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Wednesday, 30 September 2020

नगरपालिका की नीलामी को न्यायालय की ना !


'कॉटन सिटी लाइव' ने  उठाया  था मामला

आखिरकार न्यायालय ने नगरपालिका द्वारा की जा रही बहुचर्चित नीलामी पर वाद के निस्तारण तक स्थगन आदेश जारी कर दिया है. बीकानेर रोड पर स्थित करोड़ों रुपए मूल्य की इस व्यवसायिक जमीन को आवासीय के रूप में बेचने के गड़बड़झाले को सर्वप्रथम कॉटनसिटी लाइव पोर्टल पर उजागर किया गया था जिसके बाद शहर के जागरूक लोगों ने नीलामी रुकवाने के लिए न्यायालय की शरण ली थी.

यही लोकतंत्र की खूबसूरती है जनाब ! सत्ता कितनी भी ताकतवर हो, अपने मंसूबे पूरे करने के लिए लाख छल छंद रचे मगर संवैधानिक व्यवस्था में न्यायपालिका का हथोड़ा एक बार तो बड़े-बड़े सत्ताधारियों का गुरूर तोड़ देता है.

गौरतलब है कि पालिका द्वारा बड़े जोर-शोर से शहर में इन कीमती भूखंडों की नीलामी हेतु मुनादी करवाई गई थी. लेकिन समाचार पत्रों में नीलामी सूचना प्रकाशित होते ही कॉटनसिटी लाइव पोर्टल पर 25 अगस्त को इस गड़बड़झाले को उजागर किया गया था


बाजार के ठीक बीच में स्थित व्यावसायिक भूमि को आवासीय के रूप में बेचने की योजना किसी भी दृष्टि से शहर हित में नहीं थी लेकिन पालिका प्रशासन तो अपनी मनमानी पर तुला था. अब न्यायालय द्वारा इस नीलामी को वाद के निस्तारण होने तक रोकने के आदेश जारी कर दिए गए हैं. स्पष्ट है कि प्रथम दृष्टया: नगरपालिका द्वारा प्रस्तावित नीलामी अवैध थी. 

पालिका के पूर्व अध्यक्ष बनवारी मेघवाल और एडवोकेट पूनम शर्मा की संयुक्त याचिका पर न्यायालय द्वारा यह स्थाई स्थगन आदेश जारी किया गया है. इससे पूर्व पालिका द्वारा नीलामी के लिए निर्धारित दिन 21 सितंबर को न्यायालय ने बोली से कुछ घंटे पूर्व 28 सितंबर तक अंतरिम स्थगन आदेश जारी किया था जिससे उस दिन नीलामी नहीं हो पाई थी. 28 सितंबर को न्यायालय में बहस होने के बाद फैसला 30 सितंबर तक सुरक्षित रख लिया गया था. अब कोर्ट द्वारा वाद के निस्तारण तक स्थगन आदेश देने से मामला पूरी तरह न्यायिक प्रक्रिया में चला गया है.

दरअसल नीलामी का यह मामला शुरू से ही संदेह के घेरे में आ गया था जब पालिका द्वारा बाजार के बीच में स्थित विशुद्ध रूप से व्यवसायिक भूमि को आवासीय बता कर बेचने की योजना बनाई गई थी. पालिका प्रशासन का तर्क है कि यह जमीन मास्टर प्लान में आवासीय दर्शाई गई है इसलिए मजबूरी वश उसे आवासीय बेचा जा रहा है. लेकिन पालिका के तर्क किसी के गले नहीं उतरते. इस मामले में दिए गए आदेशानुसार पालिका खुद मास्टर प्लान की अवहेलना करती दिख रही है.

लेकिन साहब हठ तो हठ है. फिर राज हठ के क्या कहने ! सब कुछ जानते हुए भी जब पालिका प्रशासन अपनी फजीहत करवाने पर तुला हो तो उसे कौन रोक सकता है. सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर पालिका को यह जमीन बेचने की इतनी जल्दी क्यों है ? 



खैर इस पूरे प्रकरण में एडवोकेट पूनम शर्मा और पूर्व पालिकाध्यक्ष बनवारी मेघवाल ने विपक्ष की भूमिका निभाकर नीलामी को रुकवा दिया है. इसके लिए वे पुन: बधाई के पात्र हैं. पालिकाध्यक्ष ओमप्रकाश कालवा और पालिका मंडल को अदालत के इस निर्णय से सबक लेना चाहिए. इस मामले में हुई फजीहत से सीख लेकर वे अपने भावी निर्णयों को सुधार सकते हैं.


Tuesday, 22 September 2020

क्या आप पड़ौस के घर से कभी सब्जी मांग कर लाए हैं !

पगडंडियों के दिन (13)  

हमारी विरासत


'मासीजी, सब्जी के बणाई है ?'


'आलू शिमला मिर्च है, पा दयां !'


अंगीठी पर रोटियां सेकती कुंती मासी बोली.


'दे दयो, आलू ज्यादा घाल्या.' बिना किसी हिचक और शर्म के मैंने अपनी कटोरी को मासी के हाथों में थमा दिया. मासी ने सब्जी से कटोरी भर दी. ज्यों ही मैं आंगन में मंज्जे पर बैठे रोटी जीम रहे मासड़ तारा सिंह के पास से गुजरा.


'ओ, टोनी, तेरी मां ने की चाड़या है अज ?'


'मासोजी, बड़ी बणाई है, मन्नै तो कोनी भावै...'


'यार कमाल है, बड़ियां नीं भांदी तैन्नू ! जा मेरे वास्ते फड़ी ल्या छेती जिही.'


'ल्यायो मासोजी....' और मैं दौड़ता हुआ घर जाकर मासड़ तारा सिंह के लिए बड़ी की तरीदार सब्जी ले आता जिस पर मां ननीहाल से आया हुआ दो चम्मच देसी घी डाल देती. उस वक्त सब्जी मांगने में जरा सी भी शंका या शर्म नहीं आती थी. पता नहीं क्यों ?


मगर आज, कल्पना कीजिए आपके घर मनपसंद सब्जी नहीं बनी है तो क्या आपके बच्चे कटोरी लेकर पड़ोसी के घर सब्जी मांगने जा सकते हैं ?


आप में से अधिकांश का उत्तर होगा.


'सब्जी......! हमारे बच्चे तो कभी प्लास पेचकस भी मांगना पड़ जाए, तो पड़ोसी के घर जाने से कतराते हैं. हम तो खुद ही पडौसियों के घर नहीं जा पाते हैं.'

