Search This Blog

Thursday, 16 April 2020

शहतूत मेरे दोस्त !


पगडंडियों के दिन (1) - रूंख भायला

चलो 'रूंख भायला' की पहचान का एक सिरा पकड़ने की कोशिश करते हैं.

... 1980 के आसपास का समय रहा होगा. रेलवे मेडिकल कॉलोनी, हनुमानगढ़ जंक्शन में एक पेड़ हुआ करता था शहतूत का. रेलवे में ड्राईवर गुलाम नबी जी कादरी इस मोहल्ले में रहते थे. उनके क्वार्टर के पिछवाड़े में लगे इस दरख्त में क्या खूब काले-काले शहतूत लगते थे. तीसरी कक्षा में रहा होऊंगा, जब उसे पहली बार देखा था. उन दिनों ढब्बू स्कूल में पढ़ता था तब एक सहपाठी के घर गया था. उसने बड़े गर्व से अपने मोहल्ले का वह पेड़ दिखाया था और वहीं नीचे गिरे हुए मीठे शहतूत खिलाए थे. शायद वही दिन रहा होगा जब पहली बार मुझे 'रूंख भायला' होने का अहसास हुआ. बाल मन ने जब पेड़ पर लगे शहतूत देखे तो ललचाया. काश, मेरा घर भी इसी शहतूत के पास होता. पर मैं तो इस पेड़ से लगभग 3 किलोमीटर दूर लोको कॉलोनी में रहता था जो गांधीनगर से सटी हुई थी.

सच पूछिए तो लोको के बाशिंदे उन दिनों मेडिकल कॉलोनी के सामने दोयम दर्जे के गिने जाते थे. इसका भी सीधा कारण था कि लोको में ज्यादातर फिटर, खलासी, फायरमैन और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के क्वार्टर्स थे जबकि मेडिकल कॉलोनी में ड्राइवर, टीटी,गार्ड्स और अन्य उच्चाधिकारियों का निवास था. लोको कॉलोनी में सुबह और शाम गलियों का नजारा देखने लायक होता था जब हर घर के आगे सिगड़ियों का धुआं उठता था. सर्द मौसम की शाम में सीगड़ियों से उठती लपटें गलियों की खूबसूरती बढ़ा देती . सबकी अपनी-अपनी आग थी, कोयला था, पानी था. उन दिनों रेलवे इंजन कोयले से चला करते थे और रेलवे के कोयले पर रेलवे से पहले लोको कॉलोनी का हक हुआ करता था. लोको शेड में बने 'डग' से कॉलोनी के लोग कट्टे भर-भर कर कोयला घर लाया करते थे. आरपीएफ और जीआरपी थानों की नजर में रेलवे कर्मियों द्वारा ले जाया जा रहा यह कोयला चोरी की श्रेणी में ही नहीं आता था. रेलवे के थाने, रेलवे का कोयला और रेलवे के लोग, भला चोरी कहां हुई !

गांधीनगर में सिंधियों के घर थे जिनकी औरतें चावलों के खीचिये बनाया करती थी. उस समय एक पीपे कोयले से आधा किलो खीचियेे खरीदे जा सकते थे जिनकी होम डिलीवरी सिंधी परिवारों की महिलाएं कॉलोनी में खुद आकर कर दिया करती थी. कालोनी की औरतें अक्सर एक घर के आगे जमा होकर या तो सब्जी काटती हुई दिखती या कभी स्वेटर बुनती हुई. गलियों में लगे सार्वजनिक नल पर सुबह शाम बाल्टियों के साथ बातों के जमावड़े लगे रहते. हर घर की अपनी दास्तान, हर गली का अपना ठसका. इन सबके बीच चौबीसों घंटे ड्यूटी पर आने जाने वाले चाचाजी और ताऊजी अक्सर गली में टिफिन और बैग उठाए दिख जाते. उन दिनों के लोको में 'अंकल और आंटी सरीखे रिश्ते कम ही हुआ करते थे.

