाएं दे रही हैं. वे गत 9 वर्षों से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, सूरतगढ़ में कार्यरत है. टीकाकरण केंद्र पर मनोज अब तक लगभग 35000 लोगों को वैक्सीनेट कर चुकी हैं. दिन रात काम करने के बाद भी उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं है. टीकाकरण केंद्र पर भारी भीड़ उमड़ने के बावजूद वह हर व्यक्ति के पूरे मनोयोग से वैक्सीन लगा रही हैं.

इसी कड़ी में केरल की मूल निवासी श्रीमती प्रेमलता वी.डी. हैं जो पिछले 34 वर्षों से राजकीय सेवा में कार्यरत हैं. वे 2001 से सीएचसी, सूरतगढ़ में महिला स्वास्थ्य दर्शिका के रूप में सेवाएं दे रही हैं और वैक्सीनेशन टीम का अहम हिस्सा हैं. वैक्सीनेशन हेतु रजिस्ट्रेशन से लेकर आधार कार्ड की जांच तक का दायित्व बखूबी संभालने वाली प्रेमलता अपने सहकर्मियों को लगातार प्रेरित करती रहती हैं. 

इसी टीम में ऊर्जावान महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता राजवीर कौर बराड़ भी शामिल है जो 4 एल.सी. जैतसर से है. बराड़ की नियुक्ति हाल ही में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में हुई है. वह भी टीकाकरण कार्यक्रम में अपनी महत्वपूर्ण सेवाएं दे रही हैं.

मनोज बताती हैं कि कोरोना वैक्सीन टीकाकरण के चलते उनका कार्यभार बहुत बढ़ गया है. नर्सिंग कर्मियों को अब 13- 14 घंटे तक काम करना पड़ रहा है. इंजेक्शन लगाने से लेकर वैक्सीन प्राप्त करने और उसे विधिवत रूप से स्टोर करने का काम भी उन्हें ही करना होता है. कई बार जिला मुख्यालय से देर रात में वैक्सीन प्राप्त होती है तब कुछ परेशानी बढ़ जाती है. प्रेमलता के अनुसार पब्लिक को इस महत्वपूर्ण काम में सहयोग करना चाहिए. टीकाकरण केंद्र पर कई बार भीड़ के चलते व्यवस्थाएं भी प्रभावित होती है लेकिन यदि थोड़ा सा धैर्य रखा जाए तो सब ठीक हो जाता है. राजवीर कौर का मानना है कि ईश्वर की विशेष कृपा के चलते उन्हें नर्सिंगकर्मी के रूप में जन सेवा करने का सुअवसर प्राप्त हुआ है. 

टीकाकरण अभियान में भी सराहनीय काम

कोरोना वैक्सीनेशन के अलावा इस टीम ने सूरतगढ़ क्षेत्र के लाखों नवजात शिशुओं व गर्भवती महिलाओं के टीकाकरण, पल्स पोलियो अभियान एवं परिवार कल्याण कार्यक्रम में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी है. एक तरफ जहां आम आदमी के पास व्यवस्थाओं के प्रति शिकायतों का अंबार है वही दूसरी और मनोज प्रेमलता और राजवीर जैसी महिला कार्यकर्ताओं का राजकीय सेवा के प्रति समर्पण देखकर राहत महसूस होती है.

इन नर्सिंग कर्मियों की महत्ता पर प्रिंट मीडिया जगत की एक उक्ति याद आती है. कहा जाता है कि आप कितना ही बेहतर समाचार बना लें, कितना ही बेहतर अखबार प्रकाशित कर लें लेकिन यदि अखबार बांटने वाला हॉकर उसे समय पर पाठकों तक नहीं पहुंचाएगा तो सब व्यर्थ है. कमोबेश ऐसी ही कुछ बात वैक्सीनेशन प्रोग्राम की अंतिम कड़ी के रूप में काम कर रहे इन नर्सिंगकर्मियों की सेवाओं की है. वैक्सीन कितनी ही बढ़िया और प्रभावी क्यों ना हो, जब तक उसे इन नर्सिंगकर्मियों द्वारा सही ढंग से आमजन को नहीं लगाया जाता तब तक उसका कोई अर्थ नहीं है. 

वाकई, समर्पित सेवाएं देने वाली इन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के लिए एक सेल्यूट तो बनता है. 

            सेल्यूट सिस्टर्स !

-डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

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