लेकिन छोटे पर्दे के आगमन से पहले ऐसा वक्त नहीं था. 70-80 के दशक में मोहल्ले भर के घरों से सब्जी मांग कर लाने का भी एक हसीन दौर था. आज आपको घर में बनी सब्जी से ही काम चलाना पड़ता है जबकि उन दिनों ठरके के साथ हम पड़ोसियों के घर कटोरी ले कर जा धमकते थे. दिनभर की धमाचौकड़ी के बाद जब शाम को घर में घुसते तो मां की डांट-डपट भोजन का हिस्सा हुआ करती थी. 'मा री गाळ, घी री नाळ' कहावत का अर्थ हमने बखूबी समझ लिया था. इसलिए ज्यादा गौर नहीं करते थे. हां, यदि रसोई में सब्जी मनपसंद नहीं बनी होती तो हमारा बालमन भुनभुनाकर विद्रोह कर देता.


इस पर मां बेझिझक कहती- 'जा, कुंती मासी के घर से सब्जी ले आ, उसने शायद आलू बनाए हैं.'
और हम कटोरी उठाकर बिना किसी शर्म के कुंती मासी के घर से सब्जी की कटोरी भरवा लाते. ऐसा नहीं कि सब्जी मांगना सिर्फ हमारा काम था बल्कि कुंती मासी, सक्सेना आंटी, गेजो मासी, संजय, राणी, सुनीता आदि की कटोरियां प्राय: हमारे घर से सब्जी या दाल की भरकर जाती थी. मां की बनाई हुई गट्टे की सब्जी और मूली के पराठें मोहल्ले में प्रसिद्ध थे. इस चक्कर में हमारे घर में पड़ोसियों की कटोरियांं और अन्य बर्तन पड़े रहते थे. यकीनन हमारे बर्तन भी उनके घर की शोभा बढ़ाते होंगे.


उस दौर में सिर्फ सब्जियों का आदान-प्रदान ही नहीं था बल्कि छोटे-मोटे दु:ख सुख भी लोग आपस में बांट लिया करते थे. गुजरे हुए दिनों को याद कर मां कहती है कि उन दिनों जब विवाह शादियां हुआ करती थी तो पडौस की महिलाएं एक दूसरे के कपड़े तक मांग कर पहन जाया करती थी. एक बार फलानाराम की पत्नी मेरी झूमकी और जेठाराम ताईजी का घाघरा मांग कर ले गई थी. झुमकी तो दो-चार दिनों बाद उसने लौटा दी थी लेकिन ताई जी का घाघरा विवाह में गुम कर आई. 


मैंने पूछा- 'फिर ताई जी ने क्या किया ?'
'क्या करती ! तेरे ताऊजी से चार गालियां खाई...' मां ने हंसते हुए बताया.


दरअसल, आज दिन पड़ोसियों और हमारे घर की दीवारें बहुत ऊंची हो चुकी हैं. हमने इन दीवारों में अपनी अपणायत और हेत जिंदा चिनवा दिया है. आज हमारे पास घर तो पक्के और आलीशान हैं लेकिन दिल बहुत छोटे हो गए हैं. कड़वी सच्चाई यह है कि हम ओढ़ी हुई रंगहीन आधुनिकता के चक्कर में अपने मोहल्ले के घरों से कोई चीज मांग कर लाना अपनी तौहीन समझते हैं. साग सब्जी की तो सोचिए ही मत, छोटी मोटी चीजें भी अगर पड़ोसियों से मांगी जाएं तो हमारी इज्जत घट जाती है. दुख:द बात यह भी है कि यही मानसिकता हमने अपने बच्चों के दिलों में भी पैदा कर दी है जिसके दुष्परिणाम यकीनन उन्हें झेलने होंगे और वे झेल भी रहे हैं.

आइए, अपने पड़ोसी के घर जाना शुरू करें. शायद प्रेम और प्यार का वही दौर हम लौटा ला सकें तो....!


-रूंख

Monday, 21 September 2020

तो आखिर रुक ही गई नीलामी !


- करोड़ों की व्यवसायिक जमीन को आवासीय भूखंडों के रूप में बेचने का गड़बड़झाला
- न्यायिक हस्तक्षेप से सूरतगढ़ नगरपालिका की नीलामी रोकने के आदेश.


यह लोकतंत्र की खूबसूरती है साहब ! सत्ता कितनी भी ताकतवर हो, अपने मंसूबे पूरे करने के लिए कितने ही छल छंद रचे, जनता को बेवकूफ समझ कर उसकी आंखों में धूल झोंकने के लाख जतन करे, जरूरी नहीं कि उसे कामयाबी मिले. संवैधानिक व्यवस्था में न्यायपालिका का हथोड़ा एक बार तो बड़े-बड़े सत्ताधारियों का गुरूर तोड़ देता है. 


ऐसा ही कुछ सूरतगढ़ नगरपालिका की आज होने वाली बहुचर्चित भूखंड नीलामी के साथ हुआ है. दोपहर तक पालिका द्वारा बड़े जोर-शोर से शहर में इन कीमती भूखंडों की नीलामी हेतु लाउडस्पीकर पर मुनादी की जा रही थी लेकिन ऐन वक्त पर बाजार के बीच स्थित करोड़ों की व्यावसायिक जमीन को आवासीय भूखंडों के रूप में बेचने के मामले में न्यायालय द्वारा इस नीलामी को रोकने के आदेश जारी किए गए. पालिका के पूर्व अध्यक्ष बनवारी मेघवाल और एडवोकेट पूनम शर्मा की संयुक्त याचिका पर न्यायालय द्वारा यह स्थगन आदेश जारी किया गया है. न्यायालय द्वारा 28 सितंबर तक नीलामी पर रोक लगाई गई है. वादी पक्ष की ओर से खुद एडवोकेट पूनम शर्मा और एडवोकेट सुभाष विश्नोई ने पैरवी की.





लेकिन साहब हठ तो हठ है. फिर राज हठ के क्या कहने ! सब कुछ जानते हुए भी जब पालिका प्रशासन अपनी फजीहत करवाने पर तुला हो तो उसे कौन रोक सकता है. सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर पालिका को यह जमीन बेचने की इतनी जल्दी क्यों है ?

माना कि पालिका की आर्थिक हालात ठीक नहीं है लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि घर का कीमती सामान बेचना शुरू कर दिया जाए. पालिकाध्यक्ष ओमप्रकाश कालवा पूर्व में शिक्षक रहे हैं और एक अनुभवी व्यापारी भी हैं लेकिन उसके बावजूद पालिका की आय के वैकल्पिक साधन तलाशने की बजाय कीमती संपत्तियों के बेचान का मार्ग अपना रहे हैं, जो कतई उचित नहीं कहा जा सकता. और यदि बेचना इतना जरूरी ही है तो कम से कम उसका मूल्य तो पूरा वसूलें.