... छठी कक्षा आते-आते संयोग कुछ ऐसा हुआ कि मैं उस शहतूत के पेड़ का पड़ोसी बन बैठा. पिताजी का ड्राइवर पद पर प्रमोशन हो गया था और शायद भगवान ने भी मेरी प्रार्थना सुन ली थी. तभी तो शहतूत के पास वाला क्वार्टर हमें अलॉट हो गया था. अब मैं भी कुछ अकड़ने लगा था. शहतूत जो मेरे पास था. मौसम आते ही पेड़ फिर से शहतूतों से लकदक हो गया था. इस बार पेड़ ने अपनी कुछ डालियां नये पड़ोसी के घर में भी झुका ली थी. बाल-मन एक बार फिर हर्षाया कि पेड़ ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया है. अब दिन भर पेड़ और मैं खूब बतियाते. उसकी डालियों के झुरमुट में बैठकर दोस्तों के साथ खूब शहतूत खाता. पेड़ और पड़ोसी अपने जो थे. कभी-कभी भरी दुपहरी में दूसरे मोहल्लों के बच्चे भी उस पेड़ के इर्द-गिर्द जमा हो जाते. जब वे पत्थर मार कर शहतूत तोड़ रह होते तो अक्सर एक-आध पत्थर हमारे या गुलाम नबी ताऊ जी की खिड़की पर आकर लगता. तब मम्मी या ताई जी चिल्लाते हुए पेड़ के नीचे आते और सारे बच्चों को डांट कर भगा देते लेकिन शहतूत ने कभी किसी को जाने के लिए भी नहीं कहा. उसने सभी बच्चों को बिना किसी भेदभाव के काले-काले और मीठे शहतूत देने करने की अपनी आदत कभी नहीं बदली. सच मानिए, उस पेड़ दोस्त के साथ बिताया वह समय बड़ा ही अच्छा था.

...फिर दिन बदले. बचपन और किशोरावस्था लांघकर मैं युवाओं की जमात में शामिल हो गया. मगर शहतूत का वह पेड़ अब भी मेरी हर अच्छी-बुरी बात में शरीक रहता. सड़क पर पसरी उस की घनी छांव के नीचे मैं अपने दोस्तों के साथ घंटों बतियाता रहता. शहतूत वहीं का वहीं था और मैं मंजिल दर मंजिल आगे बढ़ता गया. पिताजी रिटायर हुए और क्वार्टर छोड़ कर हम सेक्टर नंबर 12 में अपने घर में शिफ्ट हो गए. दुनियावी ji भीड़ में खोता हुआ मैं कभी-कभी उस पेड़ को देखने जाया करता था लेकिन धीरे-धीरे वह आदत भी छूट गई. अब मैं पूरी तरह से सामाजिक प्राणी बन गया था और शहतूत की स्मृतियां भी लगभग विस्मृत हो चुकी थी.

लेकिनआज लगभग 20 वर्ष बाद उसी पुराने दोस्त को देखने की इच्छा जागी है। पता नहीं क्यों ? एक डर भी है. समय की आरी आजकल बंदरों ने थामी है. क्या पता, मेरे दोस्त की गर्दन.......आओ, मेरे पेड़ दोस्त की सलामती की दुआ करें. -रूंख (डायरी के अधखुले पन्नेे -2014)

Tuesday, 14 April 2020

राशन किट में शासन कीट (सामयिक व्यंग्य कथा)

(व्यंग्य कथा)
-डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

'सर, लोग भूखों मर रहे हैं. पालिका प्रशासन क्या कर रहा है ?'

जरूरत से ज्यादा जागरूक समाजसेवी रोशन भल्ला ने दलबल सहित शहर भ्रमण पर निकले पालिकाध्यक्ष के सामने सवाल दागा.

पालिकाध्यक्ष ने कार की खिड़की से मुंह निकालते हुए कहा-

'आप चिंता मत करो. प्रदेश मुख्यमंत्री का आदेश है. किसी को भूखा नहीं मरने दिया जाएगा. हमने आज ही 50 लाख रुपए का अर्जेंट टेंडर निकाला हैं. जरूरतमंदों को राशन किट सप्लाई करेंगे.'

'बहुत बढ़िया, राशन किट में क्या क्या सामान होगा ? पास खड़े एक और समाजसेवी ने पूछा..

'किट में 10 किलो आटा, 1 किलो तेल, आधा किलो मिर्च मसाले, दो नहाने की साबुन और 1 किलो कपड़े धोने की साबुन देंगे.'

'तीन दिनों के भीतर हर जरूरतमंद परिवार को 'राशन किट' पहुंचा दी जाएगी.'

