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Monday, 18 May 2020

संभावनाओं का शहर है सूरतगढ़

( पधारो म्हारै देस )

सूरतगढ़ ! यानि संभावनाओं का शहर. जी हां, अगर बीकानेर सम्भाग में किसी भी व्यक्ति सेे सूरतगढ़ के बारे में बात की जाए तो कमोबेश यही जवाब मिलेगा कि ‘सूरतगढ़ के क्या कहने, अकाल में भी वहां के बाजार में सुकाल रहता है भई’. वास्तुशास्त्रियों की मानें तो यह शहर अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के चलते विकास के पथ पर निरन्तर उत्तरोत्तर प्रगति करता रहेगा. हकीकत भी यही है कि सूरतगढ़ अपनी विशिष्टताओं के चलते आज प्रदेश ही नहीं भारतवर्ष के नक्शे पर अपना विशेष स्थान रखता है. यहां के धोरों पर विकसित देशों की सैन्य टुकडि़यों के साथ निरन्तर होते युद्धाभ्यासों ने सूरतगढ़ को विश्व मानचित्र पर ला दिया है

सूरतगढ़ आंकड़ों और वास्तु की दृष्टि में

सूरतगढ़ 29.19 डिग्री अक्षांश और 73.54  डिग्री देशान्तर पर स्थित है जो समुद्रतल से 171 मीटर की उंचाई पर स्थित है. प्रदेश मुख्यालय से 412 किमी दूर स्थित यह तहसील 2843.22 किमी क्षेत्र में फैली हुई है जिसमें से लगभग 80 प्रतिशत भाग कृषि  योग्य है. यहां की जलवायु अर्द्ध शुष्क है. सूरतगढ़ में  ग्रीष्मकाल में अत्यधिक गर्मी और शीत ऋतु में अत्यधिक सर्दी का मौसम रहता है. यहां अधिकतम औसत तापमान 16-48 डिग्री सेन्टीग्रेड तक रहता है जबकि न्युनतम 4-20 डिग्री तक चला जाता है.ग्रीष्मकाल में यहां अप्रेल से सितम्बर तक दक्षिण पश्चिमी हवाएं औसतन 12 किलोमीटर की गति से चलती है. वर्षा का औसत 191 मिलीमीटर प्रतिवर्ष है जो जुलाई से सितम्बर के मध्य में होती है. सुकाल के समय मावठ भी हो जाती है.

कुम्भ राशि वाले सूरतगढ़ शहर के कारक ग्रह शनि महाराज है जो न्यायप्रिय व अनुशासनशील होने के साथ शनै-शनै गतिमान रहते हैं. वास्तुशास्त्रियों का मानना है कि  सूरतगढ़ पर वास्तु देव की पूरी कृपा है जिसका कारण यहां की भौगोलिक स्थिति और शहर की बसावट है. पूर्वी-दक्षिणी आग्नेय कोण में स्थित थर्मल के बॉयलर में जबसे अग्नि प्रज्ज्वलित हुई है तब से यहां विकास ने गति पकड़ी है. इसी तरह उत्तर-पूर्व में स्थित घग्घर का पानी जहां धन के आगमन का मार्ग प्रशस्त करता है वहीं दक्षिण-पश्चिम में स्थित बड़े-बडे़ धोरोंं की स्थिरता नैऋत्य कोण को मजबूती प्रदान करती है. शहर की उत्तर दिशा में पानी की ढाब के खत्म होने और धरातल अपेक्षाकृत नीचा होने के कारण यहां की अचल सम्पतियों के मूल्य में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है.

सूरतगढ़ का इतिहास


ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि 1799 ई. में भटनेर विजय के बाद बीकानेर रियासत के महाराजा सूरतसिंह जब घग्गर के लुप्त हुए प्रवाह से गुजरते हुए सोढ़ल की ढाब पर पहुंचे तो उनकी पैनी नजरों ने इस भू-भाग की संभावनाओं को सदियों पहले भांप लिया था और महाजन के दीवान को यहां स्थित अपनी सैन्य टुकड़ी हेतु गढ़ी स्थापित करने का हुक्म दिया था. हालांकि 9वीं-10वीं शताब्दी में सोढ़ावटी के नाम से प्रसिद्ध यह इलाका कई बार बसा और उजड़ा लेकिन 1805 में सूरतसिंह द्वारा गढ़ की स्थापना के बाद से निरन्तर अपनी संभावनाओं को साकार करते हुए आज घड़ी राजस्थान की सबसे अहम तहसील के रूप में सूरतगढ़ अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुआ है. सदियों से विद्यमान विकास की इन्हीं संभावनाओं के चलते राज्य सरकार द्वारा प्रदेश में नये जिले बनाने हेतु गठित की गई कमेटियों की सूची में सूरतगढ़ का नाम हमेशा से शामिल रहता आया है.

कालीबंगां, रंगमहल और बड़ोपळ में पसरे पड़े हड़प्पाकालीन अवशेष आज भी इस भू-भाग के गौरवमयी एवं समृद्ध इतिहास का बखान करते हैं. माना जाता है कि यह क्षेत्र महाभारतकाल में काम्यक वन का क्षेत्र था जिसमें उत्तम ऋषि का आश्रम था. पवित्र सरस्वती और दृषद्वति (हाकडा़) नदियों का प्रवाह स्थल होने के कारण यह क्षेत्र अत्यन्त सुरम्य और विकसित माना जाता था. कदाचित इसीलिए पाण्डव अपने वनवास के दौरान यहां स्थित काम्यक वन में रहे थे. कालान्तर में प्राकृतिक उथल-पुथल के चलते सरस्वती नदी लुप्त हो गई और यह इलाका रेगिस्तान में तब्दील हो कर एकबार फिर से उजाड़ सा हो गया. लेकिन यहां की धरा में जीजिविषा इतनी प्रबल थी कि उसने ढाब का पानी समाप्त नहीं होने दिया. ढाब के इसी पानी में महाराजा सूरतसिंह ने संभावनाओं की लहरें उठती देख कर यहां गढ़ बनाने का मानस बनाया था. 

हालांकि मूल रूप से इस गढ़ की स्थापना का उद्देश्य इलाके में लूटमार करने वाले भाटी और जोइया राजपूतों पर नियन्त्रण रखना था लेकिन बाद में यह बीकानेर रियासत का महत्वपूर्ण सैन्य अड्डा बन गया. गढ़ के निर्माण में प्रयुक्त ईंटों को बड़ोपळ व रंगमहल के अवशेषों से लाकर लगाया गया था. इस गढ़ में बीकानेर महाराजा के आदेश पर पुलिस थाना व तहसील स्थापित की गई. महाराजा रतनसिंह और सरदारसिंह के काल में सूरतगढ़ को अपनी विशेष भौगोलिक स्थिति के कारण राज्य की विशेष तहसील का दर्जा दिया गया. महाराजा डूंगरसिंह ने अपने कार्यकाल में बीकानेर रियासत को प्रशासनिक सुविधा के लिए बीकानेर, सुजानगढ़, रैनी (तारानगर) और सूरतगढ़ नाम से चार निजामतों में बांट दिया. इन निजामतों में एक-एक नाजिम नियुक्त किया गया था जिसे फौजदारी, दीवानी और माल के सीमित अधिकार थे. सूरतगढ़ के प्रथम निजाम लालजीमल एक योग्य, चतुर व अच्छे प्रशासक थे. निजामत में सरिश्तेदार, अहलमद, मुहाफिज, दफ्तर, गुमास्ता, सवार, सिपाही व चपरासी रखे जाते थे. सूरतगढ़ निजामत में हनुमानगढ़, मिर्जेवाला, अनूपगढ़ व सूरतगढ़ तहसीलें शामिल थी. 

