Search This Blog

Saturday, 31 July 2021

सेल्यूट सिस्टर्स !

 
 श्रृंखला-मानस के राजहंस )


-वैक्सीनेशन प्रोग्राम में नींव प्रस्तर हैं महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता
- 35000 से अधिक से वैक्सीन लगा चुकी हैंं मनोज कुमारी यादव
- कार्य समय के बाद भी दे रही हैं अमूल्य सेवाएं

क्या आपने कोरोना वैक्सीन डॉज लगवाई है ? यदि हां, तो एक बार वैक्सीनेशन सेंटर पर इंजेक्शन लगाने वाले नर्सिंगकर्मी के चेहरे को दुबारा याद कीजिए. उनके द्वारा लगाए गए टीके ने आपके लिए न सिर्फ कोरोना के खतरे को घटाया है बल्कि जीवन के प्रति डगमगा रहे आपके विश्वास को भी पुनर्स्थापित किया है. क्या इस पुनीत काम के लिए हमें उनका ह्रदय से आभारी नहीं होना चाहिए !

आइए, आज 'मानस के राजहंस' श्रृंखला में टीकाकरण टीम की कुछ समर्पित महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं से रूबरू होते हैं. सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सूरतगढ़ में कार्यरत मनोज कुमारी यादव, प्रेमलता और राजवीर कौर बराड़ राष्ट्रव्यापी वैक्सीनेशन प्रोग्राम में नींव के वे प्रस्तर हैं जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद टीकाकरण को सफल बनाया है. भारत जैसे विकासशील देश में, जहां राजकीय चिकित्सालयों की व्यवस्थाएं किसी से छिपी हुई नहीं है, वहां वैक्सीन प्रोग्राम की अंतिम कड़ी के रूप में इन स्वास्थ्यकर्मियों ने पूरी जिम्मेदारी के साथ समर्पित होकर अपने कर्तव्य का निर्वहन किया है, वह वाकई सराहनीय है.


समीपवर्ती गांव सिधुवाला की मनोज कुमारी यादव पिछले 23 वर्षों से स्वास्थ्य कार्यकर्ता के रूप में सेवाएं दे रही हैं. वे गत 9 वर्षों से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, सूरतगढ़ में कार्यरत है. टीकाकरण केंद्र पर मनोज अब तक लगभग 35000 लोगों को वैक्सीनेट कर चुकी हैं. दिन रात काम करने के बाद भी उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं है. टीकाकरण केंद्र पर भारी भीड़ उमड़ने के बावजूद वह हर व्यक्ति के पूरे मनोयोग से वैक्सीन लगा रही हैं.

इसी कड़ी में केरल की मूल निवासी श्रीमती प्रेमलता वी.डी. हैं जो पिछले 34 वर्षों से राजकीय सेवा में कार्यरत हैं. वे 2001 से सीएचसी, सूरतगढ़ में महिला स्वास्थ्य दर्शिका के रूप में सेवाएं दे रही हैं और वैक्सीनेशन टीम का अहम हिस्सा हैं. वैक्सीनेशन हेतु रजिस्ट्रेशन से लेकर आधार कार्ड की जांच तक का दायित्व बखूबी संभालने वाली प्रेमलता अपने सहकर्मियों को लगातार प्रेरित करती रहती हैं. 

इसी टीम में ऊर्जावान महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता राजवीर कौर बराड़ भी शामिल है जो 4 एल.सी. जैतसर से है. बराड़ की नियुक्ति हाल ही में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में हुई है. वह भी टीकाकरण कार्यक्रम में अपनी महत्वपूर्ण सेवाएं दे रही हैं.

मनोज बताती हैं कि कोरोना वैक्सीन टीकाकरण के चलते उनका कार्यभार बहुत बढ़ गया है. नर्सिंग कर्मियों को अब 13- 14 घंटे तक काम करना पड़ रहा है. इंजेक्शन लगाने से लेकर वैक्सीन प्राप्त करने और उसे विधिवत रूप से स्टोर करने का काम भी उन्हें ही करना होता है. कई बार जिला मुख्यालय से देर रात में वैक्सीन प्राप्त होती है तब कुछ परेशानी बढ़ जाती है. प्रेमलता के अनुसार पब्लिक को इस महत्वपूर्ण काम में सहयोग करना चाहिए. टीकाकरण केंद्र पर कई बार भीड़ के चलते व्यवस्थाएं भी प्रभावित होती है लेकिन यदि थोड़ा सा धैर्य रखा जाए तो सब ठीक हो जाता है. राजवीर कौर का मानना है कि ईश्वर की विशेष कृपा के चलते उन्हें नर्सिंगकर्मी के रूप में जन सेवा करने का सुअवसर प्राप्त हुआ है. 

टीकाकरण अभियान में भी सराहनीय काम

कोरोना वैक्सीनेशन के अलावा इस टीम ने सूरतगढ़ क्षेत्र के लाखों नवजात शिशुओं व गर्भवती महिलाओं के टीकाकरण, पल्स पोलियो अभियान एवं परिवार कल्याण कार्यक्रम में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी है. एक तरफ जहां आम आदमी के पास व्यवस्थाओं के प्रति शिकायतों का अंबार है वही दूसरी और मनोज प्रेमलता और राजवीर जैसी महिला कार्यकर्ताओं का राजकीय सेवा के प्रति समर्पण देखकर राहत महसूस होती है.

इन नर्सिंग कर्मियों की महत्ता पर प्रिंट मीडिया जगत की एक उक्ति याद आती है. कहा जाता है कि आप कितना ही बेहतर समाचार बना लें, कितना ही बेहतर अखबार प्रकाशित कर लें लेकिन यदि अखबार बांटने वाला हॉकर उसे समय पर पाठकों तक नहीं पहुंचाएगा तो सब व्यर्थ है. कमोबेश ऐसी ही कुछ बात वैक्सीनेशन प्रोग्राम की अंतिम कड़ी के रूप में काम कर रहे इन नर्सिंगकर्मियों की सेवाओं की है. वैक्सीन कितनी ही बढ़िया और प्रभावी क्यों ना हो, जब तक उसे इन नर्सिंगकर्मियों द्वारा सही ढंग से आमजन को नहीं लगाया जाता तब तक उसका कोई अर्थ नहीं है. 

वाकई, समर्पित सेवाएं देने वाली इन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के लिए एक सेल्यूट तो बनता है. 

            सेल्यूट सिस्टर्स !

-डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

Monday, 7 June 2021

घर बैठे काले पानी की सजा !