'परन्तु साहब, तीन दिनों तक बेचारा जरूरतमंद आदमी कैसे जिएगा ?'

'देखो, आज का दिन तो निकल ही गया है. कल मंगलवार है, ज्यादातर लोग हनुमान जी के भगत हैं इसलिए एक दिन का व्रत रख लेंगे. इससे आत्मा तो शुद्ध होगी ही संकट से निपटने के लिए प्रार्थना भी हो जाएगी. दिन तो एक ही बचा ना ! एक दिन तो आदमी भूखा रह ही सकता है, क्यों, है ना !'

पालिकाध्यक्ष ने वित्त सचिव की तरह समझदारी बताई. और भल्ला समेत वहां खड़े अन्य जागरूक जनों की प्रतिक्रिया सुनने को बेताब हुए. ये जागरूक लोग लॉकडाउन के बावजूद भूखे पेट इधर-उधर सूंघते फिर रहे थे.

'हां, यह तो बहुत बढिया समाधान है. हम सब आपके साथ सहयोग करेंगे.'

जागरूक लोगों ने तीन दिनों के उपाय पर तसल्ली जताई. भल्ला ने उपस्थिति दर्ज कराने के लिए राशन किट में 1 किलो आलू और 1 किलो प्याज शामिल करने का सुझाव दिया जिसे मुस्कुराते हुए अध्यक्ष महोदय ने स्वीकार कर लिया. वैसे पाठक जान लें कि भल्ला साहब सब्जी मंडी में कमीशन एजेंट है.

'अच्छा, नमस्कार. पालिका में अर्जेंट टेंडर की व्यवस्था देखनी है. चलो ड्राइवर...'

पालिका अध्यक्ष के आदेश पर सफेद डिजायर काला धुआं छोड़ती हुई आगे बढ़ गई.
...........

चूंकि कोरोना संकट के चलते अधिशासी अधिकारी को सांस लेने की भी फुरसत नहीं थी और थकान के कारण रात दो पैग भी ज्यादा हो गए थे लिहाजा पालिकाध्यक्ष द्वारा निर्देशित राशन किट का टेंडर प्रकाशित करवाना भूल ही गए. लग रहा था कि किट वितरण का मामला एक दिन और लेट होगा लेकिन 'अनुभव' के आगे 'भूल' का क्या मोल.

पालिकाध्यक्ष के आने और टेंडर खुलने से ठीक पूर्व ईओ के हस्ताक्षरों से बैक डेट में जारी हुआ टेंडर का विज्ञापन आज सुबह 'उड़ता तीर' में प्रकाशित भी हो चुका था. इस जागरूक समाचार पत्र के संपादक द्वारा इस विज्ञापन के प्रकाशन का बिल 3730/- रूपये (जीएसटी सहित) भी पालिका के अकाउंट सेक्शन में पास कर पहुंचा दिया गया था. अधिशासी अधिकारी की टेबल पर 'उड़ता तीर' का ताजा अंक करीने से रखा हुआ था.

जैसे ही पालिकाध्यक्ष अपने चेंबर में पहुंचे उनकी बाट जोह रहे अधिशासी अधिकारी ने कुल जमा 5 लोगों की उपस्थिति में टेंडर की कार्रवाई शुरू की. इनमें दो पालिका के अनुभवी ठेकेदार थे जिनके हाथों में दो-तीन अन्य फर्मों के मोहर सहित हस्ताक्षरित लेटर पैड थे और पांचवें के रूप में पालिका के सहायक अभियंता शामिल थे. इसी बीच समाजसेवी रोशन भल्ला भी अपनी फर्म का लेटर पैड और हाथ में मोहर लिए कार्यालय में दाखिल हुए.

'आओ भल्ला साहब, अच्छा हुआ आप सही समय पर आ गए.'

पालिकाध्यक्ष ने भल्ला का स्वागत करते हुए कहा फिर अधिशासी अधिकारी की ओर मुखातिब होकर बोले-

'ईओ साहब, राशन किट के जी शेड्यूल में प्रति किट 1 किलो आलू और 1 किलो प्याज भी जोड़ देना. भल्ला साहब ने ही यह बेहतरीन सुझाव दिया था लिहाजा यह टेंडर उन्हीं को देना मुनासिब होगा.'

'हीं हीं हीं, आपका आदेश सिर माथे.' भल्ला ने खींसें निपोरते हुए कहा.