सूरतगढ़ की विकासगाथा


ब्रिटिशकाल में ही 1902 में यहां एंग्लोवरने कूलर प्राइमरी स्कूल, 1908 में पोस्ट ऑफिस और 1917 में नगरपालिका की स्थापना हो चुकी थी. 1927 में गंग नहर आने के बाद गंगानगर को जिला बना सूरतगढ़ निजामत को उसके अधीन कर दिया गया. उसके बाद से प्रगति के नित नये सोपान चढ़ रहे सूरतगढ़ की वास्तविक विकास यात्रा आरम्भ हुई. 1959 में पंचायती राज व्यवस्था आरम्भ होने के साथ ही यहां सूरतगढ़ पंचायत समिति आरम्भ हुई. संचार के क्षेत्र में यहां 1965-66 में टेलिफोन सेवा आरम्भ हुई तथा सन् 2004 में बीएसएनएल की मोबाइल फोन सुविधा शुरू हुई.

 सूरतगढ़ में परिवहन के साधन


यातायात के साधनों की बात करें तो 1889 में बीकानेर-दुलमेरां तक छोटी लाइन बनी और 1902 में बीकानेर भठिण्डा लाइन को चालू किया गया. सूरतगढ़ इस रेल लाइन का एक महत्वपूर्ण स्टेशन बना. इसके बाद कैनाल लूप लाइन और अनूपगढ़ लाइन से जुड़ने के बाद इसे जंक्शन का दर्जा दिया गया. स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद बीकानेर-बठिण्डा लाइन को ब्रोडगेज में बदल दिया गया जिसका नतीजा यह हुआ कि आज अहमदाबाद-जम्मू, जोधपुर-कालका, अवध आसाम, श्रीगंगानगर त्रिरूचरापल्ली जैसी लम्बी दूरी की रेलगाडि़यां सूरतगढ़ से गुजरती हैै. श्रीगंगानगर सूरतगढ़ मार्ग पर छोटी लाइन के आमान परिवर्तन होने के बाद इस मार्ग पर ब्रोडगेज सेवा का यातायात और बढ़ा है. सड़क परिवहन की बात करें तो राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 15, जिसे अब एनएच 62 कर दिया गया है, भी सूरतगढ़ से गुजरता है. इस राजमार्ग की खासियत यह है कि भगवानसर के बाद लगभग 52 किमी यह राजमार्ग बिना किसी मोड़ के बिल्कुल सीधा श्रीगंगानगर की तरफ बढ़ता है. सूरतगढ़ से श्रीगंगानगर 70 किमी और बीकानेर 175 किमी की दूरी पर स्थित है. हनुमानगढ़- सूरतगढ़ के बीच 50 किमी को फोरलेन में तब्दील कर दिया गया है. बीकानेर संभाग में बनने वाला यह पहला फोरलेन राज्य राजमार्ग है. वर्तमान में सूरतगढ़ से जम्मू, लुधियाना, जालंधर, अमृतसर, चंडीगढ़, दिल्ली, उदयपुर, जोधपुर, जयपुर, अजमेर, कोटा आदि स्थानों के लिए बस सेवाएं उपलब्ध हैं.

इन आधार भूत सुविधाओं के साथ सूरतगढ़ की संभावनाओं को साकार करने में कुछ विशिष्ट परियोजनाओं का हाथ रहा है जिनमें इन्दिरागांधी नहर का नाम प्रमुखता से लिया जाना चाहिए. इस परियोजना ने इलाके की काया ही पलट दी है. पेयजल के साथ-साथ बारानी खेतों में सिंचाई हेतु जल उपलब्ध होने से गांवों को तेजी से विकास हुआ है. इलाके में सावणी और हाड़ी की अच्छी फसलों के चलते कृषकों के साथ-साथ व्यापारी वर्ग को भी सम्बल मिला है. 

राष्ट्रीय बीज निगम


इसी तरह 15 अगस्त 1956 को सोवियत संघ के सहयोग से स्थापित हुए केन्द्रीय-राज्य कृषि फार्म ने सूरतगढ़ के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. लगभग 12000 हैक्टेयर कृषि भूमि पर स्थापित इस फार्म में उन्नत किस्म के बीज उत्पादित किये जाते हैं. इस फार्म की सफलता को देखते हुए 1964 में  जैतसर में 5394 हैक्टेयर में भी रूस मैत्री के प्रतीक रूप में फार्म की स्थापना की गई. यह फार्म भारत में ही नहीं अपितु एशिया में अपनी तरह का पहला और अनूठा कृषि फार्म है. सूरतगढ़ के फार्म में तो पशुओं की अच्छी नस्ल तैयार करने हेतु केन्द्रीय पशु नस्ल सुधार केन्द्र भी स्थापित किया गया है जहां कृत्रिम गर्भाधान के द्वारा उच्च गुणवत्ता के दुधारू पशुओं की सैंकड़ों नस्लें तैयार की जाती हैं. फार्म में पशुओं को गुणवत्तापूर्ण चारा उपलब्ध करवाने के लिए चारा उत्पादन केन्द भी फार्म में अलग से स्थापित है. इन कृषि फार्मों को राष्ट्रीय बीज निगम के अधीन कर दिया गया है.

सूरतगढ़ सुपर थर्मल पावर स्टेशन


प्रदेश को विद्युत उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से स्थापित राजस्थान की अति महत्वाकांक्षी परियोजना सूरतगढ़ सुपर थर्मल पावर स्टेशन तहसील के दक्षिणी-पूर्वी भाग में लगभग 27 किमी दूर प्रभातनगर में स्थित है. कोयले द्वारा संचालित इस विद्युत गृह में 1500 मेगावाट की 6 इकाईयां स्थापित हैं. इसके अतिरिक्त 660-660 मेगावाट की दो सुपर क्रिटिकल इकाईयां भी स्थापित की गई हैं जिससे यह विद्युत गृह एशिया की सबसे बड़ी विद्युत परियोजना बनने की ओर अग्रसर हैै. यह परियोजना भी सूरतगढ़ की संभावनाओं में और चमक पैदा कर रही है.

सूरतगढ़ एयरफोर्स स्टेशन व आर्मी कैंट


सामरिक दृष्टि से पाकिस्तान की सीमा के नजदीक महत्वपूर्ण शहर होने के कारण सूूरतगढ़ में भारतीय वायुसेना और थल सेना की छावनी भी स्थापित हैं. इसी इलाके में थलसेना की महाजन फील्ड फायरिंग रेन्ज और बिरधवाल आयुध डिपो सैन्य गतिविधियों के प्रमुख केन्द्र हैं. इन छावनियों व रेन्ज में रहने वाले सैनिकों तथा उनके परिवारों का शहर में आवागमन बने रहने से बाजार में रौनक छाई रहती है. इन्ही संभावनाओं के चलते आज सूरतगढ़ में उपभोक्ता वस्तुओं का लगभग हर ब्राण्ड बाजार में उपलब्ध है जिनमें से कईयों के तो विशाल शोरूम भी खुल चुके हैं. 

1982 में स्थापित सूरतगढ़ आकाशवाणी, जिसे आज कॉटन सिटी चैनल के नाम से जाना जाता है, राजस्थान का सबसेे बड़ा प्रसारण केन्द्र है. 300 किलोवाट क्षमता के इस केन्द्र के कार्यक्रम एशिया भर में सुने और सराहे जाते हैं. औद्योगिक विकास की दृष्टि से सूरतगढ़ का ईंट उद्योग प्रदेश भर र्में इंटों की आपूर्ति करता हैं. यहां बनने वाली ईंटें गुणवत्तापूर्ण होने के साथ-साथ तुलनात्मक रूप सस्ती हैं जिसके चलते उनकी निरन्तर मांग बनी रहती है.सूरतगढ़ के उदयपुर गांव में बांगड़ ग्रुप का नव स्थापित श्री सिमेन्ट कारखाना भी स्थानीय विकास में अपनी भूमिका निभा रहा है. 25 हजार मी. टन की क्षमता वाले इस कारखाने में थर्मल की राख कच्चे माल के तौर पर उपयोग में आती है. हाल ही में श्री सिमेंट द्वारा इस प्लांट की क्षमता वृद्धि हेतु नई यूनिट भी स्थापित की गई है. इस इकाई की सफलता को देखते हुए संभावना है कि निकट भविष्य में यहां और भी कई औद्योगिक इकाईयां स्थापित होंगी जो इलाके के विकास में अहम भूमिका निभाएंगी.