(पर्यावरण)
- कोरोना से अधिक घातक है इंदिरा गांधी नहर में बहता काले पानी का कैंसर

- सोई हुई सरकारों में मूकदर्शक बने हैं जनप्रतिनिधि

- पानी का जहरीला दंश झेलने को मजबूर है प्रदेश की जनता


थार की जीवनदायिनी कही जाने वाली इंदिरा गांधी नहर का नाम बदलकर अब 'इंदिरा गांधी कैंसर वितरण परियोजना' कर दिया जाना चाहिए. बीकानेर संभाग में निरंतर बढ़ रहे कैंसर मामलों के पीड़ित परिवारों का दर्द तो कमोबेश यही स्थिति बयां करता है. इस नहर का पानी, जिसे पश्चिमी राजस्थान के हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, चूरू, बीकानेर, नागौर, जोधपुर, जैसलमेर और बाड़मेर जिलों के लगभग दो करोड़ लोगों द्वारा पेयजल के रूप में काम लिया जाता है, पिछले कुछ वर्षों में खतरनाक ढंग से प्रदूषित हो रहा है, जिसका नतीजा है कि नहर के बहाव क्षेत्र में कैंसर से होने वाली मौतें बढ़ रही है. हर बार नहरबंदी के बाद इस प्रदूषण को लेकर इलाके के जागरूक लोग और विपक्षी नेतागण आवाज उठाते हैं लेकिन सरकारों द्वारा कभी भी स्थाई समाधान के प्रयास नहीं होते.

दरअसल, इंदिरा गांधी नहर में पानी का प्रदूषण एक ऐसा गंभीर मुद्दा है जिसे प्रदेश की कांग्रेस और भाजपा सरकारों ने हमेशा बड़े हल्के में लिया है. यहां तक की इलाके के जनप्रतिनिधि भी इस मुद्दे पर सिवाय बयानबाजी के कुछ खास नहीं कर पाए हैं. इसी लापरवाही का नतीजा है कि पूरा बीकानेर संभाग कैंसर के रोगियों का हॉटस्पॉट बनता जा रहा है. यहां तक कि बठिंडा बीकानेर तक से चलने वाली पैसेंजर कैंसर ट्रेन के रूप में प्रसिद्ध हो गई है.

1956 में पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तान में फैले दस बड़े जिलों में सिंचाई के साथ पेयजल की आपूर्ति के लिए इंदिरा गांधी नहर परियोजना बनाई गई थी जिसे मरू गंगा भी कहा गया. इस नहर को पूर्व में राजस्थान नहर के नाम से जाना जाता था जो एशिया की सबसे बड़ी सिंचाई एवं पेयजल परियोजना थी. 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद इस नहर का नामकरण उनके नाम पर कर दिया गया. इस नहर को थार के रेगिस्तान में अमृतदायिनी के रूप में माना गया था लेकिन विडंबना देखिए कि लापरवाह लोकतांत्रिक व्यवस्था के चलते आज यह नहर प्रदेश के लोगों में धीमा जहर बांटने का काम कर रही है.

फैक्ट फाइल

पंजाब में हरिके बैराज सतलुज व ब्यास नदी के संगम पर है जहां से इंदिरा गांधी नहर का उद्गम होता है. यहां से दो नहरें सरहिन्द फ़ीडर (फ़िरोज़पुर फ़ीडर) व राजस्थान फ़ीडर निकलती है. यही राजस्थान फीडर इंदिरा गांधी कैनाल परियोजना की मुख्य नहर है. तथ्य यह है कि हरिके बैराज से पहले पूर्व की तरफ काला संघिया, चिटी बेई व बूढ़ा नाला बहते हैं. काला संघिया , जालंधर शहर ,फगवाड़ा, कपूरथला, नकोदर, जमशेर आदि शहरों का सीवरेज व चमड़े उद्योग सहित अनेक औद्योगिक उद्यमों का गंदा पानी चीटी बेई से होता हुआ सतलुज में गिरता हैं. माछीवाड़ा की तरफ से राजगढ़, कुम कलां,नीलो ,रख आदि गंदे पानी के नालों का पानी भी बूढ़ा नाला में होते हुए सतलुज में गिरता है. इतना ही नहीं, चीटी बेई व बूढा नाला के जरिये लुधियाना, जालंधर, कपूरथला, नकोदर,फगवाड़ा, माछीवाड़ा आदि जिलों के गांवों व 35 नगरपालिकाओं के सीवरेज व करीब 2500 फैक्टरियों का विषैला पानी सतलुज नदी से होता हुआ इंदिरा गांधी नहर में गिरता है. पंजाब प्रदूषण बोर्ड की 2015 की एक रिपोर्ट के अनुसार सतलुज नदी के पानी मे जिंक, निकल,क्रोमियम, शीशा ,लौह, तांबा की मात्रा अधिक है और यह पीने योग्य नहीं है.

विशेषज्ञों के मुताबिक इस पानी से कैंसर, काला पीलिया, अतिसार, हैजा, पेचिश, मोतीझरा, अंधापन,कुष्टरोग, चर्म व आंतों के रोगों की सर्वाधिक आशंका बनी रहती है. इसके उपयोग से विकलांगता ,मंदबुद्धि,जैसी घातक बीमारियां हो रही हैं. 

समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता एडवोकेट शंकर सोनी बताते हैं कि 2009 में पर्यावरण चिंतक संत बलवीर सिंह सींचेवाल ने राजस्थान का दौरा किया था. उन्होंने पंजाब से आ रहे प्रदूषित पानी पर आवाज उठाई. हनुमानगढ़ की जागरुक संस्था "सावधान" की तरफ से मई 2009 में लोक अदालत, हनुमानगढ़ में राजस्थान व पंजाब सरकार के विरुद्ध याचिका प्रस्तुत की गई. लोक अदालत द्वारा दिनांक दिसम्बर 2011 को राजस्थान सरकार के विरूद्ध आदेश पारित किया गया कि वह इंदिरा गांधी नहर के लिए वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट की स्थापना करे और प्रदूषित जल को स्वच्छ करने के बाद इशनहर में डाले.

लेकिन अफसोस की बात है कि तत्कालीन प्रदेश सरकार सरकार ने अपना दायित्व निभाने की बजाय हाई कोर्ट में रिट संख्या 1291 /2012 पेश कर दी. हाईकोर्ट ने लोक अदालत के आदेश पर से जारी कर दिया जो आज तक लागू है. जब तक इस रिट संख्या 1291 /2012 का निस्तारण नहीं होता समूचे पश्चिम राजस्थान के लगभग दो करोड़ लोग इसी जहरीले पानी को पीने के लिए मजबूर है.

