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Tuesday 18 May 2021

बमों से कब तक खैर मनाइएगा !

-  लगातार मिल रहे हैं जिंदा बम


- मूकदर्शक हैं पुलिस और प्रशासन

- अग्निकांड के 20 साल बाद भी नहीं थम रहा सिलसिला

(खास रपट)
डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित श्रीगंगानगर जिले की सूरतगढ़ तहसील में सेना के जिंदा बमों के मिलने का सिलसिला जारी है. पिछले एक सप्ताह में ही इंदिरा गांधी नहर के समीप अलग-अलग स्थानों पर दस जिंदा बम लावारिस हालत में पड़े मिले हैं. प्रथम दृष्टया ये बम काफी पुराने लगते हैं लेकिन इसके बावजूद यह पूरा मामला अत्यंत गंभीर है और सेना के साथ-साथ हमारी प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर बड़े सवाल खड़े करता है. 

कल्पना कीजिए कि इंदिरा गांधी नहर में मिले ये बम यदि जल के बहाव के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में चले जाते और वहां किसी भी रासायनिक प्रक्रिया अथवा अन्य कारणों से इनमें विस्फोट होता तो जान माल का कितना बड़ा नुकसान होता. ऐसे जाने कितने बम आसपास के क्षेत्र में दबे पड़े हैं, पुलिस और प्रशासन को इसकी कोई जानकारी नहीं है. जबकि गोला बारूद के मामले में ऐसी लापरवाही कई बार बहुत भारी पड़ती है. 

इस इलाके में पूर्व में भी अनेक स्थानों पर इस प्रकार के जिंदा बम मिलते रहे हैं. पिछले कुछ सालों से रेलवे लाइन और राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 62 के आसपास इन बमों के मिलने का सिलसिला लगातार जारी है. कभी खेतों में, तो कभी नहरों में मिलने वाले इन बमों के संबंध पुलिस और सेना इतना करती है कि इन्हें मौके पर जाकर डिफ्यूज करवा देती है. संबंधित थाने के रोजनामचे में इसकी एक रपट दर्ज होती है. जिसके आधार पर पुलिस सेना को सूचना दिए जाने और बम डिफ्यूज होने का विवरण अपने रिकॉर्ड में दर्ज कर लेती है. बस किस्सा खत्म....! 

सेना अपने स्तर पर इन बमों के संबंध में जो कार्यवाही करती है, उसकी जानकारी मीडिया तक पहुंच ही नहीं पाती. सवाल यह उठता है कि आखिर ये जिंदा बम आते कहां से है ! 

दरअसल, पुलिस और सेना दोनों ही ऐसे मामलों को सन 2001 में बीरधवाल आयुध डिपो में लगी भीषण आग से जोड़कर देखती है. उनकी मानें तो ये वही बम हैं जो उस अग्निकांड के प्रभाव से उछलकर दूर-दूर तक जा गिरे थे.

यदि वाकई ऐसा है तो मामला और गंभीर हो जाता है. जो जिंदा बम आज मिल रहे हैं, वे आयुध डिपो के स्टॉक रजिस्टर 2001 में दर्ज बम स्टॉक का हिस्सा है, इसके बारे में पुलिस-प्रशासन को कोई पुख्ता जानकारी नहीं है और सेना इस तरह की कोई रिपोर्ट जारी नहीं करती. खुफिया एजेंसियां ऐसे मामलों में सक्रिय होती जरूर है लेकिन वे क्या रिपोर्ट देती हैं, सरकारी स्तर पर इसका खुलासा कभी भी नहीं किया गया है.

मूकदर्शक बना है पुलिस-प्रशासन

सैन्य दृष्टि से सूरतगढ़ भारत का एक महत्वपूर्ण केंद्र है जहां सेना की छावनी और वायु सेना का भूमिगत हवाई अड्डा है. सूरतगढ़ से ही सटी हुई महाजन फील्ड फायरिंग रेंज है जहां बोफोर्स तोपों की ट्रेनिंग होती रही है. ऐसे मामलों में सेना, पुलिस और प्रशासन को चाहिए कि ऐसे मामलों के स्थाई निस्तारण का प्रयास हो. अभी न जाने कितने जिंदा बम इस क्षेत्र में जमींदोज है जो कभी भी संकट खड़ा कर सकते हैं. उन बमों को खोजना और उन्हें डिफ्यूज करना अत्यंत आवश्यक है लेकिन सेना के साथ-साथ पुलिस और प्रशासन भी मूकदर्शक बने हुए हैं.

जिला कलेक्टर जाकिर हुसैन से जब इस संबंध में बातचीत की गई तो उन्होंने इसे गंभीर मामला बताया. उनका कहना था कि इस मामले में सेना के अधिकारियों से विस्तृत बातचीत की जाएगी और यदि जरूरत हुई तो एक बार फिर पूरे क्षेत्र में सर्च अभियान चलाया जाएगा. 

जिंदा बमों के इस मामले में स्थानीय प्रशासन को चुस्ती दिखाने की जरूरत है. इन दिनों में इंदिरा गांधी नहर में बंदी चल रही है और कोरोना लॉकडाउन के चलते आवागमन भी कम है. ऐसे समय में उन्हें सेना के साथ मिलकर आयुध डिपो के आसपास के इलाके में सघन खोज अभियान चलाना चाहिए. यह प्रयास में केवल जमींदोज हुए बमों के खतरों को दूर करेगा बल्कि आए दिन मिलने वाले बमों के मामलों में पुलिस की परेशानियों को भी घटा देगा.

क्या था बीरधवाल आयुध डिपो अग्निकांड

लगभग 20 साल पूर्व सन् 2001 में राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 62 पर स्थित बिरधवाल आयुध डिपो में एक भयानक अग्निकांड हुआ था. इस अग्निकांड में बड़ी संख्या में सेना का गोला बारूद नष्ट हो गया था. यहां तक कि सूरतगढ़ शहर और आसपास के इलाकों को खाली करवाने का भी अलर्ट जारी हो गया था. लेकिन खुशकिस्मती यह रही कि भीषण आग पर बड़ी जल्दी काबू पा लिया गया था. इस घटना के बाद सेना ने इलाके भर में बिखरे जिंदा एवं मृत बमों को एकत्रित करने के लिए सेना खोज अभियान भी चलाया था. 

लेकिन इलाके में मिलने वाले जिंदा बम इस खोज अभियान की पोल खोल रहे हैं. यदि आयुध डिपो के स्टॉक रजिस्टर का भौतिक सत्यापन ठीक ढंग से हुआ होता तो गायब हुए इन बमों की जानकारी सेना के पास अवश्य होती. ऐसा प्रतीत होता है कि अग्निकांड के बाद बचे हुए बम स्टॉक को ही वास्तविक रिकॉर्ड मान लिया गया और कम हुए स्टॉक को आग की भेंट चढ़ा हुआ दिखा दिया गया. 20 साल बाद भी इलाके भर में मिल रहे जिंदा बम इस लापरवाही को उजागर करते हैं.

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