इसी प्रकार चिकित्सा के क्षेत्र में यहां स्थापित एपेक्स सुपर स्पेशियल्टी हॉस्पिटल ने सूरतगढ़ और आस-पास के रोगियों के लिए संजीवनी का काम किया है. इसके अलावा सूरतगढ़ में अनेक निजी चिकित्सालय है जहां कुशल विशेषज्ञ डॉक्टर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. राजकीय चिकित्सालय और ट्रॉमा सेंटर  में  भी बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध है.

सूरतगढ़ में कोचिंग सुविधाएं


आज सूरतगढ़ को प्रदेश में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी हेतु सर्वोत्तम केन्द्र माना जाता है. यहां से निकलने वाले प्रशासनिक अधिकारियों और अन्य परीक्षाओं में सफल अभ्यर्थियों की फौज ने सभी का ध्यान आकृष्ट किया है. इस सफलता के मूल में समर्पित व्यक्तित्व प्रवीण भाटिया की कड़ी मेहनत है जिसने सबसे सस्ती दरों पर कोचिंग करवाने की मुहिम एक गुरूकुल के रूप में चलाई. इसका परिणाम यह है कि आज यहां प्रदेश भर से आए हुए हजारों विद्यार्थी कोचिंग कर रहे हैं. इन विद्यार्थियों के आगमन से शहर की आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव आया है. सूरतगढ़ में कोचिंग सुविधाओं का बड़ी तेजी से विस्तार हुआ है. बैंक, डिफेंस सेवा और शिक्षा सेवा कोचिंग से जुड़े अनेक नये संस्थान भी यहां स्थापित हुए हैं. इन संस्थानों मंे डिजिटल लर्निंग और टैस्ट सीरिज सिस्टम की प्रभावी व्यवस्था देखी जा सकती है. रोजगार के नये-नये रास्ते खुले हैं. इस संभावना को देखते हुए यहां नये-नये कोचिंग संस्थान खुल रहे हैं. इसके अलावा शहर में पीजी कॉलेज, बी.एड.कॉलेज, कृषि महाविद्यालय, एसटीसी कॉलेज, आईटीआई आदि खुलने से शिक्षा का व्यापक प्रचार प्रसार हुआ है. 

शिक्षा के क्षेत्र में हुए अभूतपूर्व सरकारी प्रयास के रूप में यहां स्थित जवाहर नवोदय स्कूल और स्वामी विवेकानंद मॉडल स्कूल भी सफलता की नई इबारतें गढ़ रहे हैं. सीबीएसई से संबद्ध निजी क्षेत्र के कुछ विद्यालयों  ने भी राष्ट्रीय स्तर पर भी अपना परचम लहराया है.

सोढ़ल नगरी में विकास की जो संभावनाएं कभी महाराजा सूरतसिंह ने देखी थी, यह शहर उससे भी कहीं अधिक बढ़कर अपने पंख फैलाने को आतुर है. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आने वाले दिनों में सूरतगढ़ उत्तरोत्तर प्रगति कर विकास की नई कहानी लिखने वाला है.

Friday, 15 May 2020

फोर्ट स्कूल और भटनेर किले के रंग

पगडंडियों के दिन-9

'हे.....वो गया !'
'नहीं गया..... चल, ले एक ट्राई और सही.'
पत्थर पकड़ाते हुए मोहन सिंधी ने कहा.
इस बार पार्टी पक्की. क्यों भाई लोगों, ठीक है ?
'हां, लास्ट चांस है...'
अगर इस बार पत्थर किले के ऊपर नहीं पहुंचा तो हार मान लेना...'
'यार, भटूरे ठंडे हो रहे हैं...'

भटनेर दुर्ग ! 285 ई. में भाटी राजा भूपत द्वारा स्थापित राजपूताने का यह वही किला है जिसे 1398 ई. में क्रूर शासक तैमूरलंग ने जीता था. उसने अपनी पुस्तक 'तुजुक ए तैमूर' में इसे हिंदुस्तान का सबसे मजबूत दुर्ग बताया था और इतिहास गवाह है कि हम लोग इसी किले की प्राचीर पर पत्थर फेंकने की शर्तें लगाते हुए अपनी पढ़ाई कर रहे थे. इस ऐतिहासिक धरोहर की छाया में स्थित फोर्ट स्कूल से मेरे जैसे हजारों विद्यार्थियों ने हायर सेकेंडरी परीक्षा उत्तीर्ण की होगी. आज भी सीनियर सेकेंडरी स्तर तक के सैंकडों विद्यार्थी यहां अध्ययनरत हैं.

1987 की यादों का पिटारा खोलते हैं. इस फोर्ट स्कूल में जब आधी छुट्टी होती तो जंक्शन से आने वाले ज्यादातर विद्यार्थी किले के सामने खड़े हो जाते. रोज एक ही शर्त लगती. किले के ऊपर पत्थर फेंकना है ! शर्त लगाने वाला खुद अपनी मर्जी का पत्थर चुनकर चुनौती स्वीकार करने वाले को देता जो पूरी ताकत से उस पत्थर को किले की ऊंची प्राचीर के दूसरी पार फेंकने की कोशिश करता. ज्यादातर पत्थर दीवार के इस पार ही रह जाते लेकिन जब कोई इस स्पर्धा को जीत लेता तो हीरो बन जाता. हार जीत के इस मनोरंजन का अंत बड़ा सुखद होता जब दोस्तों की टोली बस स्टैंड पर स्थित जनता ढाबे के छोले भटूरों के साथ जीत की पार्टी का आनंद लेती. उन दिनों इस ढाबे पर छोले भटूरे की प्लेट ₹5 में आती थी जिसमें दो भटूरे मिला करते थे. वैसा अनूठा स्वाद आज तक कहीं नहीं मिला, पता नहीं क्यों !

हनुमानगढ़ जंक्शन में उन दिनों हायर सेकेंडरी स्कूल नहीं था लिहाजा सभी विद्यार्थियों को टाउन स्थित फोर्ट स्कूल में ही आना पड़ता. लड़कियों के लिए भी बालिका हायर सेकेंडरी स्कूल टाउन में ही था. निजी स्कूलों में पढ़ने वाले गिने-चुने बच्चे नेहरू मेमोरियल चिल्ड्रन स्कूल में जाते. फोर्ट स्कूल में कला, वाणिज्य और विज्ञान तीनों संकाय थे. वाणिज्य संकाय में ओम प्रकाश जी सुथार और नौरंगलाल जी पढ़ाया करते थे. नौरंगलाल जी लड़कों को 'बालक' कहकर संबोधित करते थे और मौके बेमौके ठुकाई करने से भी नहीं चूकते थे. मेरे मामाजी श्री अन्नाराम सारस्वत भी इसी विद्यालय में इंग्लिश के प्राध्यापक थे. विक्रम सिंह जी स्काउट मास्टर हुआ करते थे जिन के सानिध्य में हमने दो बड़े कैंप अटेंड किए थे. विद्यार्थी संख्या अधिक होने के कारण यह स्कूल दो पारियों में चला करता था. हम लोग सुबह की शिफ्ट में थे.