सुलगते सवाल

आखिर कब तक यह घातक खेल जारी रहेगा ? सवाल यह उठते हैं कि -

1. हमारे जल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और सिंचाई विभागों के आला अधिकारी इस मुद्दे पर गंभीरता क्यों नहीं दिखाते ? 

2. सरकार द्वारा जल प्रदूषण की रोकथाम के लिए अत्यंत कड़े कानून बनाए गए हैं तो फिर उन कानूनों की पालना क्यों नहीं होती ? 

3. ऐसे अधिकारी, जो इस नहर में औद्योगिक प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों को प्रदूषण नियंत्रण के वार्षिक प्रमाण पत्र जारी करते हैं, उनके खिलाफ कार्यवाही क्यों नहीं होती ? 

4. पंजाब के जिन शहरों से इस नहर में प्रदूषण युक्त खतरनाक पानी डाला जाता है, उनके स्थानीय प्रशासन और दायी अधिकारियों के खिलाफ सरकारें अपराधिक मुकदमे क्यों दर्ज नहीं करवाती ?

5. राजस्थान में प्रवेश के बाद इस नहर में कुछ लोगों द्वारा सेम नाले का गंदा पानी छोड़ा जाता है. प्रशासन द्वारा उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा क्यों नहीं दर्ज करवाए जाते ?

6. पेयजल के रूप में दिए जाने वाले पानी की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए सरकार गंभीरता क्यों नहीं दिखाती ?

जल प्रदूषण का खतरनाक स्तर


हकीकत तो यह है कि नहरबंदी के बाद जब इंदिरा गांधी नहर में पानी छोड़ा जाता है, उस वक्त का मंजर यदि कोई व्यक्ति अपनी आंखों से देख ले तो वह जिंदगी भर इस नहर का पानी पीना छोड़ दे. लेकिन मजबूरी यह है कि पूरे पश्चिमी राजस्थान के पास पेयजल की आपूर्ति के लिए अन्य कोई विकल्प नहीं है. पंजाब से डाले जा रहे प्रदूषित पानी की बात तो छोड़िए खुद अपने घर में खाली पड़ी इंदिरा गांधी नहर कूड़े-कचरे से भरी मिलती है. कहीं-कहीं तो सीवरेज पानी के साथ मृत पशुओं का जमावड़ा भी देखने को मिलता है. इस बार तो बीरधवाल आर्मी डिपो के बीसियों पुराने बम भी इस नहर में दबे मिले हैं. पानी आने के साथ ही इस नहर को यह सारी गंदगी बहा ले जानी पड़ती है जो अंततः किसी ना किसी शहर अथवा गांव या फिर किसी ढाणी में बने पेयजल संग्रहण में पहुंचती है. इस जल का उपयोग करने वाला परिवार दरअसल पानी नहीं बल्कि अनजाने में कैंसर का प्रसाद ग्रहण करता है. उसे पता ही नहीं होता कि नहर के पानी ने उसके परिवार में मौत बनकर दस्तक दी है.


इस बार भी नहर बंदी के बाद यह प्रदूषित पानी एक बार फिर इलाके के जागरूक लोगों के दिलों में आग लगा रहा है. जनाक्रोश कितना उभरता है यह अलग बात है लेकिन देखना यह है कि क्या इस आग की लपटें सत्ता में बैठे धौळपोसिए नेताओं के कुरतों तक पहुंचती है या नहीं ! 

-डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

दैनिक सीमांत रक्षक 9 जून 2021


दैनिक करंट न्यूज़, दिल्ली 9 जून 2021


Friday, 4 June 2021

कोरोना संकट में विश्वविद्यालय परीक्षाएं-तथ्य एवं सुझाव

(समसामयिक)

कोरोना संकट ने पिछले 18 माह में समूची दुनिया के मानव जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है. हमारी शिक्षण व्यवस्था भी इस महामारी से अछूती नहीं रही है. विद्यार्थी और शिक्षक दोनों मानसिक तनाव में हैं कि आखिर शिक्षण व्यवस्था का क्या होने वाला है. निश्चित रूप से परिस्थितियां विकट हैं लेकिन इसके बावजूद संतोष की बात यह है कि शिक्षकों ने हार नहीं मानी है. कोरोना से जूझते हुए वे अध्ययन और अध्यापन से लेकर परीक्षाओं के आयोजन तक में नवप्रयोग करने की ओर अग्रसर हुए हैं. कोविड-19 के संक्रमणकाल में सरकार को विद्यार्थियों को बिना परीक्षा लिए ही क्रमोन्नत करने जैसे निर्णय भी लेने पड़े हैं परन्तु साथ ही साथ सूचना तकनीक आधारित आॅनलाइन स्टडी में भी खूब वृद्धि हुई है. इन सामयिक परिवर्तनों को सकारात्मक ढंग से लिया जाना चाहिए.

विश्वविद्यालयों की परीक्षा व्यवस्थाएं-तथ्य एवं सुझाव

* विश्वविद्यालय परीक्षाएं करवाई जाएं अथवा नहीं, महामारी के काल में यह गंभीर मुद्दा है. पिछले वर्ष उच्च शिक्षण व्यवस्था में विद्यार्थियों को बिना परीक्षा लिए क्रमोन्नत करने का जो प्रयोग किया गया था वह तात्कालिक समय की मांग थी लेकिन उसे निरंतर जारी रखना किसी भी दृष्टि से उचित प्रतीत नहीं होता. विद्यार्थी जीवन में परीक्षाएं सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती हंै. यदि उन्हें इसके अवसर नहीं मिले तो उनका मानसिक विकास प्रभावित होता है. प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के लिए तो यह स्थिति अत्यंत घातक है. बार-बार बिना परीक्षा के क्रमोन्नति के निर्णय देश की भावी पीढ़ी के मानसिक स्तर को गिरा देते हैं जो वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में किसी भी राष्ट्र की प्रगति और विकास को बुरी तरह प्रभावित करता है. इसलिए कोरोना संकट के बावजूद विश्वविद्यालयों के प्रबंधन को पूरे मनोयोग के साथ वार्षिक परीक्षाएं अवश्य आयोजित करनी चाहिए.


* कोरोना महामारी का समाधान अल्पकाल में होता दिखाई नहीं देता. ऐसी स्थिति में हमें भी जापान की तर्ज पर अपनी परीक्षा प्रणाली को  ’सिस्टम विद कोरोना’ के अनुरूप ढालने की दिशा में कदम बढ़ाने चाहिए. विश्वविद्यालयों को कोरोना संकट में न्यूनतम पांच वर्ष के लिए नवप्रयोगवादी परीक्षा योजना बनाने की आवश्यकता है.