खैर इस प्रकरण में एडवोकेट पूनम शर्मा और पूर्व पालिकाध्यक्ष बनवारी मेघवाल ने विपक्ष की भूमिका निभाकर एकबारगी नीलामी को रुकवा दिया है. इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं लेकिन विपक्षी पार्षदों और भाजपा के विधायक रामप्रताप कासनिया की क्या कहें ! उन्हें तो जैसे सांप ही सूंघ गया है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष जब अपनी भूमिका निभाने से गुरेज करने लगता है तो सत्ता पक्ष का निरंकुश होना स्वाभाविक है. ऐसी स्थिति में जनता जनार्दन से निकलने वाली साधारण आवाजें ही कभी-कभी सत्ता की लगाम कस देती है. और बहुचर्चित नीलामी प्रकरण में आज यही हुआ है.

न्यायिक आदेेेश की प्रति





Friday, 18 September 2020

'भाण्डे कली करालो, भाण्डे...'


पगडंडियों के दिन (12)

हमारी विरासत

'दुनिया पीतल दी...' गीत पर भले ही सारा जमाना थिरक लिया हो लेकिन बेबी डॉल को शायद पता ही नहीं, कि एक जमाना था जब इसी 'पीतल' को अपनी कला से चमकाने वाले हुनरमंद लोग भी दुनिया में हुआ करते थे. वो पगडंडियों का जमाना था. इंसान के पैर जमीन पर टिके थे. हवा में उड़ने की फितरत तो हमने इस दौर में ही सीखी है. लेकिन वक्त कब किसी का हुआ है साहब ! जैसे आज बेबी डॉल का नशा उतरा हुआ मालूम पड़ता है ठीक वैसे ही मतलबी जमाने ने पीतल चमकाने वाले कारीगरों को भी जमींदोज़ कर दिया है. तभी तो आज दूर-दूर तक कोई आवाज सुनाई नहीं देती-


'भाण्डडडे कली करा लो भाण्डडडे.., परातां दे पौड़ लवा लो, कली करा लो कली.....!'

मगर उन दिनों बर्तन कली करने वाले कारीगरों की बड़ी पूछ हुआ करती थी जब अधिकांश मध्यमवर्गीय घरों में पीतल या कांसे के बर्तन थे. स्टील के बर्तन आने से पहले टोकणी, लोटा, देगची, कड़ाही, पतीले, कोली, बाटी, गिलास, थालियां, यहां तक कि चमचे भी पीतल के हुआ करते थे. ऐसे बर्तनों को मांजने के बाद इनकी चमक देखने लायक होती थी. दिक्कत सिर्फ एक ही थी कि इन बर्तनों में धात्विक प्रतिक्रिया के कारण मसालेदार और खट्टी चीज़ें ज्यादा समय तक नहीं टिक पाती थी. इस समस्या का समाधान सिर्फ कली वालों के पास था. वे इन बर्तनों की अंदरूनी सतह पर कली और रांगे का एक पतला लेप लगा देते थे जो धात्विक प्रतिक्रिया को रोकता था. चांदी सी चमकदार कली का लेप लगाने के बाद बर्तन अंदर से चमचमा उठते थे.

बर्तन कली करने वाले कारीगरों की अनूठी शान

गली के नुक्कड़ पर लगे शहतूत तले जब कली करने वाला भाई अपनी साइकिल खड़ी कर कैरियर पर बंधी अंगीठी और कोयले की बोरी उतारता तो मोहल्ले के घरों के दरवाजे उसकी आवाज सुन धीरे-धीरे खुलने लगते. वह बड़े दिलकश अंदाज में मुनादी करता-


'नवें बणाके हत्थ फड़ा दयां
भाण्डे दयो पुराणे
मोयां दे विच जान पा दयां
करां सजाखे काणे
'भाण्डडडे कली करा लो भाण्डडडे.....!'


लकड़ी के कोयलों को छोटी सी गोल अंगीठी में सुलगा कर वह मशीनी पंखे से उसे हवा देता तो भट्टी में अंगारे दहकने लगते. मदारी की भांति उसके झोले से संडासी, हथोड़ा, प्लास, नौसादर की डिबिया, रांगा, कली के तार.... और भी न जाने क्या क्या, बाहर निकलने लगते. मैली सी चादर और ढेरों सुराख वाली फटी कमीज पहने कलीवाला भाई होंठों में बीड़ी दबाकर उकडूं बैठ जाता और अपना काम शुरू कर देता. 
बीच-बीच में मोहल्ले की औरतों से मोल भाव भी चलता रहता.


'दो भाण्डे, इक रपय्या'


ठीक है. पर भाई, इसके ज्यादा बता रहे हो !'


'बिब्बी, देग दा मूं वेख ! पूरा इक रपय्या लग्गू. मरजी है तुहाडी.' 


'कळी चोखी करी रे भाई. लारली बिरियां तेरो ई कोई भाई आयो हो, जमां रांगो थेथड़ ग्यो. दो मईना ई को चाली नीं !'


बिब्बी, कम दी गरंटी होऊ, मेरे कोळे बोतया टपटपाई है नीं. साफ कम करीदा है, रोटी हक दी खाइदी है...'



अपने काम में मस्त कली वाला ऐसी बातों पर कान धरता ही नहीं था. वह बर्तन को संडासी से पकड़ भट्टी पर गर्म करता और उसमें कली की तार का एक सिरा रगड़ता जो पिघलकर चमकदार गोल बूंद में बदल जाती. इसके बाद वह नौसादर पाउडर डालता तो गर्म बर्तन से तेज धुआं उठता. कली वाला भाई बड़ी फुर्ती से एक पुराने कपड़े को संडासी से पकड़ उस बर्तन में पड़ी कली को चारों ओर फैला देता. कली के चमकदार लेप से बर्तन की अंदरूनी सतह चमक जाती और गर्म बर्तन छन्न से पानी में.....लो हो गई कली !


इन कली करने वालों की अहमियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पंजाबी लोक संगीत में 'रंगीले जट्ट' द्वारा गाया गया गीत 'भांडे कली करा लो...' कभी गलियों में ठीक वैसे ही गूंजा करता था जैसे बेबी डॉल ने दुनिया को पीतल की बताकर धूम मचा दी थी. 


अब न पीतल के बर्तन हैं न कली करने वाले लोग. हमने झूठी चमकदार शान का लबादा ओढ़कर पीतल के बर्तनों को या तो कबाड़ में बेच दिया है या फिर किसी बोरी में बंद कर कहीं लटाण पर पटक रखा है. कभी घर की शान कहे जाने वाले पीतल के बर्तनों में आज हम मेहमानवाजी करने की सोच भी नहीं सकते. और कली वाले, वे जाने कहां गुम हुए, जमाने को खबर ही नहीं. छोटे कारीगरों को दर्ज करने के लिए इतिहास के पास पन्ने कहां होते हैं !


सच पूछिए तो हमें फुर्सत ही नहीं है अपने विरसे को संभालने की. विकास की अंधी दौड़ में अहसानफरामोश होकर हम खुद को ही नहीं संभाल पा रहे हैं तो औरों की बिसात ही क्या !
-रूंख

Thursday, 3 September 2020

विधायकों और सांसदों को खुला पत्र

आदरणीय विधायकों और सांसदों, सादर अभिवादन. आज आप सबको चौक चौराहे पर साधारणजन की ओर से संबोधित करने का विशेष प्रयोजन है.