जंक्शन से टाउन स्थित फोर्ट स्कूल में सुबह 7: 15 बजे तक पहुंचने के दो ही माध्यम थे. पहला रेल्वे स्टेशन से 6:15 बजे चलने वाली सादुलपुर पैसेंजर ट्रेन और दूसरा रोडवेज डिपो से सुबह निकलने वाली लंबी दूरी की बसें. जंक्शन के अधिकांश विद्यार्थी ट्रेन को प्राथमिकता देते. कारण बड़ा साफ और स्पष्ट था. रेलवे घर की थी और विद्यार्थी घर के. फिर कैसा किराया ! बस दिक्कत इतनी थी कि स्कूल पहुंचने के लिए टाउन रेलवे स्टेशन से लगभग 3 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था. परंतु जब दोस्तों का साथ हो तो दूरी मायने नहीं रखती. हां कभी-कभी ट्रेन निकल जाने की स्थिति में रोडवेज डिपो आना पड़ता और बस ड्राइवरों की मिन्नतें करनी पड़ती. कुछ ड्राइवर विद्यार्थियों से परहेज करते जबकि कुछ सहयोग करने वाले होते. विद्यार्थियों की संख्या ज्यादा होने के कारण कई बार बस की छत पर ही बैठना पड़ता. मगर बस का फायदा यह होता कि यह फोर्ट स्कूल के पास में ही उतारती. बस की छत पर सवारी का आनंद लेने वालों में राधेश्याम सोनी, आनंद तिवाड़ी, संजय गुप्ता, संजीव जिंदल, विजय धूड़िया, सुबोध, सारस्वत, अब्दुल खालिक, सतनाम, गुरदीप मशाल, संतोख सिंह जैसे दोस्तों के नाम लिखना शुरू करूं तो.....!

स्कूल टाइम में बहुत बार ऐसा होता कि हम बंक मारकर भटनेर दुर्ग के अंदर चले जाते और दिन भर वहां घूमते रहते. दुर्ग में एक मंदिर और दो-तीन कुंओं के अलावा कुछ भी तो नहीं था. इन कुंओं के बारे में विद्यार्थियों की धारणा थी कि ये सुरंगेंं हैं जो भटनेर से भठिंडा और बीकानेर तक जाती हैं. इतिहास की जाने कितनी परतों को समेटे इस दुर्ग में हम कभी राजा और कभी प्रजा बनकर विचरण करते रहते. 52 बुर्जों वाले इस किले की पश्चिमी दीवार से घग्गर नदी का बहाव क्षेत्र दूर तक फैला हुआ दिखाई देता. इस नदी में पंजाब और हिमाचल की बारिश का पानी आता है जिसे स्थानीय भाषा में 'नाली' कहा जाता है. जब नाली उफान पर होती तो किले से बड़ा मनमोहक नजारा दिखाई देता. मैं अपने दोस्तों के साथ उस किशोरवय अवस्था में अक्सर सोचा करता कि इतना विशाल और मजबूत दुर्ग बिना किसी मशीनी सहायता के कैसे बना होगा. अब जिंदगी की ठोकरें खाने के बाद पता चला है कि कठिन और दुष्कर लगने वाले काम मनुष्य की दृढ़ इच्छाशक्ति के सामने सुगम हो जाते हैं.

एक और महत्वपूर्ण बात जो फोर्ट स्कूल की यादों के साथ जुड़ी हुई है. 1986 में पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था को 10+2 में बदल दिया गया था. उस समय सेकेंडरी परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले विद्यार्थियों के पास कॉलेज में जाने के लिए दो विकल्प थे. या तो वे बोर्ड की हायर सेकेंडरी परीक्षा पास करते या फिर महाविद्यालय में पीयूसी का पाठ्यक्रम उत्तीर्ण करते. इसी के अनुक्रम में राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा 1987 में हायर सेकेंडरी के अंतिम बैच की बोर्ड परीक्षा हुई थी जिसमें मैं भी शामिल था. उसके बाद 10+2 लागू होने के साथ ही यह व्यवस्था पूरी तरह बदल चुकी थी.

व्यवस्थाओं का बदलना प्रकृति का नियम है लेकिन स्मृतियों के ऊपर प्रकृति का वश नहीं चलता. जो बीत चुका है उसे सहेजने का काम मनुष्य को करना है. यदि आपके पास स्मृतियों का खजाना है तो यकीन मानिए आप दुनिया के सबसे अमीर आदमी हैं. यार, थोड़ा सा अमीर मैं भी हूं !
-रूंख

म्हारी सवा लाख री लूम, गम गई इडूणी..

(सन्दर्भ- विकास में गुम होती विरासत)

इडूणी ! सच में ही गुम हो गई है. एक वक्त था जब थार में दूर-दराज से घड़ों में पानी लाने की बात उठती थी तो महिलाएं सबसे पहले इडूणी संभालती. यह इडूणी ही थी जो उनकी मोरनी सी गर्दन की लचक को बरकरार रखते हुए सिर पर पानी से भरे मटके को टिकाए रखती थी. अकाल से जूझते रेगिस्तानी ग्राम्य जन-जीवन में पानी का महत्व भला किसी से छिपा थोड़े ही है और उस पर भी पीने के पानी के मोल के क्या कहने. पानी के इसी मोल को बनाए रखने में घड़े के साथ इडूणी ही साधक बनती थी. स्त्री के सिर पर बिना इडूणी के घड़े की शोभा ही नहीं बनती और कदाचित इसी शोभा को अधिकाधिक प्रगट करने के लिए ग्रामीण स्त्रियां फुरसत के समय भांति-भांति की इडूणियां बनाती. पानी लाते समय सखियां एक दूसरे की इडूणी को देखती और सराहती. 

अपने समय को याद करते हुए गांव देइदासपुरा की सत्तरवर्षीय धापुदेवी बताती हैं कि इडूणी को बनाने के लिए मूंंज को गूंथ कर गोल चुड़ी का आकार दिया जाता था. उस पर कपड़ा चढ़ा कर उसे गोटे, कोर, गोल कांच और कपड़े की चिड़ियों से सजा दिया जाता था. लड़कियों के दहेज में तो भांति-भांति की सजावट वाली इडूणियां दी जाती थी जिनमें क्रोशिये से गुंथी हुई जालीदार इडूणी अधिक चलन में थी. इस जालीदार इडूणी पर घड़ा जचा कर जब  नवविवाहिता गांव के कुएं/तालाब से पानी भरने जाती तो इडूणी से गुंथी हुई जाली उसकी पीठ की शोभा बढ़ाती थी. 

बींझबायला की नारायणीदेवी के अनुसार राजस्थानी संस्कृति में पुत्र जन्मोत्सव पर कुआं पूजने की रस्म है, इसकी अदायगी के लिए स्त्री के पीहर पक्ष के लोग छुछक में इडूणी लाया करते थे जिसे सिर पर सजा कर नवप्रसूता कुएं से पानी लाकर धर्म और परम्पराएं पालती थी. 

थार में अभावों के बीच पलते स्त्रियों के जीवन में कपड़े की रंगीन कतरनों, मोतियों, चीडों, सीपियों और मिणियों की साज-सज्जा वाली आकर्षक इडूणियां जीवन की हूंस का परिचायक थी. चौपाल पर बैठे लोगों को कुएं पर आने वाली महिलाओं के घूंघट में छिपे चेहरों की सुन्दरता  देख पाना भले ही नसीब न हो लेकिन सिर पर टिकी इडूणी की सजावट इन स्त्रियों के कलात्मक गुण को उजागर कर ही देती थी. यह इडूणी का ही कमाल था कि सदियों से अकाल से जूझते राजस्थान में स्त्रियां दूर-दूर के कुंंओंं और तालाबों से सिर पर पानी ढो-ढोकर अपना गृहस्थ धर्म पालती रहीं. इडूणी सिर पर हो तो घड़े को कैसा डर ! इडूणी को सिर पर जचा कर पानी से भरा घड़ा उस पर एक बार टिका लिया तो ग्रामीण महिलाएं बिना डगमगाए, पानी की एक बूंद छलकाए कोसों दूर का सफर साध लेती थी. 