* चूंकि सूचना तकनीक और इंटरनेट के युग में ऑनलाइन एक्जाम का मुद्दा उठ रहा है लेकिन प्रदेश में विद्यमान संसाधनों और जानकारी के अभाव में इस व्यवस्था को हम आज घड़ी लागू करने की स्थिति में नहीं है. अधिकांश विद्यार्थी ग्रामीण क्षेत्र से हैं जहां ऑनलाइन परीक्षा हेतु वांछित भौतिक सुविधाएं उपलब्ध ही नहीं है. लिहाजा वर्तमान में ऑफलाइन परीक्षा व्यवस्था पर ही हमें अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए.

* कोरोना संकट में ‘सोशियल डिस्टेंसिंग’ अत्यंत महत्वपूर्ण है. इसलिए जरूरी है कि विश्वविद्यालय परीक्षा केन्द्रों पर विद्यार्थियों की भीड़ को नियंत्रित करने की दिशा में सारवान कदम उठाएं. नये परीक्षा केन्द्रों के आवेदनों को प्राथमिकता और उदारवादी दृष्टिकोण के साथ निस्तारित किया जाए ताकि अन्य केन्द्रों का भार कम हो सके. जिन केन्द्रों पर भारी भीड़ होती है उनके विद्यार्थी भार को कमभार वाले अन्य निकटवर्ती केन्द्रों पर वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर अंतरित किया जाना चाहिए.


* ‘सोशियल डिस्टेंसिंग’ के मद्देनजर यह आवश्यक है कि परीक्षा समय सारणी बनाते समय विशेष सावधानी बरती जाए. ऐसे विषय, जिनमें विद्यार्थियों की संख्या अधिक है, उनके लिए दिन तय करते समय विशेष कार्य योजना बनाई जाए.


* कोविड नियमावली की पालना के लिए परीक्षा केन्द्रों द्वारा समस्त वांछित व्यवस्थाएं की गई हैं, इसका पूर्व परीक्षण विश्वविद्यालय के उड़नदस्ते द्वारा करवा लिया जाना चाहिए. केन्द्राधीक्षकों की इस सम्बन्ध में परीक्षा से पूर्व वर्चुअल मीटिंग ली जानी चाहिए जिसमें मुद्दे की गंभीरता और उनकी जवाबदेही पर विमर्श होना चाहिए.


* लगभग सभी विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में स्नातक एवं स्नातकोत्तर सत्र 2020-21 का अध्ययन कार्य लगभग समाप्त हो चुका है. विधि और शिक्षण प्रशिक्षण की बात छोड़ दें तो इन पाठ्यक्रमों की परीक्षाओं के आयोजन में पंचवर्षीय परीक्षा योजना बनाते समय निम्न नवप्रयोगों पर विचार किया जा सकता है:-


1. प्रत्येक विषय में विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित सिलेबस का 30 प्रतिशत पाठ्यक्रम महाविद्यालय स्तर पर आयोजित होने वाली अर्द्धवार्षिक परीक्षा योजना तथा शेष 70 प्रतिशत पाठ्यक्रम मुख्य परीक्षा हेतु आरक्षित होना चाहिए. इन दोनो परीक्षाओं में प्राप्तांकों के आधार पर विद्यार्थियों का परीक्षा परिणाम घोषित होना चाहिए. इससे परीक्षा आयोजन का विकेन्द्रीकरण तो होगा ही साथ ही विद्यार्थी पर मुख्य परीक्षा का तनाव भी घटेगा. 


2. महाविद्यालय स्तर पर ली जाने वाली अर्द्धवार्षिक परीक्षा योजना पर गंभीरता से काम होना चाहिए. इस योजना में मौखिक एवं लिखित दोनो प्रकार की परीक्षाओं को समावेश हो तो बेहतर है. दोनो परीक्षाओं का अंक भार 10: 20 के अनुपात में बांटा जा सकता है. महाविद्यालयों को इन परीक्षाओं के वास्तविक रिकार्ड संधारण हेतु पाबंद किया जाना चाहिए. यदि इस रिकार्ड में दोनों परीक्षाओं की विडियोग्राफी शामिल की जाए तो बेहतर परिणाम मिल सकते हैं. विश्वविद्यालय द्वारा मुख्य परीक्षा के आयोजन से पूर्व यह रिकार्ड मांगा जाना चाहिए जिसकी पुष्टि ‘लीगल अंडरटेकिंग’ के रूप में महाविद्यालय के प्राचार्य से करवाई जानी चाहिए.


3. कोरोनाकाल में विद्यार्थियों का लेखन कौशल लगभग छूट सा गया है, इसके लिए जरूरी है कि  अर्द्धवार्षिक परीक्षा योजना में उनसे हर विषय पर वांछित प्रश्नोत्तर की लेखन फाइल तैयार करवाई जाए और उसका विधिवत मूल्यांकन हो. आॅनलाइन शिक्षण प्रणाली में भी यह व्यवस्था अपनाई जा सकती है जहां विद्यार्थी अपनी फाइल तैयार कर पीडीएफ के रूप में प्रेषित कर सकता है. हालांकि हमारे पास एसाइनमेंट सिस्टम विद्यमान है लेकिन वह केवल सैद्धांतिक होकर रह गया है. आवश्यकता इस बात की है कि उसकी कमियों को दूर किया जाए और उसके गंभीर मूल्यांकन की व्यवस्था बनाई जाए. अर्द्धवार्षिक परीक्षा के अंक कुल प्राप्तांको में जुड़ने का नियम विद्यार्थी को अपेक्षाकृत अधिक अनुशासित और नियमित बनाने में भी योगदान करेगा.


4. मुख्य परीक्षाकाल की तीन घंटे की अवधि को घटाकर डेढ़ घंटा किया जाना जरूरी है. यह इसलिए जरूरी है कि हमारे प्रदेश में परीक्षाओं का आयोजन मई, जून और जुलाई महीनों में होता है जब जानलेवा गर्मी पड़ती है और तापमान 50 डिग्री तक पहुंच जाता है. कोरोना संकट में सबकी इम्यूनिटी प्रभावित हुई है लिहाजा विद्यार्थियों के स्वास्थ्य के दृष्टिगत यह कदम उठाया जाना बेहद जरूरी है.


