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Sunday 26 February 2023

मीलों के आत्ममंथन का वक्त !



( कालवा दलबदल के बहाने)

जिस आदमी को आप सहारा देकर खड़ा करते हैं, उसे चलना सिखाते हैं, भागदौड़ के बीच प्रतिद्वंद्वियों को पटकना सिखाते हैं, एक दिन वही आदमी आप द्वारा सिखाए गए दांव पेच इस्तेमाल करते हुए आपको ही पटक देता है तो सोचिए आप कैसा महसूस करेंगे ? यदि बात राजनीति की हो तो यह दर्द और गहरा हो जाता है।

सूरतगढ़ विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस पार्टी की धूरी कहे जाने वाले मील परिवार के साथ कमोबेश ऐसा ही कुछ हुआ है। पूर्व विधायक गंगाजल मील द्वारा आशीर्वाद प्राप्त नगर पालिका चेयरमैन ओमप्रकाश कालवा ने उन्हें धोबी पछाड़ दांव लगाकर ऐसी ही पटखनी दी है। 'गाय तो गई, सागै गल़ावंडो ई लेयगी' की तर्ज पर कालवा अपने चहते पार्षदों को भी भाजपा में ले गए। नगर पालिका मंडल में कांग्रेस का स्पष्ट बहुमत एक झटके से अल्पमत में बदल गया, और विडंबना देखिए, अविश्वास प्रस्ताव की गेंद कांग्रेस के पाले में आ गई है। परिस्थितियां भी ऐसी बनी हैं कि कांग्रेस का कुछ भी बंटता दिखाई नहीं देता। मीलों के प्रभाव से यदि राज्य सरकार कुछ हस्तक्षेप करेगी तो कालवा को न्यायालय से राहत मिलना तय है।


कालवा का भाजपा में पदार्पण कोई बड़ी बात नहीं है, राजनीतिक गलियारों में ऐसा होता आया है। लेकिन कालवा ने मील परिवार पर जो गंभीर आरोप लगाए हैं वे उन्हें बड़ा राजनीतिक नुकसान दे सकते हैं। कालवा के अनुसार पूर्व विधायक गंगाजल मील परिवारवाद की राजनीति कर रहे थे और उन पर गलत कामों के लिए दबाव डाल रहे थे, ऐसे में कांग्रेस को अलविदा कहने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं था। जनमानस में सवाल उठना स्वाभाविक है कि मीलों द्वारा आखिर कौनसे गैर कानूनी काम करवाने का दबाव डाला जा रहा था ?

गौरतलब है कि गंगाजल मील और हनुमान मील के रूप में मील लगातार दो चुनाव हार चुके हैं, तीसरा चुनाव सिर पर है। ऐसी स्थिति में अपना राजनीतिक कद बनाए रखने के लिए यह जरूरी हो जाता है कि मील अपना आत्म मंथन करें। यदि 2023 के चुनाव में वह जीत का स्वाद चखना चाहते हैं तो उन्हें अपनी कमजोरियों और गलतियों से सबक सीखना होगा अन्यथा क्षेत्र की राजनीति उन्हें खारिज कर देगी।

ताजा मामले का ही उदाहरण ले लें। पिछले दो वर्ष से मीडिया लगातार ओमप्रकाश कालवा की भ्रष्ट कार्यशैली को उजागर कर रहा था। खबरनवीसों ने बहुत पहले ही चेता दिया था कि यह आदमी आप की जड़ों में मट्ठा डालने का काम कर रहा है लेकिन उसके बावजूद मील कानों में तेल डाले बैठे रहे, गंगाजल मील खुद कालवा को कांग्रेस का समर्पित कार्यकर्ता और सच्चा सिपाही बताते रहे मगर मौका मिलते ही कालवा अपना रंग दिखा गए। दरबारी सलाहकारों से घिरा मील परिवार भांप ही नहीं पाया कि उनके चहते ही उनके खिलाफ साजिश रच रहे हैं। नगरपालिका की लचर कार्यशैली को वे कभी नियंत्रित ही नहीं कर पाए फिर मामला चाहे अवैध कब्जों का हो या कर्मचारियों के तबादले का, व्यापारियों से विवाद का हो या मीडिया कर्मियों से उलझने का। कालवा अपनी मनमानी करता रहा, मीलों के दरबारी सलाहकारों को मैनेज कर उन्हें गुमराह करता रहा। हकीकत यह है कि चिलम चाटूकारों के जमावड़े से मील जमीनी हकीकत देख ही नहीं पाए। सच्चाई यही है कि दूसरों का चश्मा हमेशा भ्रम पैदा करता है।

पानी जब सिर से गुजरता दिखाई दिया तब हेतराम मील कुछ प्रयास करते दिखे, लेकिन कालवा की घाघ राजनीति के चलते वे भी नाकाम रहे। दरबारियों की कानाफूसी के बीच हनुमान मील चाह कर भी नगर पालिका में चल रही अव्यवस्था का मुखरता से विरोध नहीं कर पाए, जिसका समग्र परिणाम हुआ कि शहरी राजनीति में मील परिवार की किरकिरी हुई है। जाते-जाते कालवा ने गंभीर आरोप लगाकर फजीहत का पूरा ठीकरा मीलों के सिर फोड़ दिया है।

देखना यह है कि गंगाजल मील और उनका परिवार इस दगाबाजी से हुए राजनीतिक नुकसान की भरपाई कैसे करता है। इसके लिए उन्हें गंभीरता से आत्म चिंतन करना होगा। अभी भी उनके हाथ में कुछ पत्ते ऐसे हैं जिन्हें यदि सोच समझकर फेंका जाए तो बाजी पलट सकती है। वक्त हार की कगार पर खड़े सभी सूरमाओं को एक मौका अवश्य देता है।

-डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

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