विकासवाद के चलते आज जब गांवों में पीने के पानी की अधिक किल्लत नहीं है तो इडूणी खूंटी पर टांग दी गई है. राजस्थानी संस्कृति का अभिन्न अंग रही इडूणी की विरासत खत्म होने की कगार पर है. हां, कभी-कभी आधुनिकता के परिवेश ढले कुछ घरों मे आजकल ये कलात्मक इडूणियां डाईंगरूम की शोभा बढ़ाती हुई नजर आती हैं. 
-रूंख

Wednesday, 13 May 2020

कैसे आत्मनिर्भर हो किसान !

(सामयिक आलेख)

मानव ने अपने जन्म से ही आत्मनिर्भर बनने के प्रयास जारी रखे हैं. मनुष्य के इन प्रयासों में प्राकृतिक संसाधनों ने हमेशा अपना योगदान दिया है. यह अलग बात है कि आदमी ने इस सहयोग का आभार करने के बजाए इन संसाधनों का अंधाधुंध दोहन कर स्वयं को ही नुकसान पहुंचाया है. अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की यही इंसानी प्रवृत्ति आत्मनिर्भरता की अवधारणा को स्वार्थ लिप्सा में बदल देती है जिसका मूल्य पूरी मानव सभ्यता को चुकाना पड़ता है.

वर्तमान कोरोना संकट भी जानबूझकर की गई ऐसी ही मानवीय गलतियों का नतीजा है जिसने समूचे विश्व को खतरे में डाल दिया है. इस महामारी के आतंक ने एक बार फिर दुनिया के सभी देशों और सामान्यजन को आत्मनिर्भर होने के लिए प्रेरित किया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो लॉकडाउन-3 में अपना उद्बोधन पूरी तरह से इसी विषय पर केंद्रित रखा है और समस्त देशवासियों से आत्मनिर्भर बनने का आह्वान किया है. हालांकि आज वैश्विक परिस्थितियां ऐसी बन चुकी है कि प्रत्येक देश अपनी जरूरतों के लिए एक दूसरे पर निर्भर है लेकिन उसके बावजूद समय की मांग है कि देश में उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करते हुए अधिकांश जरूरी वस्तुओं और सेवाओं का निर्माण देश के भीतर ही किया जाए. स्वदेशी आंदोलन भी इसी आत्मनिर्भरता पर बल देता है.

किसी भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में कृषि, उद्योग-धंधे और सेवा क्षेत्र आधारभूत घटक होते हैं. इन्हीं में मनुष्य अपने जीवन यापन के साधन खोजता है और अपने प्रयासों को गति देने के लिए संसाधनों को जुटाता है. इन तीनों क्षेत्रों का समग्र और सामूहिक विकास ही देश को आत्मनिर्भरता की ओर ले जाता है. इसमें भी कृषि सर्वाधिक महत्वपूर्ण है जो प्रत्येक अर्थव्यवस्था का आधार है. इसका सीधा सा कारण खाद्यान्न है जो मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकता है. शायद इसीलिए प्राचीन भारत में उत्तम खेती, मध्यम व्यापार और निकृष्ट नौकरी की बात कही गई है.

हमारे देश के संदर्भ में कृषि क्षेत्र की बात करें तो स्थिति ज्यादा बेहतर नहीं है. छोटी जोत का या भूमिहीन किसान आज भी दो जून की रोटी के लिए दिन भर कड़ी मेहनत करता है लेकिन फिर भी उसे अपना पेट पालने के लिए कर्ज का सहारा लेना पड़ता है. बड़े जमीदारों की बात छोड़ दें तो साधारण किसान आज भी जीवन यापन के लिए जूझ रहा है. पूंजी की अनुपलब्धता, संसाधनों का अभाव, पानी की कमी, विद्युत संकट, अशिक्षा के चलते नवीन तकनीक का ज्ञान न होना, परंपरागत खेती और कर्जे का बोझ भारतीय किसान को उबरने ही नहीं दे रहा है. इसके बावजूद वह इन कठिनाइयों का सामना करते हुए अपने खेत में फसल उगाता है लेकिन ये फसलें बाजार में पहुंचने तक उसके सारे सपने लील जाती हैं. आज भी भारत में फसलों का मूल्य निर्धारण किसान के लिए सबसे बड़ी समस्या है. कभी-कभी तो उसे अपनी उपज का लागत मूल्य ही नहीं मिल पाता. ऐसी स्थिति में उसके पास भाग्य को कोसने के अलावा कोई चारा नहीं रहता. सरकार द्वारा घोषित फसलों का समर्थन मूल्य हमेशा विवादित रहा है. समर्थन मूल्य निर्धारण पर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें यथावत लागू करने से हर सरकार घबराती रही है. फसल मूल्य निर्धारण में रही सही कसर कमोडिटी एक्सचेंज यानी सट्टा बाजार ने पूरी कर दी है. किसान की फसल को प्राकृतिक आपदाओं से बचाने के लिए यूं तो देश में कृषि फसल बीमा योजना भी लागू है लेकिन यथार्थ के धरातल पर यह योजना अपनी खामियों के चलते कारगर सिद्ध नहीं हो पाई है. इसकी आड़ में कृषि बीमा कंपनियां तो अरबों रुपए के मुनाफे से फल फूल गई हैं लेकिन किसान हमेशा शोषण का शिकार हुआ है. 

70 के दशक में हरित क्रांति की बदौलत भले ही हम खाद्यान्नों के उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गए हो लेकिन किसान के हालात बद से बदतर होते गए हैं. देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था ने किसान को हमेशा वोट बैंक की राजनीति से जोड़कर देखा है. उसे सपने तो बड़े-बड़े दिखाए गए लेकिन उनका लाभ जमींदार से राजनीतिज्ञ बने लोग उठाते रहे. असली किसान आज भी अपने हक से वंचित बैठा है. देश की कर व्यवस्था में भले ही कृषि आय को कर मुक्त रखा गया हो लेकिन सच्चाई यह है कि इस करमुक्त आय का लाभ लेने वाले अधिकांश करदाता खेत की ओर मुंह ही नहीं करते हैं. वे तो अपने स्वामित्व की कृषि भूमि पर फसलें नहीं, आंकड़े उगाते हैं जो अंततः उनकी रिटर्न भरने के काम आते हैं. छलने का यह सारा खेल करमुक्त कृषि आय के नाम पर होता है जिसकी जानकारी हर सरकार को है.

ऐसी परिस्थितियों में अर्थव्यवस्था की नींव कहे जाने वाले किसान को आत्मनिर्भर बनाना आसान नहीं है. उसका मनोबल कर्जे के बोझ और जमीन के कुर्की नोटिस से इतना गिर चुका है कि उसे आत्महत्या भी एक विकल्प दिखने लगी है. यदि सरकार किसान को आत्मनिर्भर बनाने का सपना देखती हैं तो उसके लिए सामूहिक प्रयासों की जरूरत है..ऐसी घातक स्थिति से उबरने के लिए केंद्र और प्रदेश सरकार के साथ-साथ खुद किसान को नए हौंसले के साथ उठना होगा. 