5. कोरोना संकट काल में पाठ्यक्रम का 70 प्रतिशत भाग, जो मुख्य परीक्षा के लिए आरक्षित किया गया है, उसके प्रश्नपत्रों में केवल वस्तुनिष्ठ और अति लघुत्तरात्मक प्रश्नों का ही समावेश होना चाहिए. इसके साथ-साथ विद्यार्थियों को प्रश्नपत्र के सभी प्रश्न करने की बजाय एक निर्धारित प्रतिशत तक हल करने की सुविधा दी जानी चाहिए जो निश्चित रूप से उनका तनाव कम करेगी.


सरकार द्वारा संकट की इस घड़ी में मानवीय जीवन से जुड़ी अत्यावश्यक सेवाओं को सुचारू रूप से जारी रखने का प्रयास किया जा रहा है. विद्यार्थी जीवन में परीक्षा भी अत्यावश्यक सेवा के समान है. इसलिए उच्च शिक्षा से जुड़े समस्त कुलपतियों, प्राचार्यों, शिक्षकवृन्दों और गैर शैक्षणिक स्टाॅफ का सामूहिक दायित्व है कि वे कोरोनाकाल में विद्यार्थियों के हितों को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालयी परीक्षाओं का सफल आयोजन करवाएं और अपनी श्रेष्ठता का सिद्ध करें.


Friday, 28 May 2021

कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे !

प्रस्तावित कार्यालय, जिसे विरोध के चलते शुरू नहीं किया जा सका 

- बजट घोषणा मुताबिक़ सादुल शहर में खुल रहा है दूसरा डीटीओ कार्यालय 


- राजनीतिक शून्यता के चलते सूरतगढ़ की संभावना हुई धराशायी


- सूरतगढ़ समेत कई तहसीलों का क्षेत्राधिकार बदलने की आशंका

( एक्सक्लूसिव स्टोरी)

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की बजट घोषणा के मुताबिक श्रीगंगानगर जिले में दूसरा डीटीओ कार्यालय सादुलशहर तहसील में खुलने जा रहा है. ताजा सूत्रों के मुताबिक जिले की कुछ तहसीलों को सादुलशहर कार्यालय के क्षेत्राधिकार के अंतर्गत लाया जा सकता है. जल्द ही इस आशय का नोटिफिकेशन जारी होने वाला है. इन तहसीलों में सूरतगढ़ को भी शामिल करने की बात की जा रही है. यदि ऐसा किया जाता है तो वाकई इस क्षेत्र का दुर्भाग्य होगा. जिले की अन्य तहसीलाें काे सादुलशहर डीटीओ ऑफिस से जाेड़ने पर लोगों की परेशानियां खत्म होने की बजाय बढ़ जाएगी. 
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा की गई बजट घोषणा

सूरतगढ़ के सपने हुए धराशाई

सरकार के इस फैसले के कारण सूरतगढ़ में चल रहे डीटीओ कार्यालय के विस्तार और नया कोड मिलने की संभावनाएं एकबारगी तो धराशाई हो गई हैं. इसे जनप्रतिनिधियों की लापरवाही और राजनीतिक शून्यता का परिणाम ही कहा जाना चाहिए. कुछ समय पूर्व नेशनल हाईवे का सहायक अभियंता कार्यालय भी चुपचाप सूरतगढ़ से बीकानेर अंतरित हो गया था. इस लिहाज से यह दूसरा बड़ा मामला है जिसमें जनप्रतिनिधियों की चुप्पी इलाके के विकास पर भारी पड़ी है.

24 फरवरी को हुई बजट घोषणा में सरकार के इस निर्णय से अफसराें के साथ-साथ आमजन को भी हैरानी हुई थी क्योंकि यह सर्वविदित तथ्य है कि भौगोलिक दृष्टि से डीटीओ ऑफिस और नये कोड के लिए सूरतगढ़ और अनूपगढ़ ही सर्वथा उपयुक्त तहसीलें हैं. 

एक नजर तथ्यों पर डालें

हालांकि प्रशासन ने लोगों की सुविधा काे ध्यान में रखते हुए अनूपगढ़ में नया डीटीओ ऑफिस खाेलने का प्रस्ताव भेजा बताते हैं. इसके लिए परिवहन विभाग से तथ्यात्मक रिपोर्ट भी मांगी गई थी. लेकिन राजनीतिक कारणों के चलते राज्य सरकार ने इस प्रस्ताव काे खारिज करते हुए सादुलशहर में डीटीओ ऑफिस खाेलने की बजट घाेषणा कर डाली.

गौरतलब है कि श्रीगंगानगर जिला मुख्यालय से सबसे दूरस्थ क्षेत्र रावला व 365 हेड हैं. जिनकी दूरी 180 से 200 किमी. है. यहां के लोगों को डीटीओ में छोटे-छोटे कामों के लिए पूरा एक दिन खत्म करना पड़ता है. यदि यही डीटीओ कार्यालय अनूपगढ़ या सूरतगढ़ में खुलता तो जनसाधारण के लिए राहत की बात होती. श्रीगंगानगर जिला मुख्यालय से रावला 160 किमी, घड़साना 140, अनूपगढ़ 125 किमी, श्रीविजयनगर 90, रायसिंहनगर 70 व सूरतगढ़ 72 किमी दूर है. जरा सोचिए यदि इन तहसील क्षेत्राें काे सादुलशहर डीटीओ ऑफिस के अधीन किया जाता है ताे आमजन के लिए कितनी बड़ी परेशानी खड़ी हो जाएगी.

जिला मुख्यालय स्थित डीटीओ ऑफिस से सादुलशहर मात्र 30 किमी दूर एक काेने पर बसा हुआ है. इसके एक तरफ पंजाब की सीमा लगती है ताे दूसरी तरफ हनुमानगढ़ जिले की. अन्य तहसील क्षेत्रों के लाेगाें काे यहां पहुुंचने के लिए श्रीगंगानगर जिला मुख्यालय हाेकर ही जाना पड़ता है. जिले में दूरस्थ स्थित किसी भी तहसील की सीमा सादुलशहर को नहीं छूती.

सादुलशहर का निर्णय ही अविवेकपूर्ण 

बजट घोषणा के मुताबिक सादुलशहर में नया डीटीओ कार्यालय खुलना तय है. अब यदि सरकार जन विरोध को देखते हुए इस कार्यालय का क्षेत्राधिकार केवल सादुलशहर तहसील ही सीमित रखती है राजस्व की दृष्टि से सरकार को कोई विशेष फायदा नहीं मिलने वाला. सिर्फ एक तहसील के लिए डीटीओ कार्यालय संचालित होना किसी भी दृष्टि से बुद्धिमानी का निर्णय नहीं कहा जा सकता. यदि यही कार्यालय अनूपगढ़ अथवा सूरतगढ़ में खुलता तो आधे से अधिक जिले को राहत मिलती.