'ठीक है सर.' ईओ ने भल्ला को घूरते हुए सिर हिलाया. उधर गोदारा बिल्डर्स और अग्रवाल कंस्ट्रक्शन्स के मालिकों की नजरें आपस में मिली और उन्होंने भी सहमति जताई. मौन रहते हुए भी टेंडर प्रक्रिया पूरी की जा सकती है, उस दिन पालिका अधिशासी अधिकारी के कार्यालय में इसका एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत हुआ. कोई शोर शराबा नहीं, चुपचाप टेंडर पेटी में विधिवत रूप से भरे 5 टेंडर फार्म डाले गए. सबसे न्यूनतम दर होने के कारण राशन किट का ठेका मै. अग्रवाल कंस्ट्रक्शन्स को मिला जिसमें मै. गोदारा बिल्डर्स डमी पार्टनर बन गए. अब यह मत पूछिए उनका हिस्सा कितना था.

'तो अग्रवाल जी, राशन किट की सप्लाई कब होगी ? मुझे हर हाल में आज से तीसरे दिन किट वितरण का काम शुरू करना है.' पालिकाध्यक्ष ने सवाल किया.

'आप आदेश करें हम तो कल ही आपूर्ति कर देंगे.'

जवाब सतपाल गोदारा की तरफ से आया था जो अब अग्रवाल कंस्ट्रक्शन में भी हिस्सेदार थे.

चेयरमैन साहब, यदि अर्जेंट टेंडर में कुछ अग्रिम भुगतान हो जाता तो......' हं हं हं, वो क्या है कि बैंक में भी इन दिनों पेमेंट का लेनदेन बहुत घट गया है.'

संपत जी अग्रवाल ने आशा भरी निगाहों से देखा.

'यह काम भई ईओ साहब का है.' यदि वह दे सकें तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है.'

पालिकाध्यक्ष ने मुस्कुराते हुए कहा.

'राज्य सरकार की नई गाइडलाइन के अनुसार हम 20% राशि अग्रिम भुगतान कर सकते हैं यानी 10 लाख रुपए.'

अधिशासी अधिकारी ने भुगतान का मार्ग प्रशस्त किया.

'बस फिर ठीक है, कबूतर फंड का 17% हम अभी नकद जमा करवा देते हैं और आप चेक काट दीजिए. क्यों भल्ला साहब, आप अपना हिस्सा नगद दे देंगे ना !

संपत जी अग्रवाल ने उत्साहित होकर कहा. भल्ला साहब ने सिर हिलाकर हामी भर दी.
पालिकाध्यक्ष, अधिशासी अधिकारी और सहायक अभियंता सहित सबने संकट की इस घड़ी में अपने-अपने हिस्से पर संतोष व्यक्त किया. ठेकेदारों ने बिना कुछ खाए पिए राशन किट आपूर्ति का काम शुरू कर दिया.
..............

लगे हाथों अगले दिन के अखबारों पर नजर डाली जाए. वो क्या है कि मीडिया के सहयोग के बिना राशन किट का सफल वितरण नहीं हो पाएगा.

'उड़ता तीर' की ब्रेकिंग न्यूज़-

'किसी को भी भूखा नहीं मरने देंगे: पालिकाध्यक्ष'

- कल से बंटेगी राशन किट
- पार्षदों की देखरेख में रहेगी व्यवस्था

(नि.सं.) । कोरोना संकट को देखते हुए पालिका प्रशासन ने जरूरतमंदों को राशन किट बांटने की सारी तैयारी कर ली है. कल से पार्षदों की देखरेख में किट वितरण प्रारंभ होगा. पालिका सभागार में आयोजित बैठक में पालिकाध्यक्ष ने पार्षदों को बताया कि राशन किट वितरण के लिए ₹50 लाख का अर्जेंट टेंडर किया गया है. राशन किट में घरेलू जरूरत का सारा सामान दिया जाएगा. प्रत्येक पार्षद को 150 किट वितरण के लिए दी जाएगी जिन्हें वे अपने वार्ड में स्वविवेक से चिन्हित गरीब परिवारों में बंटवाएंगे. सोशियल डिस्टेंसिंग की पूरी पालना के साथ आयोजित इस बैठक में पार्षदों ने पालिकाध्यक्ष के प्रयासों की भूरी-भूरी प्रशंसा करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया.