केन्द्र सरकार को दो बिंदुओं पर तुरंत समीक्षा कर कृषि नीति में बदलाव करने चाहिए. पहला कृषि जिंसों का समर्थन मूल्य निर्धारण और दूसरा फसल बीमा योजना. यदि सरकार ईमानदारी से इन दोनों मुद्दों पर किसान हित में काम करती है तो बेहतर परिणाम आ सकते हैं. फसल बीमा कंपनियों द्वारा नुकसानी दावों के मामलों में नियम कायदों का कड़ाई से पालन होना बेहद जरूरी है. जब तक कृषि बीमा फसल योजना में वाहन दुर्घटना बीमा के समकक्ष दावों के भुगतान की प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती, इस बीमा के उद्देश्यों की प्राप्ति में संशय है. तीसरे काम के रूप में केंद्र सरकार को राष्ट्रीय बीज निगम का पुनर्गठन कर उसकी जवाबदेही तय करनी चाहिए. यह बहुत गंभीर तथ्य है कि इस संस्थान की उपस्थिति के बावजूद बीजों के उत्पादन और गुणवत्ता के मामले में निजी कंपनियां कहीं बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं. 

किसान को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रदेश सरकारों को भी कमर कसनी होगी. उन्हें चाहिए कि वे इसकी शुरुआत भू राजस्व कानूनों का सरलीकरण कर राजस्व अधिकारियों की समयबद्ध जवाबदेही तय करने से करें. अक्सर देखा गया है कि बहुत से किसान खातेदारी, गैर खातेदारी, अस्थाई काश्त, भूमि बंटवारे और राजस्व संबंधी अनेक मामलों में लचर कानून व्यवस्था के चलते जीवन भर उलझे रहते हैं. तहसील और वकील के चेंबर में समाधान तलाशता किसान आशंकाओं से घिरा रहता है. मानसिक तनाव की यह स्थिति कृषि और कृषक दोनों के लिए चिंता का विषय है. राज्य सरकारें पड़ोसी राज्यों के साथ हुए जल समझौतों में भी अक्सर लापरवाही बरतती हैं जिसका खामियाजा अंततः किसान को भुगतना पड़ता है. यदि समय पर खेत को पानी न मिले तो काश्तकार की सारी मेहनत व्यर्थ चली जाती है. प्रदेश सरकारों की जिम्मेदारी है कि खेतों में सिंचाई हेतु पर्याप्त पानी मिले और उसके लिए किसान को आंदोलनों का सहारा न लेना पड़े. नलकूपों से सिंचाई व्यवस्था के मामलों में राज्य सरकार को पर्याप्त विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने होंगे. कई राज्यों में हालात यह है कि दसियों साल से किसानों के विद्युत कृषि कनेक्शन आवेदन बकाया पड़े हैं. 

प्रदेश के किसान उन्नत तकनीक का प्रयोग करते हुए अच्छी गुणवत्ता की फसलें उगाने की तरफ कैसे अग्रसर हों, इसके लिए सरकारों को कृषि विशेषज्ञों की कार्यशालाओं का ब्लॉक स्तर पर निरंतर आयोजन करना चाहिए. कृषि विभाग के अतिरिक्त राज्य सरकार के पास पटवारी और ग्राम सचिव नामक दो कार्मिक ऐसे हैं जो किसान मित्र की भूमिका निभा सकते हैं. इन दोनों कार्मिकों की परंपरागत भूमिका में बदलाव की सख्त आवश्यकता है. कृषि कार्यों में गुणवत्ता प्रोत्साहन के लिए पटवारी और ग्राम सेवक की जवाबदेही तय होनी चाहिए. राज्य सरकारों को चाहिए कि वे प्रतिवर्ष बेहतर प्रदर्शन करने वाले किसानों को सम्मानित करने का नव प्रकल्प प्रारंभ करें.

सरकारों के अथक प्रयासों के बावजूद जब तक किसान खुद अपनी कृषि में नवाचारों को लागू नहीं करेगा तब तक बेहतर परिणामों की उम्मीद करना व्यर्थ है. किसान को समझना होगा कि परंपरागत कृषि फसल चक्र को समय की मांग के अनुसार बदलना बेहद जरूरी है. कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली फसलों पर विचार करना होगा. किसान को शिक्षा और तकनीक का महत्व समझते हुए अपनी भावी पीढ़ी को पढ़ने के लिए प्रेरित करना होगा. आज सूचना क्रांति की बदौलत कृषि संबंधी बेहतर मार्गदर्शन और सुझाव किसान की मुट्ठी में है. उसे सिर्फ उनका प्रयोग करना सीखना है. देश में अनेक ऐसे प्रगतिशील किसान है जिन्होंने अपने प्रयासों से न सिर्फ आत्मनिर्भरता हासिल की है बल्कि वे देश के विकास में भी वे अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं.
इन किसानों ने कृषि के प्रति उदासीन होती धारणा को बदल दिया है और इस बात को पुनर्स्थापित किया है कि कृषि में अपार संभावनाएं हैं जिनकी बदौलत देश की अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है. किसान को आत्मनिर्भर बनाने के लिए हमें संकल्पित होकर काम करने की जरूरत है.

                  

                  -डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'


Monday, 11 May 2020

मानस के राजहंस हैं वर्मा ( हमारे प्रेरणादायी व्यक्तित्व)

एक आदमी में होते हैं दस बीस आदमी 
जिसको भी देखना कई बार देखना.

... हमारे आसपास कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जिन्हें हम ठीक ढंग से पहचान भी नहीं पाते. जिंदगी की भागमभाग में औपचारिक अभिवादनों पर टिके संबंधों के पीछे कभी झांकने का मौका मिले तो आप पाएंगे कि ऐसे चेहरे अपनी गंभीरता और स्मित मुस्कान के पीछे कितना कुछ महत्वपूर्ण समेटे हुए हैं. इन व्यक्तियों में कई बार आपको छिपे हुए मानस के राजहंस मिल जाएंगे.

ऐसे ही राजहंस हैं गोपी राम वर्मा. सूरतगढ़ के शक्ति नगर निवासी  और राजस्थान सरकार के राजस्व विभाग में पटवारी के पद से सेवानिवृत्त गोपी राम जी 'रूंख भायला' होने के साथ-साथ संस्कृत के प्रकांड अध्येता हैं. देव भाषा के प्रति उनका अगाध प्रेम ही है कि उन्होंने अपने तीनों बच्चों को संस्कृत शिक्षा में पारंगत कर दिया है. उनकी विवाहित पुत्री ने हाल ही में संस्कृत अध्ययन में पीएचडी की डिग्री हासिल की है. बिंदु देवी द्वारा महाकवि भृतहरि रचित नीतिशतक की सरल शब्दों में व्याख्या की गई है. वे हरियाणा में महाविद्यालय व्याख्याता के रूप में सेवाएं दे रही हैं. वर्मा का बड़ा पुत्र राजकीय सीनियर सेकेंडरी स्कूल में प्राचार्य के पद पर कार्यरत है और संस्कृत अध्यापन में पारंगत है. विश्व संस्कृत सम्मेलन में संस्कृत की वाचन परंपरा में उसने अपनी प्रतिभा सिद्ध की है. उससे छोटा पुत्र भी संस्कृत शिक्षक है. 

गोपीराम जी बताते हैं कि उन्हें संस्कृत अध्ययन का शौक बचपन में अपने ननिहाल से हुआ जहां उनके नाना आयुर्वेद के बड़े वैद्य थे. उनके सानिध्य में रहकर उन्होंने संस्कृत का उच्चारण और वाचन परंपरा सीखी. उनके अनुसार परिवारिक परिस्थितियों के चलते पांचवी कक्षा के बाद उनकी पढ़ाई 16 वर्षों तक बाधित रही. उसके बाद अपनी रुचि के कारण उन्होंने पुन: अध्ययन आरंभ किया और हिंदी और संस्कृत साहित्य में स्नातक की पढ़ाई पूरी की. 