उस दिन को याद कीजिए जब आपने पहली बार अपने भीतर नेतृत्व क्षमता का गुण खोजा था और राजनीति में उतरने का फैसला किया था. हो सकता है कुछ लोगों को यह सब विरासत में मिला हो लेकिन फिर भी आप सब ने उस वक्त समाजसेवा के साथ खुद को जननेता के रूप में स्थापित करने के सपने तो अवश्य देखे होंगे. उन सपनों को पूरा करने के लिए आपने जीवन यात्रा में कड़ी मेहनत के साथ जबरदस्त संघर्ष भी किया होगा. बहुतों का तो आंदोलनों, भूख हड़ताल, पुलिस की मार और जेल की यातनाओं से भी सामना हुआ होगा. षड्यंत्रों भरी राजनीति में आप कदम-कदम पर जाने कितने छल-छंदों और कुटिल समझौतों से जूझे होंगे. संक्षेप में कहूं तो कुम्हार की निहाई में तप कर जैसे मिट्टी का एक कच्चा घड़ा शीतल जल देने वाले पात्र में बदल जाता है, यकीनन वैसा ही कुछ आपके जीवन में भी घटित हुआ है. इन्हीं अच्छे बुरे अनुभवों के चलते कई लोगों को तो केंद्र और राज्यों के विभिन्न मंत्रालयों को संभालने का सुअवसर भी प्राप्त हुआ है.

लेकिन क्या मंत्री, सांसद और विधायक बनना ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है ! भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में, जहां महज 20% वोट पाने वाला प्रत्याशी जनप्रतिनिधि बन जाता हो, जहां चार हजार से अधिक विधायकों और लगभग आठ सौ सांसदों की भीड़ हो, उनमें आपका कद कैसा है, यह बड़ा सवाल है. आप संघर्ष के शुरुआती दिनों को याद कीजिए. आप तो लोकप्रिय और सर्व सम्मत नेता बनना चाहते थे. परंतु सच कहना, क्या आप बन पाए ! हकीकत तो यह है कि आप में से अधिकांश लोग नेतागिरी की वीआईपी जमात में भटक कर रह गए हैं. बड़ी सी गाड़ी और गनमैन के चक्कर में आपकी नेतृत्व क्षमता सुप्त हो गई और आज घड़ी ज्यादातर जनप्रतिनिधि पिछलग्गू व्यापारी की भूमिका में आ गए हैं. सच तो ये है कि 'आए थे हरि भजन को ओटन लगे कपास' की तर्ज पर आप सत्ता के सुख में अपने सपनों को ही भूल बैठे हैं.

राजनीतिक गलियारों में अक्सर कहा जाता है कि देश में जेपी के बाद कोई जननायक नहीं बन पाया. दरअसल, इतिहास के पन्ने बहुत कीमती होते हैं उनमें जननेता के रूप में दर्ज होने के लिए आपको लीक से हटकर चलना पड़ता है. लेकिन विडंबना यह है कि जेपी से अगली पीढ़ी के अधिकांश नेताओं में नैतिक पतन का एक नया दौर शुरू हुआ जो आज तक बदस्तूर जारी है. प्रजातांत्रिक राजनीति में भ्रष्ट आचरण और आपराधिक लिप्तता सदैव आत्मघाती होती है, यह जानते हुए भी हमारे बहुत से माननीय इस दलदल में आकंठ डूब गए हैं. साम, दाम, दंड, भेद की राजनीति से वे भले ही चुनाव जीत जाते हों, लेकिन लोकप्रिय नेता होने का दम नहीं भर सकते. नि:स्वार्थ भाव से जनता के साथ खड़े होने वाले नेताओं को ही इतिहास तरज़ीह देता है वरना आजादी के बाद कितने ही जनप्रतिनिधि आए और क्षणिक चमक दिखाकर लुप्त हो गए. उनमें से कितने लोग जनता के दिलों में जगह बना पाए, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है.

मुद्दे की बात यह है कि कई बार कुदरत ऐसी विषम परिस्थितियां पैदा कर देती है जब नेतृत्व कर रहे मनुष्यों के समक्ष खुद को साबित करने की चुनौती उठ खड़ी होती है. सही मायने में ऐसी चुनौतियां सूझवान के समक्ष अवसर और कायर के लिए आफत होती हैं. संकट की ऐसी विकट घड़ी में राजनीति की बिसात पर कमजोर मोहरे स्वार्थ लिप्सा में फंस कर दम तोड़ देते हैं जबकि कुछ लोग अपने सर्वस्व योगदान से मानव जाति को आपदा से निकाल ही लाते हैं. इतिहास ऐसे मनुष्यों को ही अपने सुनहरे पन्नों पर दर्ज करता है. 

कोविड के संक्रमणकाल में ऐसी ही परिस्थितियां दुनियाभर में उत्पन्न हुई हैं. 
हमारे देश में भी आशंका और निराशा का भाव गहराता जा रहा है. लाखों लोगों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है जिसके चलते रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया है. एक बड़े वर्ग के काम धंधे चौपट होने के कारण हमारी अर्थव्यवस्था भी डगमगा गई है और खतरे के संकेत दे रही है. 

ये सब आप से छिपा हुआ नहीं है. तो फिर उठिए और अपनी कमर कस लीजिए. आप में से अपवाद स्वरूप शायद ही कोई विधायक या सांसद होंगे जो अपने परिवार में करोड़ों की सम्पत्ति के मालिक न हो. संकट की इस घड़ी में संवेदनाओं को महसूस करते हुए आप इस सम्पदा का थोड़ा सा हिस्सा भी जनकल्याण में लगा सकें तो आप इतिहास पुरुष साबित होंगे. यदि इसमें कोई गुरेज हो तो इतना सहयोग अवश्य कीजिए कि अपनी जनसेवाओं के बदले सरकार से मिलने वाले समस्त वेतन और भत्तों का न्यूनतम दो वर्षों के लिए परित्याग कर दीजिए. यह ठीक वैसा ही है जिस ढंग से देश के आम आदमी ने सब्सिडी को छोड़ने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं. सरकारी सुविधाओं और अपनी सुरक्षा का तामझाम निजी खर्चे पर व्यवस्थित कर अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत कीजिए. 