(इसी अखबार के दो नंबर पेज पर 12 गुना 4 कॉलम का एक विज्ञापन लगा है जिसमें पालिका अध्यक्ष की हाथ जोड़े हुए फोटो लगी है. फोटो के ठीक एक तरफ कोरोना वायरस का चित्र भी छापा गया है.)

'फाचर इंडिया डॉटकॉम'
(हम सच छुपाते नहीं, छापते हैं)

पार्षदों ने लगाए 'चेयरमैन चोर है' के नारे

-राशन किट को लेकर पालिका बैठक में हंगामा
- किट वितरण में बड़े घोटाले की आशंका

(नि.सं.) । राशन किट वितरण को लेकर पालिका सभागार में आयोजित बैठक में पार्षदों ने घमासान मचाया. विधायक की उपस्थिति में ही वरिष्ठ पार्षद खेमचंद अरोड़ा ने पालिकाध्यक्ष से माइक छीन लिया और 'चेयरमैन चोर है' के नारे लगाने लगे. अरोड़ा ने आरोप लगाया कि राशन किट का ठेका एक ऐसे ठेकेदार को दिया गया है जिस पर भ्रष्टाचार के पांच मामले एसीबी में चल रहे हैं. उन्होंने आलू प्याज की आपूर्ति का ठेका भी पालिकाध्यक्ष के चहेते भूषण भल्ला को दिए जाने पर आपत्ति जताई. चेयरमैन से कोई जवाब देते नहीं बना और वे बगले झांकने लगे. इस पर पार्षद प्रकाश सैनी, रमजान खां, महावीर वर्मा, कामरेड रामेश्वर सहित कई अन्य पार्षद राशन किट टेंडर घोटाले की जांच करवाने की मांग करने लगे. विधायक और अधिशासी अधिकारी ने बड़ी मुश्किल से सबको शांत किया. विधायक ने चेयरमैन को निर्देश देते हुए सभी पार्षदों को साथ लेकर चलने की बात कही. बैठक में सरकारी आदेशों के बावजूद सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाई गई.
सूत्रों से पता चला है कि पालिकाध्यक्ष ने मिलीभगत करते हुए राशन किट के ठेके में ₹10 लाख का अग्रिम भुगतान भी ठेकेदार को कर दिया है और कबूतर फंड में भी कमीशन की राशि नकद जमा हो चुकी है.

संध्या टाइम्स की ताजा खबर
(सबसे पहले, सबसे तेज)

खेम अरोड़ा होंगे किट वितरण कमेटी के अध्यक्ष

- पार्षद प्रकाश सैनी, रमजान खां, महावीर वर्मा और कामरेड रामेश्वर होंगे कमेटी सदस्य
- असंतुष्ट पार्षदों ने जताया पालिकाध्यक्ष में पूरा भरोसा

(नि. सं.) जरूरतमंद परिवारों को राशन किट वितरित किए जाने का रास्ता साफ हो गया है. पालिकाध्यक्ष ने जानकारी देते हुए बताया कि असंतुष्ट पार्षदों की गलतफहमी दूर कर दी गई है और अब खेमचंद अरोड़ा के नेतृत्व में वरिष्ठ पार्षद किट वितरण का दायित्व संभालेंगे. वार्ड पार्षद कामरेड रामेश्वर की देखरेख में वार्ड 10 से इस कार्यक्रम की शुरुआत होगी. पालिका के अधिशासी अधिकारी ने बताया कि इसके लिए सारी तैयारियां कर ली गई है.

(इस अखबार के फ्रंट पेज पर पालिकाध्यक्ष, खेम अरोड़ा और किट वितरण कमेटी के सदस्यों की सामूहिक फोटो के साथ 20 गुना 4 कॉलम का विज्ञापन छपा हुआ है. 'किसी को भूखा नहीं मरने देंगे' विज्ञापन का शीर्षक है.)

इधर पालिकाध्यक्ष के चेंबर में राशन किट सप्लायर और कमेटी के लोगों के बीच बैठक हो रही है.

'खेमजी, 'उड़ता तीर' तो चेयरमैन साहब ने काबू कर लिया है. 'फाचर' आप करो.'

महावीर वर्मा ने बोर्ड के सबसे घाघ सदस्य खेम अरोड़ा को छेड़ा.