अध्ययनशील व्यक्ति सदैव पुस्तक प्रेमी होता है. गोपी राम वर्मा के पास उपलब्ध ग्रंथों और पुस्तकों का भंडार भी इस बात की साख भरता है. उनके निजी पुस्तकालय में हिंदी व संस्कृत साहित्य के अलावा आयुर्वेद और वन औषधियों के अनेक हस्तलिखित ग्रंथ उपलब्ध है. हस्तलिखित पांडुलिपियों के संबंध में वर्मा जी बताते हैं कि अमरपुरा गांव में एक जमींदार परिवार के पास ये पुश्तैनी ग्रंथ पड़े थे. परिवार का मुखिया इन पुस्तकों को रद्दी में बेच कर पीछा छुड़ाना चाहता था. अपनी पटवारी की सेवा के दौरान अनायास ही वे उस घर में पहुंचे तो दीमक का शिकार हो रही उन पांडुलिपियों को आंगन में फैलाया हुआ था. उन्होंने घर मालिक से निवेदन किया कि वे इन पुस्तकों को ले जाएंगे. बस फिर क्या था. रद्दी में बिकने को तैयार पुस्तकें आज उनके पुस्तकालय की शोभा बढ़ा रही हैं.

वर्मा जी आयुर्वेद और वन औषधियों के गहरे जानकार हैं. उन्होंने अपने घर और मोहल्ले के पार्क में अनेक आयुर्वेदिक औषधियों वाले पेड़-पौधे लगा रखे हैं जिनकी पूरे मनोयोग से देखभाल करते हैं. इनमें इलायची, अपराजिता, पारिजात, शतावरी, ब्राह्मी, अमलतास, सहजन, अर्जुन, सर्पगंधा, मैदा छाल, पलाश, पत्थरचट्टा आदि शामिल हैं. वे मोहल्ले के पार्क में भी सीजनल पौधों की पौध तैयार करते हैं और उसे सब जगह बंटवाते हैं ताकि वातावरण हरा भरा रहे. पार्क में जब कभी कोई पौधों को नुकसान पहुंचाता है तो वर्मा जी उससे लड़ने पर उतारू हो जाते हैं यह पौधों के प्रति उनका अंतस प्रेम है जिस पर कोई लाख बुरा मनाए उनकी बला से.

सच पूछिए तो ऐसे मानस पुत्रों की उपस्थिति से ही यह पृथ्वी हरियाली की चादर ओढ़े है. इन रूंख भायलों ने चुपचाप निर्विकार भाव से असंख्य पेड़ पौधों का संरक्षण किया है. उसी का परिणाम है कि हम खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं. गोपी राम जी वर्मा ! हम आपके ऋणी हैं.

Thursday, 7 May 2020

गोगे माण्डने में छिपा है सृजन का सुख


'गोगा मांडो हो के रे.... !' बालू रेत की धरती पर जब कोई राहगीर रेत का संसार रचते बच्चों से पूछता है तो वे मुस्कुरा देते हैं. थार में बारिश के दिनों में सोनल धोरों पर 'गोगे माण्डना' बाल संस्कारों के साथ-साथ प्राचीन रचनात्मक परम्परा मानी जाती है. गीली बालू रेत पर सृजन करता बाल मन जब अपने हाथों से रचे हुए घर को थपथपा कर आकार देता है तब लगता है साक्षात विश्वकर्मा धरती पर उतर आए हों. राजस्थानी लोक संस्कृति में गोगा शब्द ''थान' का भावार्थ देता है जो घर में बने देवस्थान का पर्यायवाची है. उत्तरी पश्चिमी राजस्थान में लोक देवता गोगा पीर के थान अधिकांश गांवों में देखे जा सकते हैं.

गोगे माण्डने की यह परंपरा थार में शुभ मानी जाती है क्योंकि यह वर्षा से उपजे आनंद और खुशहाली का प्रतीक है.

रेगिस्तान में शीतकाल की बारिश को मावठ के नाम से जाना जाता है. यह बारिश किसानों के लिए अत्यंत लाभदायक होती है. उनकी वर्षा आधारित फसलें इस समय पानी के रूप में अमृतपान करती हैं. ऐसी बारिश के बाद बच्चे घर के दालान में या फिर अपनी ढाणी के आसपास पसरे धोरों में रेत के घर बनाते हैं जिन्हें गोगा कहा जाता है. बात ही बात में घर और गली के बच्चों द्वारा रेत पर पूरा गांव बना दिया जाता है और उसे अनेक प्रकार की साज-सज्जा से संवारा जाता है. बच्चे अपने सधे हुए हाथों से गीली बालू रेत के अनेक घर, आंगन, मंदिर, कुएं बावड़ी और चौपाल तक बना देते हैं. वे अपने पैर के पंजे को गीली रेत से ढक देते हैं और फिर उसे थपथपा कर मंदिर के गुंबद का आकार दे देते हैं. कभी-कभी तो कोरी रेत का यह गुंबद तीन-साढ़े तीन फुट तक ऊंचा बना दिया जाता हैं. उसके बाद धीरे से पंजे को निकाल लिया जाता है. इस प्रकार बालू रेत के बनाए गए 'गोगे' में प्रवेश द्वार तैयार हो जाता है. इसी ढंग से बच्चों द्वारा कमरे और झोपड़ियां भी बनाई जाती हैं जिन्हें थार में उपलब्ध वनस्पति की पत्तियों और फूलों से सजा दिया जाता है. बबूल के पीले फूल इन गोगों की शोभा बढ़ा देते हैं. जब कई बच्चे मिलकर गोगो का बना देते हैं तो वह उसकी सुरक्षा के लिए चारों तरफ किले जैसी चारदीवारी भी खड़ी कर देते हैं. गोगे बनने के बाद बच्चों का उल्लास देखने लायक होता है. हो भी क्यों ना ! घंटों की कारीगरी के बाद वे अपने सपनों का गांव खड़ा करने में सफल होते हैं. इसी बीच आपसी बाल-विवाद के चलते कोई उच्चंखृल बालक अपने पैर से गोगों को गिरा देता है तो उसे बनाने वाले बच्चों, खासतौर से लड़कियों में रुलाई फूट पड़ती है. सपनों के बिखरने का एहसास रचनात्मकता से जुड़े इन बच्चों को समय से पहले ही हो जाता है जिससे उनकी संवेदनशीलता बढ़ती है. यही गोगे मांडने की सच्ची सीख है.

सूचना क्रांति के युग में रचाव की इन परंपराओं से बच्चे विमुख होते जा रहे हैं जबकि मिट्टी में सृजन का यह आनंद अपने आप में अनूठा है. गोगे माण्डने का सौभाग्य सिर्फ थार के बच्चों को ही मिला है. आप कहेंगे ऐसा क्यों ? तो जनाब, सोने जैसी चमकती रेत सिर्फ थार में ही नसीब है. लंदन, पेरिस, दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़ के बच्चे इस सृजन आनंद सिर्फ थार में आकर ही ले सकते हैं. यदि आपने गोगे मांडने का आनंद लिया है तो आप भाग्यशाली हैं. और यदि नहीं, तो फिर पधारिए ना थार में...!
-रूंख

Tuesday, 5 May 2020

विस्थापन का गीत (थार के 34 गांवों का दर्द)


पब्लिक ड्रिंक बनने की राह पर है शराब

कमज़र्फ को साकी जाम न दे, तौहीन होगी मय़खाने की
वो पी लेगा  फिर बहकेगा,  शामत  आएगी  पैमाने की. 