सरकार के इस अविवेकपूर्ण निर्णय के खिलाफ जनप्रतिनिधियों को जागने की जरूरत है. राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर क्षेत्र के नेताओं को सामूहिक रूप से सरकार के इस अविवेकपूर्ण निर्णय में बदलाव की मांग करनी चाहिए. समय रहते यदि ऐसे फैसलों को नहीं बदला जाता है तो आमजन में घोर निराशा फैलेगी. 


Tuesday, 25 May 2021

फिक्र कैसी, नरेन्द्र भाई है ना !


 (मानस के राजहंस)
नरेंद्र चाहर ! एक ऐसा नाम, जो सूरतगढ़ ही नहीं बल्कि आसपास के इलाके में चिकित्सा मित्र के रूप में जाना जाता है. हमेशा मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ मिलने वाले मृदुभाषी नरेंद्र चाहर अपने कर्तव्य के प्रति इतने समर्पित हैं कि आधी रात को आप उन्हें फोन कर लीजिए वे आपके लिए हमेशा तैयार मिलेंगे. दरअसल, नर्सिंग के पेशे से जुड़े लोगों में जिन मानवीय गुणों की अपेक्षा की जाती है उनसे कहीं बढ़कर योग्य है नरेंद्र भाई !

सूरतगढ़ में नेत्रदान की मुहिम को जगाने और उसे विस्तार देने के लिए नरेंद्र चाहर का नाम सबसे ऊपर आता है. शुरुआती दिनों में नेत्रदान के लिए लोगों को प्रेरित करना बड़ी बात थी लेकिन मृत्योपरान्त नेत्र उत्सर्जित करना और उन्हें नियत समय के भीतर जिम्मेदारी के साथ जगदंबा अंध विद्यालय एवं चिकित्सालय, श्रीगंगानगर तक पहुंचाना वाकई जिम्मेदारी का काम होता है. नरेंद्र चाहर ने बरसों तक इस महत्वपूर्ण दायित्व को निभाया है ताकि नेत्रहीन लोग भी यह सुंदर दुनिया देख सकें. इस पुनीत कार्य के लिए उनकी भरपूर सराहना हुई है.

सूरतगढ़ में जब रक्तदान की विधिवत शुरुआत हुई थी उस समय श्री चिरंजीलाल गर्ग और उनकी टीम ने सिटीजन चैंबर्स नामक संस्था में शानदार काम किया था. उनके प्रयासों को गति देने के लिए भी नरेंद्र चाहर को नींव के पत्थर के रूप में देखा जाता है जिन्होंने महावीर इंटरनेशनल के जरिए इस सेवाभावी काम को जन-जन तक पहुंचाया. महावीर इंटरनेशनल की सूरतगढ़ शाखा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में जिस टीम का हाथ रहा है उसके सेंटर फारवर्ड नरेंद्र चाहर ही कहे जा सकते हैं. हालांकि कुछ समय पूर्व नरेंद्र महावीर इंटरनेशनल छोड़ चुके हैं लेकिन इसके बावजूद उनके समर्पित सेवा कार्य निरंतर जारी हैं.

उन्होंने शहर की श्री गौशाला में भी अपनी सेवाएं दी है. गौशाला की व्यवस्थाएं बेहतर बन सकें, इसके लिए वे आज भी प्रयासरत हैं. 

प्रचार प्रसार और सोशल मीडिया से दूर रहने वाले नरेंद्र सही मायनों में अपने नाम को चरितार्थ कर रहे हैं. संस्थागत छल-छंदों और निरर्थक चलती राजनीतिक बहस से दूर नरेंद्र शहर के प्रतिष्ठित बंसल नर्सिंग होम में लंबे समय से अपनी सेवाएं दे रहे हैं. वे हमेशा की तरह आज भी ऊर्जावान हैं और मानव मात्र की सेवा के लिए हर वक्त तैयार हैं. उनकी इस निष्ठा को देखकर एक शेर याद आता है -

वो जहां भी जाएगा, रोशनी फैलाएगा 
किसी चिराग का अपना कोई मकां नहीं होता.

लगे रहो मेरे प्यारे नरेंद्र भाई, ताकि दुनिया और सुंदर बन सके !
-रूंख

Friday, 21 May 2021

अनिल ! सूरतगढ़ को तुम पर नाज़ है.

 (मानस के राजहंस)


अनिल गोदारा ! एक चिर परिचित सा चेहरा, जो आपको राजकीय चिकित्सालय में अक्सर मिल ही जाता है. यूं तो अनिल यहां नर्सिंग ऑफिसर के तौर पर कार्यरत हैं और इन दिनों उप कारागार, सूरतगढ़ में सेवाएं दे रहे हैं लेकिन उनकी खूबी यह है कि ड्यूटी ऑवर्स के बाद भी उनकी सेवाएं जारी रहती है. जेल में नियुक्ति के बाद अनिल वहां की चिकित्सा व्यवस्थाओं में सुधार के लिए भी निरंतर प्रयास कर रहे हैं. उनके इन प्रयासों के सकारात्मक परिणाम भी मिलने लगे हैं.

कोरोना संकटकाल में राजकीय चिकित्सालय का पूरा नर्सिंग स्टाफ व्यवस्था बनाने के लिए जूझ रहा है. डॉक्टर्स के साथ दिन रात भाग-दौड़ करते हुए इन कोरोना वारियर्स में भी थकान और निराशा के भाव कभी-कभी दिख जाते हैं लेकिन टीम का मनोबल कमजोर ना पड़े, इसमें अनिल गोदारा की महती भूमिका रहती हैं. अपनी उपस्थिति मात्र से ही सब का हौसला बढ़ा देने वाले अनिल गोदारा सकारात्मक सोच के साथ समस्याओं का हल निकालने में विश्वास रखते हैं. बात चिकित्सकों की हो या अपने सहकर्मियों की, अनिल हमेशा मदद के लिए तैयार रहते हैं. यहां तक कि चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की हौसला अफजाई में भी पीछे नहीं रहते. अपने साथियों के हितों के लिए उच्चाधिकारियों से भिड़ जाना अनिल की नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है.