आपको बताना चाहता हूं कि आपका यह सामूहिक परित्याग देश की अर्थव्यवस्था में कितना बड़ा योगदान दे सकता है :-
( स्रोत- आरटीआई, सरकारी दस्तावेज)

545 लोकसभा सदस्य @ 71.00 लाख
250 राज्यसभा सदस्य @ 44.00 लाख
4120 विधायक @ औसत 25.00 लाख

प्रति वर्ष के हिसाब से यह राशि 1524.75 करोड़ रूपये बनती है. सुरक्षा व्यवस्था पर खर्च होने वाली राशि इससे अलग है. यदि इसे भी औसतन जोड़ लिया जाए तो सोचिए 2 सालों में आप देश की अर्थव्यवस्था में 5000 करोड़ से अधिक का योगदान दे सकते हैं. आज देश का हर नागरिक अपने खर्चों में कटौती करने की कोशिश कर रहा है. आगे आकर अपने सहयोग की घोषणा कर उसका हौसला बढ़ाइए. आपको याद होगा कि जनसेवा का मार्ग आपने स्वेच्छा से चुना था. उसके लिए वेतन और भत्ते पाने जैसी कोई शर्त नहीं थी. 

इस देश को बचाने के लिए साधारणजन की इतनी सी गुजारिश स्वीकार कर लीजिए. लोकतंत्र पर बोझ बनने की बजाय उसे संवारने का काम कीजिए. यदि देश बचेगा तो राजनीति बचेगी. याद रखिए कि प्राकृतिक आपदाएं पार्टी, धर्म और जात नहीं देखती. कुदरत का कहर अमीरी और गरीबी में फर्क नहीं करता. हां, मनुष्य अगर चाहे तो अपनी सूझबूझ से बहुत बड़ा फर्क ला सकता है.

अपने शुरुआती सपने को याद करते हुए जननेता बनने की तरफ कदम बढ़ाइए. इतिहास आपकी प्रतीक्षा कर रहा है....

सादर

डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'
94140-90492
kapurisar@gmail.com

Tuesday, 25 August 2020

करोड़ों की वाणिज्यिक जमीन को आवासीय के रूप में बेचने की तैयारी

- दिन दहाड़े जनता की आंख में धूल झोंकने की साजिश.

- लंबी तान कर सोए हैं विपक्षी पार्षद.
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सूरतगढ़ नगर पालिका की बेवकूफी कहें या जरूरत से ज्यादा होशियारी, उसके प्रशासक अक्सर खुद की फजीहत करवाने के लिए आमादा रहते हैं. इसका ताजा उदाहरण है बीकानेर रोड पर स्थित बेशकीमती वाणिज्यिक भूमि की आवासीय भूखंडों के रूप में की जा रही नीलामी. पूर्व विधायक हरचंद सिंह सिद्धू के आवास के ठीक सामने स्थित यह है वही जमीन है जहां कुछ दिन पूर्व तक नौजवान वॉलीबॉल खेलते थे. इस जगह की बीकानेर रोड पर खुलती दिशा में सब्जी की रेहड़ियां लगती है और पीछे की तरफ उप पंजीयक कार्यालय वाली सड़क है. तीन तरफ सड़क वाली इस बेशकीमती जमीन के एक हिस्से पर न्यायालय के आदेश से कुछ समय पूर्व ही एक व्यक्ति को कब्जा सौंपा गया है. इसके बाद ही नगरपालिका ने शेष बची भूमि पर अपने स्वामित्व के बोर्ड लगाए हैं. जबकि इससे पूर्व प्रशासकों को शायद पता ही नहीं था कि यह जमीन भी पालिका की है.


उल्लेखनीय यह है कि इस बेशकीमती भूमि की लोकेशन देखकर अनजान आदमी भी बता सकता है कि यह जमीन पूरी तरह से वाणिज्यिक गतिविधियों के काम की है. बाजार के ठीक बीच में स्थित होने के कारण इस जमीन का बाजार भाव करोड़ों रुपए में है लेकिन नगरपालिका ऐसी शानदार जगह को 20 गुणा 50 के आवासीय भूखंडों में काटकर बेचने जा रही है. इसकी सार्वजनिक नीलामी घोषणा भी कर दी गई है.


पालिकाध्यक्ष ओमप्रकाश कालवा का कहना है कि मास्टर प्लान में यह भूमि आवासीय दर्शाई गई है और डीडीआर से इसका प्लान अनुमोदित करवाने के बाद ही नीलामी जारी की गई है. 


अधि.अधिकारी मिल्खराज चुघ से पूछा गया तो उन्होंने बड़ा हास्यास्पद बयान दिया कि उन्हें इस बाबत ज्यादा जानकारी नहीं है. वे फाइल देख कर ही बता सकते हैं कि पालिका द्वारा इस जमीन के भू उपयोग परिवर्तन हेतु कोई कार्रवाई की गई है अथवा नहीं. पालिका की बाजार में स्थित करोड़ों रुपए की एक महत्वपूर्ण संपत्ति की नीलामी हो और उसके संबंध में ईओ अपनी अनभिज्ञता जारी करे, यह गले नहीं उतरती. यदि वाकई उन्हें जानकारी नहीं है तो फिर इस शहर का भगवान ही मालिक है.


इसीलिए इस नीलामी पर कई महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं जो पालिका प्रशासन की कार्यशैली को भ्रष्टाचार के कटघरे में खड़ा करते हैं :-


1. क्या पालिका ने डीडीआर और सरकार को इस भूमि के वाणिज्यिक होने और उसके राजस्व मूल्य की उपयोगिता से अवगत करवाया था ?


2. यदि मास्टर प्लान में कोई खाली जगह वर्षों पूर्व आवासीय दर्शाई गई है और वर्तमान में वह वाणिज्यिक उपयोग की है तो करोड़ों की राजस्व प्राप्ति को ध्यान में रखते हुए उसके भू परिवर्तन हेतु नगर पालिका ने अब तक क्या कार्यवाही की ?


3.पूर्व में भी सरकारों द्वारा जनहित और राजस्व प्राप्ति को ध्यान में रखते हुए मास्टर प्लान के कई हिस्सों को डिनोटिफाइड किया गया है तो फिर इस जमीन के संबंध में पालिका द्वारा प्रयास क्यों नहीं किए गए ?


4. नीलामी के पश्चात इन आवासीय भूखंडों का वाणिज्यिक उपयोग नहीं होगा, इसे नगरपालिका कैसे सुनिश्चित कर पाएगी ?


5. भूखंड आवंटित होने के बाद यदि कोई आवंटी उसे वाणिज्यिक करवाना चाहेगा तो क्या नगरपालिका उसे रोक पाएगी ? यदि रोकेगी तो क्या वह आवंटी न्यायिक प्रक्रिया से अपने हितों की रक्षा नहीं करेगा ? उस समय नगरपालिका को सिर्फ शुल्क के रूप में मिलने वाली भू रूपांतरण राशि पर संतोष करना होगा.


6. और सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस नीलामी से नगर पालिका को होने वाले करोड़ों रुपए के राजस्व नुकसान की जवाबदेही किसकी होगी ?