शराब ! मस्त और कभी-कभी अस्त-व्यस्त बना देने वाले इस पेय पदार्थ के बारे में वैदिक काल से लेकर आज तक इतना कुछ लिखा गया है कि यदि शब्द पानी का रूप धर लें तो पृथ्वी पर  विशाल मयसागर दिखाई देगा. देव, गंधर्व, किन्नर, नर, नाग, ऋषि-मुनि, कवि, साहित्यकार और वैज्ञानिकों ने अलग-अलग ढंग से मद्य की व्याख्या की है. त्रेता युग की वाल्मीकि रामायण में राक्षसों द्वारा मद्यपान कर ऋषियों को परेशान करने का जिक्र आता है तो देवलोक की राजसभाओं में सोमरस पान आवभगत की एक अनिवार्य परंपरा के रूप में देखने को मिलती है. महाभारत में भी दुर्योधन पांडवों के मामा मद्रराज शल्य का सुरा के साथ शानदार स्वागत कर उसे अपने पक्ष में युद्ध करने के लिए वचनबद्ध कर लेता है. कलयुग के तो कहने ही क्या ! व्यापारियों, उद्योगपतियों और राजनीतिज्ञों ने तो इस नशीले पानी से जाने कितने हित साधे हैं और आज भी उनके लिए व्यापारिक समझौतों और चुनावी जंग जीतने का यह अचूक हथियार है. भारत में तो इस दिव्यास्त्र के सम्मुख कांग्रेस, भाजपा सहित सभी राजनीतिक दल अपने-अपने घोषणापत्रों को बगल में दबाकर नतमस्तक हो जाते हैं और आशीर्वाद मांगते हैं.
इस मदमस्त पानी ने 'सुरा' से लेकर 'शराब' तक का सफर हर युग में बड़ी शान से तय किया है. सिर पर चढ़ कर बोलने की हिमाकत करने वाली यह मदिरा होठों के जरिए सीधे दिल में उतरती रही है. अमीर इसे 'वाइन' और 'हार्ड ड्रिंक' कहकर सम्मान देता है तो वहीं आम आदमी के लिए यह सिर्फ 'दारू' है. 'जिसमें मिला दो, उसी रंग जैसी...' का भाव रखने वाली यह मदिरा जब इतनी महत्वपूर्ण है तो फिर इस पर लगी बंदिशें सवाल खड़ा करती हैं.

लॉकडाउन-2 के बाद मिली थोड़ी सी राहत के माहौल में शराब के लिए पूरे देश में जिस कदर मारामारी दिखाई दी है उससे यह लगता है कि अब शराब पर नियंत्रण के लिए बनाए गए सारे कानूनों की समीक्षा होनी चाहिए. लंबी-लंबी कतारों में लगे लोग शराब पाने के लिए जिस हद तक जूझ रहे हैं वह संकेत है कि मदिरा अब 'पब्लिक ड्रिंक' बनने की दिशा में कदम बढ़ा चुकी है. जब देश में शराब पीने-पिलाने वालों की होड़ लगी हो और सत्ता अपने खजाने के लिए सोने की इस मुर्गी का हर अंडा समय से पहले निकालने की जुगत में हो, तब नियम कायदों को बदल लेना चाहिए. मैं तो यहां तक उदारवादी रवैया अपनाने की बात सोचता हूं कि सरकार शराब को आवश्यक वस्तु अधिनियम में शामिल करने की दिशा में कदम बढ़ाए. इस सोच के पीछे महत्वपूर्ण तर्क यह है कि जब मदिरापान में लोग इस कदर आदि हो चुके हों कि बिना शराब के उन्हें जीवन मौत से बदतर लगता हो तो सरकार का फर्ज बनता है कि अपनी प्रजा का ख्याल रखें. और यहां तो पीने वाली प्रजा अपने प्रिय पेय के लिए सरकार का खजाना भी मुंह मांगे दामों पर भरने के लिए आतुर है. विश्व संकट की घड़ी में भी शराब सारे जातिगत समीकरणों और बंधनों को तोड़ती हुई अपना वर्चस्व कायम रखे हुए है. तभी तो मधुशाला के द्वितीय भाग में हरिवंश राय बच्चन ने बहुत पहले लिख दिया था-

सब मिट जाएं, बना रहेगा सुंदर साकी, यम काला
सूखें सब रस, बने रहेंगे किंतु हलाहल औ' हाला
धूमधाम औ' चहल पहल के, स्थान सभी सुनसान बनें
जगा करेगा अविरत मरघट, जगा करेगी मधुशाला.

जब शराब की महत्ता इतनी अधिक है तो फिर क्या कारण हैं कि भारतीय समाज में इस मादक पेय पदार्थ को सामाजिक मान्यता प्राप्त नहीं है. संकट के दौर में भले ही सुरापान करने वाले लोग शर्म का चोगा उतार लाइन में जा लगे हो, लेकिन आज भी वे ठेके से खरीदी गई बोतल या थैली को छिपाकर ले जाने का जतन करते हैं. यह स्थिति बड़े और छोटे लोगों पर समान रूप से लागू होती है. ब्रांडेड शराब कंपनियों द्वारा अपने उत्पाद को बेहद शानदार बोतल और कार्टन में पैक किया जाता है जिसे दो घड़ी देखने का मन न पीने वाले का  भी  करता है.लेकिन वाइन शॉप से उसे भी पुराने अखबार में ढांपकर लाने की कोशिश रहती है कि कहीं कोई देख न ले. अमेरिकी और यूरोपीय देशों में ऐसी स्थिति नहीं है क्योंकि वहां शराब सेवन को सामाजिक मान्यता है. भारत में शराब ठेके से भले ही छिपाकर लाई जाती हो लेकिन पीने के बाद सब उसे उगाने की भरसक कोशिश करते हैं. क्या राजा क्या रंक ! दो घूंट अंदर जाने के बाद सबके चेहरों का रंग उतर जाता है. यह मनुष्य का विवेक हर लेती है और शायद यही कारण है कि भारतीय समाज में शराब और शराबी को हेय दृष्टि से देखा जाता है. इसके बावजूद शराब पीने वालों के मुंह चढ़कर बोलती है और उन्हें बस मधुशाला  में लिखा यह छंद याद रहता है -

पाप अगर पीना समदोषी, तो तीनों साकी- बाला
नित्य पिलाने वाला प्याला, पी जानेवाली हाला
साथ इन्हें भी ले चल मेरे, न्याय यही बतलाता है
कैद जहां मैं हूं की जाए, कैद वहीं पर मधुशाला.

अब, जबकि कोरोना संकट ने समूचे विश्व को आशंकाओं के घेरे में डाल दिया है. 'पता नहीं, क्या होने वाला है' के अज्ञात भय ने सुराप्रेमियों की लोकलाज का तो हरण कर ही लिया है साथ ही साथ सरकारों के पोत भी उघाड़ दिए हैं. शराब की बिक्री से अपने खजाने भरने वाली सरकारें शराबी से कम कहां है,जिसे पीने की इस कदर तलब रहती है कि पूछो मत ! लॉकडाउन खुलने की जितनी उत्कंठा शराबियों को नहीं होगी उससे कहीं अधिक प्रदेश की सरकारें बेताब थी कि शराब बिक्री जल्द से जल्द शुरू हो. कुछ विधायकों ने तो सरेआम बाकायदा सरकारों से शराब की बिक्री आवश्यक वस्तु की तरह करने की मांग भी कर दी थी. जब देश के विकास का आधार और गरीब की रोटी का निवाला शराब बिक्री पर टिका हो तो सरकार को  उदार मन से शराब के लिए नए कानून बनाने की ओर सोचना चाहिए. नए कानून में यदि शराब की बिक्री सुलभ कर दी जाए तो सुरापान करने वाले छोटे-बड़े सभी लोगों को भारी राहत मिलेगी. भले ही सूफी लोगों को थोड़ी बहुत परेशानी हो. पर बड़े एक बड़े वर्ग को राहत देने के लिए इतना तो चलता है.  और हां, सरकार का खजाना तो हर व्यवस्था में निरंतर बढ़ता ही रहेगा, क्योंकि देश में पीने पिलाने वालों की कमी कहां है !

                                                                 -रूंख

तीज तिंवारां बावड़ी...!

पुन्न बडेरां  रा  आछा, बरकत है बां  री रीतां  में तिंवार बणाया इस्या इस्या गाया जावै जका गीतां में राजी राखै रामजी ! आज बात आपणै तिंवारां री...

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