ट्रॉमा सेंटर में चल रहे कोविड केयर वार्ड में इन दिनों रोगियों का जमावड़ा रहता है. वैक्सीनेशन और रजिस्ट्रेशन का काम भी लगातार चलता है. इन सबके बीच दुर्घटनाओं के मामले भी आते रहते हैं. कार्य की इतनी व्यस्तता के बावजूद अनिल वरिष्ठ चिकित्सकों के मार्गदर्शन में अपने नर्सिंग साथियों के साथ व्यवस्थाओं को बखूबी संभालते हैं. रोगियों के ऑक्सीजन से लेकर एंबुलेंस व्यवस्थाओं तक की देखरेख में अनिल निस्वार्थ भाव से सहयोग करते हैं.

यदि आपको राजकीय चिकित्सालय में चिकित्सा संबंधी किसी भी प्रकार की दिक्कत आ रही हो, तो आपको घबराने की जरूरत नहीं है. आप अपने स्तर पर समस्या को यदि नहीं सुलझा पा रहे हो तो अनिल गोदारा को ढूंढिए. यदि यह शख्स वहां हुआ तो यकीन जानिए आपकी समस्या का बेहतर समाधान उपलब्ध होगा. किसी कारणवश यदि अनिल मौके पर नहीं है तो आप फोन कर लीजिए. आपको महसूस होगा कि आपने सही नंबर डायल किया है. आखिर सूरतगढ़ को यूं ही तो नाज़ नहीं है अनिल गोदारा पर !

लगे रहो मेरे दोस्त ताकि ये उदास सी दुनिया सुंदर बन सके.

Tuesday, 18 May 2021

बमों से कब तक खैर मनाइएगा !

-  लगातार मिल रहे हैं जिंदा बम


- मूकदर्शक हैं पुलिस और प्रशासन

- अग्निकांड के 20 साल बाद भी नहीं थम रहा सिलसिला

(खास रपट)
डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित श्रीगंगानगर जिले की सूरतगढ़ तहसील में सेना के जिंदा बमों के मिलने का सिलसिला जारी है. पिछले एक सप्ताह में ही इंदिरा गांधी नहर के समीप अलग-अलग स्थानों पर दस जिंदा बम लावारिस हालत में पड़े मिले हैं. प्रथम दृष्टया ये बम काफी पुराने लगते हैं लेकिन इसके बावजूद यह पूरा मामला अत्यंत गंभीर है और सेना के साथ-साथ हमारी प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर बड़े सवाल खड़े करता है. 

कल्पना कीजिए कि इंदिरा गांधी नहर में मिले ये बम यदि जल के बहाव के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में चले जाते और वहां किसी भी रासायनिक प्रक्रिया अथवा अन्य कारणों से इनमें विस्फोट होता तो जान माल का कितना बड़ा नुकसान होता. ऐसे जाने कितने बम आसपास के क्षेत्र में दबे पड़े हैं, पुलिस और प्रशासन को इसकी कोई जानकारी नहीं है. जबकि गोला बारूद के मामले में ऐसी लापरवाही कई बार बहुत भारी पड़ती है. 

इस इलाके में पूर्व में भी अनेक स्थानों पर इस प्रकार के जिंदा बम मिलते रहे हैं. पिछले कुछ सालों से रेलवे लाइन और राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 62 के आसपास इन बमों के मिलने का सिलसिला लगातार जारी है. कभी खेतों में, तो कभी नहरों में मिलने वाले इन बमों के संबंध पुलिस और सेना इतना करती है कि इन्हें मौके पर जाकर डिफ्यूज करवा देती है. संबंधित थाने के रोजनामचे में इसकी एक रपट दर्ज होती है. जिसके आधार पर पुलिस सेना को सूचना दिए जाने और बम डिफ्यूज होने का विवरण अपने रिकॉर्ड में दर्ज कर लेती है. बस किस्सा खत्म....! 

सेना अपने स्तर पर इन बमों के संबंध में जो कार्यवाही करती है, उसकी जानकारी मीडिया तक पहुंच ही नहीं पाती. सवाल यह उठता है कि आखिर ये जिंदा बम आते कहां से है ! 

दरअसल, पुलिस और सेना दोनों ही ऐसे मामलों को सन 2001 में बीरधवाल आयुध डिपो में लगी भीषण आग से जोड़कर देखती है. उनकी मानें तो ये वही बम हैं जो उस अग्निकांड के प्रभाव से उछलकर दूर-दूर तक जा गिरे थे.

यदि वाकई ऐसा है तो मामला और गंभीर हो जाता है. जो जिंदा बम आज मिल रहे हैं, वे आयुध डिपो के स्टॉक रजिस्टर 2001 में दर्ज बम स्टॉक का हिस्सा है, इसके बारे में पुलिस-प्रशासन को कोई पुख्ता जानकारी नहीं है और सेना इस तरह की कोई रिपोर्ट जारी नहीं करती. खुफिया एजेंसियां ऐसे मामलों में सक्रिय होती जरूर है लेकिन वे क्या रिपोर्ट देती हैं, सरकारी स्तर पर इसका खुलासा कभी भी नहीं किया गया है.

मूकदर्शक बना है पुलिस-प्रशासन

सैन्य दृष्टि से सूरतगढ़ भारत का एक महत्वपूर्ण केंद्र है जहां सेना की छावनी और वायु सेना का भूमिगत हवाई अड्डा है. सूरतगढ़ से ही सटी हुई महाजन फील्ड फायरिंग रेंज है जहां बोफोर्स तोपों की ट्रेनिंग होती रही है. ऐसे मामलों में सेना, पुलिस और प्रशासन को चाहिए कि ऐसे मामलों के स्थाई निस्तारण का प्रयास हो. अभी न जाने कितने जिंदा बम इस क्षेत्र में जमींदोज है जो कभी भी संकट खड़ा कर सकते हैं. उन बमों को खोजना और उन्हें डिफ्यूज करना अत्यंत आवश्यक है लेकिन सेना के साथ-साथ पुलिस और प्रशासन भी मूकदर्शक बने हुए हैं.

जिला कलेक्टर जाकिर हुसैन से जब इस संबंध में बातचीत की गई तो उन्होंने इसे गंभीर मामला बताया. उनका कहना था कि इस मामले में सेना के अधिकारियों से विस्तृत बातचीत की जाएगी और यदि जरूरत हुई तो एक बार फिर पूरे क्षेत्र में सर्च अभियान चलाया जाएगा. 

जिंदा बमों के इस मामले में स्थानीय प्रशासन को चुस्ती दिखाने की जरूरत है. इन दिनों में इंदिरा गांधी नहर में बंदी चल रही है और कोरोना लॉकडाउन के चलते आवागमन भी कम है. ऐसे समय में उन्हें सेना के साथ मिलकर आयुध डिपो के आसपास के इलाके में सघन खोज अभियान चलाना चाहिए. यह प्रयास में केवल जमींदोज हुए बमों के खतरों को दूर करेगा बल्कि आए दिन मिलने वाले बमों के मामलों में पुलिस की परेशानियों को भी घटा देगा.