नगरपालिका मंडल में विपक्ष की भूमिका निभा रहे भाजपा के पार्षदों की चुप्पी भी संदेह के घेरे में है. यदि समय रहते विपक्ष अपनी भूमिका निभाता तो यह संभव ही नहीं था कि पालिका इस जमीन की आवासीय नीलामी घोषणा जारी कर दे. इस मामले में विधानसभा सत्र से लौट रहे विधायक रामप्रताप कासनिया का कहना था कि वास्तव में यह जमीन तो वाणिज्यिक है. लेकिन नगरपालिका ऐसा क्यों कर रही है, इसकी गहन पड़ताल की जाएगी.


गौरतलब है कि पूर्व पालिकाध्यक्ष काजल छाबड़ा के कार्यकाल के अंतिम दिनों में इंदिरा सर्किल पर स्थित वाणिज्यिक भूमि को आवासीय के रूप में बेचने की ऐसी ही कवायद की गई थी जिसे न्यायालय के आदेश द्वारा रुकवा दिया गया था. यह जमीन भी करोड़ों रुपए मूल्य की थी जिसे पालिका मिलीभगत के साथ औने-पोने दामों में आवासीय भूखंडों में बेचना चाहती थी.


होना तो यह चाहिए कि नगरपालिका इस जमीन का भू उपयोग परिवर्तन करवाए और उसके बाद इसे वाणिज्यिक भूखंडों के रूप में नीलाम करें. विकल्प के रूप में शहर के बीचोबीच स्थित इस भूमि पर यदि पालिका खुद का व्यवसायिक कांपलेक्स खड़ा करे तो उसे प्रतिमाह लाखों रुपए की आय किराये के रूप में हो सकती है. शहर के भीड़ भरे क्षेत्रों में स्थित सारे बैंक इस कॉम्पलेक्स में लाए जा सकते हैं और वहां यातायात की समस्या का भी समाधान हो सकता है.


देश में जहां भाजपा सरकार द्वारा सरकारी उपक्रमों के किए जा रहे निजीकरण की कांग्रेस आलोचना कर रही है वहीं स्थानीय स्तर पर खुद उसका पालिका बोर्ड इस ढंग से सरकारी संपत्तियों का निस्तारण करने में लगा हैं तो बदलाव की उम्मीद करना बेमानी है.


डॉ. हरिमोहन सारस्वत


Sunday, 23 August 2020

लोकहित की अवधारणा को धूमिल करता है निजीकरण

वित्तीय प्रबंधन प्रत्येक राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण होता है जो उसके विकास को गति और दिशा देता है. लेकिन यह कॉरपोरेट सेक्टर के वित्तीय प्रबंधन से पूर्णतया भिन्न है. देश की बैलेंस शीट में जहां लाभ की बजाय जनकल्याण महत्वपूर्ण होता है वहीं व्यवसायिक उपक्रम हमेशा लाभ की अवधारणा पर काम करते हैं. वास्तव में किसी देश की अर्थव्यवस्था में लाभ जैसा तत्व होता ही नहीं है बल्कि वहां तो सामाजिक विकास को केंद्र में रखते हुए 'आय या खर्चों का आधिक्य' ही विकास का पैमाना माना जाता है. कॉरपोरेट और राष्ट्र की बेलेन्स शीट का यही मुख्य भेद सरकारों को उपलब्ध संसाधनों के निजीकरण की ओर खींचता है. इससे पूंजीगत संसाधन एक वर्ग विशेष के हाथों में इकट्ठे होने लगते हैं जो अंततः सत्ता का रूप धर लेते हैं. ऐसी स्थिति में आर्थिक विषमताओं को कम करने और राष्ट्रीय विकास के दिव्य स्वप्न धूमिल होने लगते हैं.

निजीकरण का सीधा अर्थ है 'कॉरपोरेट' के हाथों में अर्थव्यवस्था की कमान. वही कॉर्पोरेट, जिसका अस्तित्व लाभ के उद्देश्य पर टिका है. उसे सामाजिक दायित्वों की पूर्ति से ज्यादा मतलब नहीं होता. ऐसे बड़े व्यवसायिक उपक्रम सिर्फ विधिक रूप से थोपे गए सामाजिक दायित्वों को पूरा करने की कवायद करते हैं. इसके विपरीत लोकतांत्रिक सत्ता हमेशा सामाजिक विकास की अवधारणा के सिद्धांत पर काम करती है. किसी भी क्षेत्र के सरकारी उपक्रमों की नीतियों को देख लीजिए. उनमें हमेशा सार्वजनिक हितों को ध्यान में रखते हुए नियोजन किया जाता है. इसका सीधा सा कारण है कि सरकारों के लिए लाभ कमाने से पहले जनकल्याण मुख्य लक्ष्य होता है.

आजादी के बाद का आरम्भिक परिदृश्य

आजादी के बाद के पहले दो दशकों की बात करें तो तत्कालीन कांग्रेस सरकार का अपना राष्ट्रवाद हुआ करता था जिसके चलते उन्होंने निजीकरण को प्रोत्साहन देने की बजाय आधारभूत ढांचे से जुड़े सभी उपक्रमों के राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया शुरू की. रेलवे, बीमा, उड्डयन, टेलीफोन, सड़क परिवहन, जहाजरानी और इस्पात उद्योगों को सरकार ने पूरी तरह से राष्ट्रीयकृत कर दिया था. 1969 में 19 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण इस बात का द्योतक था कि सरकार लाभ की बजाए जनकल्याण की नीतियों पर काम करना चाहती है. इसी का परिणाम था कि देश के ग्रामीण क्षेत्रों में लीड बैंकों द्वारा लाखों शाखाएं खोली गई. इन शाखाओं का उद्देश्य लाभ कमाना नहीं था बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध करवाने के लिए बैंकों को समग्र विकास का सामाजिक दायित्व सौंपा गया था. 70 के दशक की हरित क्रांति के दौरान भी सरकारी क्षेत्र में ही खाद का पहला कारखाना खोला गया था. इसी समय रूस के सहयोग से सरकारी क्षेत्र में ही देश के सबसे बड़े कृषि फार्म की स्थापना हुई थी जिसे बाद में राष्ट्रीय बीज निगम को सौंप दिया गया. इन तथ्यों से पता चलता है कि उस दौर में सरकार की सामाजिक विकास अवधारणा के चलते निजी क्षेत्र अपने पांव पसार नहीं पाया था. हालांकि यह भी सच है कि लालफीताशाही और भ्रष्टाचार के बोलबाले के कारण राष्ट्रीयकरण की व्यवस्था अपेक्षित परिणाम देने में पूरी तरह सफल नहीं हुई. लेकिन इन खामियों के बावजूद भी सामाजिक विकास की अवधारणा पर आधारित नियोजन को नकारा नहीं जा सकता.