' मैं तां 'उडदा तीर' वी लै लैया भरावा, हुण तुसी लवो.' खेम ने अपनी सांकेतिक भाषा में समझाया.

'यार खेम, बैठक में ढंग से बोला करो. पत्रकारों के सामने चेयरमैन को चोर कहने से पूरी पालिका बदनाम होती है.' कामरेड रामेश्वर ने समझाने के अंदाज में कहा.

'अच्छा..., एतकाल़ी डाकू कै दवांगे... क्यों चेयरमैन साहब !' खेम मजाक के मूड में था.

'छोड़ो खेम जी, राशन किट अग्रवाल जी के गोदाम में तैयार है. या तो उन्हें पालिका कार्यालय में मंगवा लें या सभी पार्षद डायरेक्ट उनके गोदाम से रिसीव कर लें. क्या ठीक रहेगा ?' पालिकाध्यक्ष ने गंभीरता दिखाते हुए कहा.

'अठै ल्या रै के करणो है. पार्षद आप ई उठवा लेसी, उठाव री पर्ची बणा'र साइन करा लेया.' प्रकाश सैनी ने अपनी होशियारी बताई.

'होर की, कम सोखा हो जऊ.' खेम अरोड़ा ने हामी भरी. 'ओ सम्पत, तेरी किट तां त्यार है, जां नीं ? रेहड़ी भाड़ा ई तूं दे के भेजणा है.'

'हं हं हं, खेम भाई जी, बिल्कुल तैयार है. आप चल कर देख लो. भाड़े की चिंता मत करो.' किट सप्लायर संपत जी मुस्कुरा कर बोले.

बहुत बढ़िया, खेम जी, प्रकाश जी आप लोग चेक कर लेना. प्रत्येक पार्षद को सुपुर्दगी साइन करवाकर 150 किट देनी है. ईओ साहब, सभी पार्षदों को अभी सूचना करवा दें. कल सुबह 10:00 बजे सभी 60 वार्डों में वितरण शुरू करवाना है.' पालिकाध्यक्ष ने उठते हुए कहा.

'हुण कम साड्डा है.' खेम जी ने कुर्ते की कॉलर ठीक करते हुए कहा और पास बैठे संपत अग्रवाल के थापी मारी.

संपत अग्रवाल के गोदाम में राशन किट के वितरण की व्यवस्था पूरी पारदर्शिता से हुई. खेम जी ने दो उंगलियां उठाई जिसे संपत जी ने स्वीकार कर लिया. कमेटी के सदस्यों को भी खेम अरोड़ा की दो उंगलियां जच गई क्योंकि खेम की एक उंगली तो उनके पास गिरवी रखी हुई थी.

कमेटी सदस्यों के जाने के बाद गोदाम में पार्षदों का आना शुरू हो गया. उनसे डील करने के लिए मै. अग्रवाल कंस्ट्रक्शन्स का डमी पार्टनर सतपाल गोदारा ही काफी था. अधिकांश नए पार्षद पुरानों का हाथ थामे आ रहे थे ताकि उनके अनुभव का लाभ ले सकें. सब ने अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार किट उठवाई लेकिन ईमानदारी इतनी थी कि सुपुर्दगी की सारी पर्चियां '150 राशन किट प्राप्ति' की टिप्पणी लिखाए हुए थी. अब कितने पार्षदों ने कितनी किट उठाई इसका आइडिया पाठक ही बेहतर लगा सकते हैं. हां इतना जरूर याद रखें कि ईमानदारी अभी जिंदा है इसीलिए शहर जिंदा है.

वैसे संकेत दे दूं कि अनुभवी ठेकेदार संपत जी अग्रवाल ने टेंडर में वर्णित संख्या की दो तिहाई किट ही बनवाई थी. इसके अलावा अग्रवाल कंस्ट्रक्शन्स की कच्ची हिसाब बही की में ईओ और चेयरमैन के निर्देशानुसार निम्न राशन किट भिजवाने की एंट्री भी की गई है-

1. पत्रकार कंवल जी (नकद) - 10 किट
2. एसडीएम का निजी सचिव - 20 किट
3.चेयरमैन की कामवाली बाई - 05 किट
4. पुलिस थाना - 25 किट
5. उड़ता तीर (नकद) - 20 किट
6. फाचर (4 हजार नकद +) - 20 किट
7. पालिका सफाई निरीक्षक - 10 किट

मजे की बात है कि गोदाम का स्टॉक रजिस्टर अब भी आधे से ज्यादा राशन किट का स्टॉक बता रहा है. यूं समझ लीजिए 'राशन किट' जादूगर सम्राट शंकर के 'वाटर ऑफ इंडिया' का रूप ले चुकी है जो कभी समाप्त ही नहीं होता.
............................