क्या था बीरधवाल आयुध डिपो अग्निकांड

लगभग 20 साल पूर्व सन् 2001 में राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 62 पर स्थित बिरधवाल आयुध डिपो में एक भयानक अग्निकांड हुआ था. इस अग्निकांड में बड़ी संख्या में सेना का गोला बारूद नष्ट हो गया था. यहां तक कि सूरतगढ़ शहर और आसपास के इलाकों को खाली करवाने का भी अलर्ट जारी हो गया था. लेकिन खुशकिस्मती यह रही कि भीषण आग पर बड़ी जल्दी काबू पा लिया गया था. इस घटना के बाद सेना ने इलाके भर में बिखरे जिंदा एवं मृत बमों को एकत्रित करने के लिए सेना खोज अभियान भी चलाया था. 

लेकिन इलाके में मिलने वाले जिंदा बम इस खोज अभियान की पोल खोल रहे हैं. यदि आयुध डिपो के स्टॉक रजिस्टर का भौतिक सत्यापन ठीक ढंग से हुआ होता तो गायब हुए इन बमों की जानकारी सेना के पास अवश्य होती. ऐसा प्रतीत होता है कि अग्निकांड के बाद बचे हुए बम स्टॉक को ही वास्तविक रिकॉर्ड मान लिया गया और कम हुए स्टॉक को आग की भेंट चढ़ा हुआ दिखा दिया गया. 20 साल बाद भी इलाके भर में मिल रहे जिंदा बम इस लापरवाही को उजागर करते हैं.

Sunday, 16 May 2021

सावधान ! बिगड़ रहे हैं हालात

 

- 24 घंटों में कोविड केयर सेंटर में 5 व्यक्तियों की मौत
- संदेह के घेरे में है मौत के सरकारी आंकड़े
- शहर में बढ़ रहे खतरे की गंभीर दास्तां


सूरतगढ़ के राजकीय चिकित्सालय में बने कोविड केयर सेंटर में पिछले 24 घंटों में 5 व्यक्तियों की मौत हो गई है जबकि प्रशासनिक आंकड़ा पूरे गंगानगर जिले में ही इसे शून्य बता रहा है. 

सूरतगढ़ में कोविड-19 का असर कितना गंभीर है, इसे सरकारी आंकड़ों की बजाय यथार्थ के धरातल पर देखा जाना जरूरी है. सरकारी दावे भले ही स्थिति को नियंत्रण में बता रहे हों लेकिन वास्तविकता यह है कि इस बीमारी से होने वाली मौतों में निरंतर इजाफा हो रहा है.

कोविड केयर सेंटर में 24 घंटों में हुई 5 व्यक्तियों की मौत का यह मामला इसलिए गंभीर हो जाता है है कि इस सेंटर पर कुल 30 बेड ही उपलब्ध है और इनमें से कोई भी खाली नहीं है. 30 मरीजों में से पांच की मौत होना कोई छोटी बात नहीं है. हालांकि जन सहयोग के चलते इस सेंटर पर तुलनात्मक रूप से जिले के अन्य केंद्रों की अपेक्षा बेहतर भौतिक व्यवस्थाएं हैं लेकिन विशेषज्ञ चिकित्सकों और जीवन रक्षक दवाओं व उपकरणों के अभाव के चलते इस केंद्र की जोखिम कम नहीं है जबकि यह सामुदायिक केंद्र जिला मुख्यालय के बाद सबसे बड़ा स्वास्थ्य केंद्र है. 

संदेह के घेरे में है मौत के सरकारी आंकड़े


गंभीर बात यह है कि इस केयर सेंटर पर भर्ती होने वाले रोगियों के कोरोना संक्रमण की जांच रिपोर्ट ही समय पर उपलब्ध नहीं होती. ऑक्सीजन लेवल नीचे होने और अन्य लक्षणों के आधार पर मरीज को इस केंद्र पर भर्ती कर लिया जाता है. उसे कोरोना है या नहीं, इसकी जांच रिपोर्ट के बगैर ही उसे कोरोना संक्रमितों के साथ भर्ती करना अपने आप में संभावित खतरे को जन्म देना है. इन रोगियों में से जब किसी की मृत्यु हो जाती है तो सुरक्षा की दृष्टि से प्रशासन उनका कोविड-19 प्रोटोकोल के तहत संस्कार करवाता है. लेकिन मजे की बात देखिए ऐसे रोगी की मृत्यु का आंकड़ा प्रशासनिक रिकॉर्ड में दर्ज नहीं होता क्योंकि उस मरीज की मौत कोरोना से हुई अथवा नहीं, इसकी जानकारी प्रशासन को नहीं है. ऐसी असामयिक मौत को कोरोना मृत्यु में शामिल न किया जाना अपने आप में एक मजाक है.

यही कारण है कि पिछले 24 घंटे में इस केंद्र पर मरने वाले 5 व्यक्तियों की गिनती सरकारी आंकड़े में दर्ज नहीं है. जरा सोचिए, मरीज मर चुका है लेकिन उसके संक्रमण की जांच रिपोर्ट अभी तक आई ही नहीं है. प्रशासन को कम से कम इतनी व्यवस्था तो करनी चाहिए कि सेंटर पर भर्ती मरीजों की जांच रिपोर्ट प्राथमिकता के साथ तुरंत उपलब्ध हो सके. दूसरा पहलू भी अत्यंत गंभीर है. कल्पना करें कि जिस व्यक्ति का ऑक्सीजन लेवल कोरोना की बजाय किन्ही अन्य कारणों से घट गया हो, उसे भी संभावित कोरोना पीड़ित मानते हुए संक्रमित रोगियों के साथ भर्ती कर देना कैसा मजाक है !

बहरहाल, रविवार को हुई पांच मौतों का यह मामला सीधा-सीधा खतरे का संकेत है कि सभी लोग संभल जाएं और बचाव के लिए नियमों की पालना करें. संकट की इस घड़ी में सभी से अपेक्षा है कि मास्क पहन कर रखें और बिना काम घर से ना निकलें.

तीज तिंवारां बावड़ी...!

पुन्न बडेरां  रा  आछा, बरकत है बां  री रीतां  में तिंवार बणाया इस्या इस्या गाया जावै जका गीतां में राजी राखै रामजी ! आज बात आपणै तिंवारां री...

Popular Posts