भूमंडलीकरण के दौर का भारत पर क्या प्रभाव पड़ा


90 के दशक में शुरू हुए विश्वव्यापी भूमंडलीकरण से भारत भी अछूता नहीं रहा. विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष व अन्य अंतरराष्ट्रीय व्यवसायिक दबावों के चलते सरकार को अपनी नीतियां बदलनी पड़ी. इस दौर में निजी क्षेत्र को अपनी लाभकारी नीतियों के साथ न सिर्फ नए उपक्रम स्थापित करने का मौका मिला बल्कि सरकारी क्षेत्र की लाभकारी कंपनियों में भी निवेश का अवसर दिया गया. विनिवेश की इस प्रक्रिया के शुरुआती दौर में 5 से 26% विदेशी पूंजी को कड़े प्रावधानों के तहत अनुमति दी जाती थी. विदेशी निवेशकों को पूंजी और लाभ के 'रिपेट्रिएशन', अर्थात घरवापसी की अनुमति नहीं थी. इसके बावजूद विदेशी संस्थागत निवेशकों ने अपने पैर पसारने शुरू किए क्योंकि व्यवसायिक भाषा में जोखिम ही लाभ का आधार है. निजीकरण के इस दौर का नतीजा यह हुआ कि भारतीय बाजारों में अंतर्राष्ट्रीय ब्रांड नजर आने लगे और अधिकांश स्वदेशी कंपनियां व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में पिछड़कर लुट-पिट गई और बंद हुई. इलेक्ट्रिक होम अप्लायंसेज इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जहां आज अमेरिकी, कोरियाई और जापानी कंपनियों का वर्चस्व है. सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र की ज्यादातर कंपनियों का तो और बुरा हाल हुआ. अप्रत्याशित घाटा दिखा रही उनकी बैलेंस शीट को आधार बनाकर सरकारों ने ऐसी कंपनियों को बेचने के पक्ष में तर्क दिए और निजी करण का मार्ग प्रशस्त किया. जबकि वास्तविकता यह है कि आर्थिक वर्चस्व हासिल करने के लिए पूंजीगत ताकतें पर्दे के पीछे अपना काम कर रही थी.

आज परिस्थितियां पूरी तरह से बदल चुकी हैं. हालात यह है कि आधारभूत ढांचे से जुड़े उद्योगों में शत प्रतिशत विदेशी पूंजी निवेश की छूट है. यहां तक कि सुरक्षा से जुड़े उपक्रमों में भी अंबानी समूह की सेंध लग चुकी है. आजादी के दौर में जहां सामाजिक सुरक्षा और जनकल्याण को ध्यान में रखते हुए रेलवे, उड्डयन, जहाजरानी, बैंक, बीमा आदि महत्वपूर्ण क्षेत्रों का राष्ट्रीयकरण किया गया था, वहीं आज के दौर में ये सारे निजी क्षेत्र के लिए खोल दिए गए हैं. बेहतर प्रबंधन और उपभोक्ताओं को अच्छी सुविधाएं मिलने के तर्क देकर सरकारें पूरी तरह से पूंजीगत संस्थानों की तरफदारी करती दिखाई दे रही है.

संपत्तियों को बेचकर अर्थव्यवस्था चलाने की कवायद

जब किसी घर-परिवार का आर्थिक नियोजन घर की संपत्तियों को बेचने से किया जा रहा हो तो निश्चित रूप से उस परिवार का भविष्य अच्छा नहीं कहा जा सकता. यदि समय रहते इसे नहीं सुधारा जाता तो एक वक्त ऐसा भी आ सकता है जब आपके पास संपत्तियां बचे ही नहीं. अर्थशास्त्र का यही सिद्धांत देश पर भी लागू होता है. कहने को तो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण दावा करती हैं कि निजीकरण से उपलब्ध वित्तीय संसाधनों को राष्ट्रीय विकास में लगाया जाएगा लेकिन भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के दृष्टिगत कैसा विकास हो पाएगा, यह देश के जनसाधारण से छिपा हुआ नहीं है.

सरकार के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि आखिर रेलवे और हवाई अड्डों के निजीकरण का क्या औचित्य है. बिजली और टेलीफोन जैसी आधारभूत सुविधाओं में तो पहले ही निजी क्षेत्र का बोलबाला है जिसके चलते बीएसएनएल, एमटीएनएल और प्रादेशिक विद्युत कंपनियां हथियार डाल चुकी हैं. देर सवेर इनका हाल भी एयर इंडिया की तरह होने वाला है. इन संस्थानों की संपत्तियों को बेचकर आर्थिक नियोजन करना कोई बुद्धिमानी नहीं है.


बेचने की बजाय बचाने के हों प्रयास 


राष्ट्रीयकृत संस्थानों के वित्तीय हालत सुधारने के लिए निजीकरण कोई बेहतर समाधान नहीं कहा जा सकता. सवाल यह है कि कभी नवरत्न कहे जाने वाले उपक्रमों को ऐसी हालात में पहुंचाने का जिम्मेदार कौन है. दरअसल, भाई-भतीजावाद, राजनीतिक भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के चलते सार्वजनिक हित के इन व्यवसायिक संगठनों को सुनियोजित तरीके से घाटे की स्थिति में पहुंचाया गया है. इन उपक्रमों पर घाटे का ठप्पा ही सरकारों के लिए निजीकरण की राह आसान करता है. जरा सोचिए जो उपक्रम घाटे में चल रहे हैं वह निजी हाथों में पहुंचते ही लाभकारी कैसे हो जाते हैं !

आवश्यकता तो इस बात की है कि घाटे में चल रहे सरकारी संस्थानों के आर्थिक ढांचे का पुनर्गठन किया जाए और उनमें वही सुधारात्मक उपाय लागू किए जाए जो निजी क्षेत्र द्वारा अपनाए जाते हैं. भारतीय प्रबंधन संस्थानों के विद्यार्थी आज पूरी दुनिया में अपना डंका बजा रहे हैं. गूगल जैसे अंतरराष्ट्रीय दिग्गज का व्यवसायिक दायित्व भी एक भारतीय के हाथों में है. इन प्रबंधन विशेषज्ञों की सेवाएं जब दूसरे देशों द्वारा ली जा रही है तो हमारी सरकारें उन पर भरोसा क्यों नहीं करती. इस दिशा में नई सोच के साथ कदम बढ़ाने की आवश्यकता है.

सरकार यदि भ्रष्ट व्यवस्था पर अंकुश लगाने के लिए कमर कस ले तो हमारे सार्वजनिक उपक्रम अंतरराष्ट्रीय व्यवसायिक संस्थानों की टक्कर में पुनः खड़े हो सकते हैं. सामाजिक दायित्वों की पूर्ति के साथ गुणवत्तपूर्ण वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन के लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है.

-रूंख

Tuesday, 21 July 2020

सीमांत क्षेत्र का भूमि आंदोलन - 1970 (4)

आंदोलन के बावजूद बड़ी मछलियां निगल गई हजारों बीघा जमीनें

लोकतंत्र का एक कलुषित चेहरा यह भी होता है कि यहां कमजोर और दबे कुचले लोगों को पगोथिये (सीढियां) बनाकर चतुर चालाक कारीगर ऊपर पहुंच जाते हैं. सीमांत क्षेत्र का भूमि आंदोलन 1969-70 भी इससे अछूता नहीं रहा. प्रदेश सरकार ने जनाक्रोश और उग्र आंदोलन के चलते राजस्थान नहर से सिंचित होने वाली अनूपगढ़ घड़साना क्षेत्र की सरकारी जमीनों की नीलामी को रद्द तो कर दिया लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से होने वाली जमीनों की सौदेबाजी पर लगाम नहीं लगा सकी. लगाती भी कैसे ! आखिर, भूमाफिया किस्म के सफेदपोश लोग तो सरकार के भीतर और बाहर पैर पसार कर बैठे थे.

सन 1951 से लेकर 1967 तक राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में पांच लाख साठ हजार भूमिहीन किसानों को पैंतीस लाख एकड़ भूमि आवंटित की गई थी. इसमें अनुसूचित जाति और जनजाति के दो लाख तीस हजार काश्तकार शामिल थे. देखने और पढ़ने में तो ये आंकड़े बहुत प्रभावी लगते हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि इन भूमिहीनों में से कितने लोग इस ढंग से आवंटित भूमि पर काबिज हो सके ? वास्तविकता यह है कि आवंटित की गई अधिकांश जमीनों पर समर्थ और प्रभावशाली लोगों के कब्जे थे. उनसे पंगा कौन लेता. लिहाजा उन्होंने जमीन के आवंटियों से औने-पौने दामों में ये जमीनें अपने नाम हस्तांतरित करवा ली. नतीजा वही ढाक के तीन पात. आंदोलन काल के एक आलेख में एडवोकेट हरिशंकर गोयल लिखते हैं कि इन बेशकीमती जमीनों पर बड़े नेता और धनिक व्यापारी काबिज़ हैं. कुछ दलित लोगों की जमीनों पर तो खूंखार और शक्तिशाली लोगों ने जबरदस्ती कब्जे कर रखे हैं. उनके अनुसार गंगानगर जिले में किसानों के 3 वर्ग है. पहला संपन्न किसान, दूसरा तस्करी और व्यापार में लिप्त सफेदपोश व तीसरा साधारण किसान. उनकी मानें तो पहला और दूसरा वर्ग गंगानगर जिले ज्यादातर उपजाऊ भूमि पर कानूनन और गैरकानूनी ढंग से कब्जा जमा चुका है. गोयल यहीं बस नहीं करते बल्कि उस वक्त सत्ताधारी कांग्रेस के सांसदों, विधायकों, प्रधानों और कुछ मंत्रियों पर भी बाकायदा कब्जे करने और करवाने के आरोप लगाते हैं.

गौरतलब है कि आंदोलन में राजस्थान नहर से सिंचित होने वाली जिन जमीनों के सरकारी आवंटन की बात कही जा रही थी वह पाकिस्तान सीमा से लगता हुआ क्षेत्र है. वहां सीमा पर तस्करी में जुटे भूमाफियाओं ने भी सत्ताधारी नेताओं के साथ मिलकर सैंकड़ों बीघा जमीनों पर कब्जे किए. सरकार द्वारा की जाने वाली भूमि नीलामी में दरों को नियंत्रित करने के रास्ते भी इन लोगों ने पहले से निकाल रखे थे. भूमि चाहे नीलामी से आए या किसी दलित को होने वाले आवंटन से, हर हाल में जमीन उन्हीं की होनी थी, जिनके हाथ में लाठी थी. प्रत्यक्षत: दिखाई दे रहे इस पक्षपात पूर्ण भ्रष्टाचार के आचरण ने ही आम जनता में सरकार और उनके समर्थकों के विरुद्ध जनमानस तैयार किया जिसकी परिणति बड़े आंदोलन के रूप में हुई.

आंदोलन समाप्ति के बाद सरकार द्वारा विभिन्न आरक्षित श्रेणियों में इन जमीनों का आवंटन शुरू किया गया. अधिकांश आवंटन दस्तावेजों में जमीनों के स्वामी भूमिहीन और छोटे किसान नजर आते थे लेकिन भू माफिया और कुछ प्रशासनिक अधिकारियों व कर्मचारियों की मिलीभगत के चलते अधिकांश बेशकीमती जमीनें देखते ही देखते प्रभावशाली लोगों के स्वामित्व में चली गई. विकास की इस बहती गंगा में सत्ता और विपक्ष के बड़े नेताओं सहित अनेक अधिकारियों और पटवारियों ने वारे न्यारे किए. आज भी इस क्षेत्र में ऐसे सफेदपोशों की हजारों बीघा जमीनें हैं जो सोना उगलती हैं.

लेकिन इस सब के बावजूद यह भी उतना ही सच है कि इस ऐतिहासिक भूमि आंदोलन की बदौलत ही प्रदेश के लाखों छोटे किसानों को भी जमींदार बनने का हक प्राप्त हुआ. आंदोलन के 50 साल बाद आज ऐसे दबे कुचले काश्तकारों की सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक प्रगति को देखकर उस वक्त के आंदोलनकारियों और जमीन से जुड़े नेताओं के प्रति स्वत: ही श्रद्धा का भाव उमड़ आता है. 
कामरेड श्योपत सिंह, कामरेड योगेंद्र नाथ पांडा, प्रो. केदार, राम चंद्र आर्य, कुंभाराम आर्य, सेवा सिंह, कॉमरेड हेतराम बेनीवाल, गुरदयाल सिंह, महावीर प्रसाद कंदोई सरीखे नेताओं में जनता के हक- हुक़ूक़ के लिए संघर्ष का जो माद्दा था वो किसी भी दृष्टि में आजादी के आंदोलन से कमतर नहीं था. वस्तुत: सत्ता के विरुद्ध यह हक की लड़ाई ही थी जिसमें गांव-गांव से गिरफ्तार हो रहे हजारों लोगों को ग्रामीण महिलाओं ने संघर्ष गीत गाकर खुशी खुशी पुलिस के साथ विदा किया था. यही कारण है कि सीमांत क्षेत्र के आंदोलनों की जब कहीं बात चलती है लोग बड़े गर्व के साथ इन नेताओं को याद करते हैं.

-रूंख

( जानकारी का स्रोत - तत्कालीन समाचार पत्रों की रिपोर्ट, प्रत्यक्षदर्शियों के वक्तव्य, सत्याग्रह स्मारिका, आंदोलन के संबंध में लिखे गए लेख और पुलिस रिपोर्ट)

तीज तिंवारां बावड़ी...!

पुन्न बडेरां  रा  आछा, बरकत है बां  री रीतां  में तिंवार बणाया इस्या इस्या गाया जावै जका गीतां में राजी राखै रामजी ! आज बात आपणै तिंवारां री...

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