अगले दिन वार्ड 16 की पार्षद चक्की देवी के घर कच्ची बस्ती के बीस-पच्चीस लोगों का जमावड़ा लगा हुआ था. पार्षद पति भगवाना भाट चतुराई से किट बांट रहा था. चक्की देवी ने हर किट में से नहाने की एक व कपड़े धोने की दो साबुन पहले ही निकाल ली थी. उसके लड़के मोहन ने भी समझदारी दिखाते हुए हर किट से आधा किलो प्याज निकाल लिए थे और मोहल्ले के मोहन किराना स्टोर में रखवा दिए थे. कुछ लोग किट लेकर घर जा चुके थे कि तभी किशन स्वामी, जिसकी पत्नी कलावती ने चक्की देवी के सामने चुनाव लड़ा था, अपने साथ दो लोगों को लेकर पहुंचा.

'भगवाना, आं नै क्यूं कोनी दियो रे राशन ?'

किशन के स्वर में तल्खी थी.

'आंगो नाम खाद्य सुरक्षा मांय जुड़योड़ो कोनी.'

भगवाने ने एक दूसरे आदमी को किट पकड़ाते हुए कहा. किशन के साथ आए दोनों आदमियों ने भगवाने की तरफ आशा भरी निगाहों से देखा लेकिन भगवाना ठहरा पूरा खिलाड़ी, वह किशन को क्या धारता !

'तो नांव कुण जुड़ासी ? पार्षद तू है.'

किशन ने सुर ऊंचा करते हुए कहा.

बोटां आल़ी टैम तो भगवानों याद कोनी आयो आन्नै.'

भगवाने ने अपनी भौंहें नचाई और उन्हें अनसुना करते हुए दूसरे लोगों को किट देने लगा. किशन अनर्गल प्रलाप करता रहा लेकिन वहां उसका साथ कौन देता ? सब राशन किट की उम्मीद में भगवाने की ओर तक रहे थे. ऐसे में किशन ने वहां से चुपचाप निकलने में ही भलाई समझी. उसके साथ आए दोनों आदमी अंत तक वहीं डटे रहे कि शायद भगवाने को तरस आ ही जाए.

सबको सलटाने के बाद भगवान ने उनकी तरफ ताका. थोड़ी देर बाद बोला.

'किट तो दिरा देस्यूं पण ईं किसनियै गो सागो छोडणो पड़सी, बोलो मंजूर है ?'

'रोटी नाम सत है, खाये से मुगत है...' और यह मुक्ति इस वक्त भगवाने के हाथ में थी जिसे दोनों ने सहर्ष स्वीकार कर लिया.

'ल्यो, ऐकर एक किट ल्यो, आपसरी मांय बांट लेया.... बांट बांट गे खाणो, बैकूंठा गो जाणो !'
- रूंख














Monday, 13 April 2020

एक आम आदमी की दृष्टि में देश आगे कैसे बढ़े !


(प्रधानमंत्री के रूप में मेरी प्राथमिकताएं)

लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रधानमंत्री वह व्यक्ति होता है जिसका जनता अनुसरण करती है. उच्च आदर्शों की स्थापना करने वाला प्रधानमंत्री देश को प्रगति के पथ पर अग्रसर कर सकता है, इसमें कोई संदेह नहीं है.
मेरे विचार से प्रधानमंत्री को भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती और देश को महाशक्ति बनाने की दिशा में निम्न कार्यों पर प्राथमिकता से काम करना चाहिए:-

1. सर्वप्रथम उन्हें विलासिता पूर्ण प्रोटोकॉल युक्त जीवन की बजाय साधारण जन के रूप में अपनी छवि प्रस्तुत करनी चाहिए. जिस देश में आधी से अधिक आबादी को को खाने पहनने और रहने की उचित सुविधा उपलब्ध ना हो उस जन गण के नेता को सिवाय वांछित सुरक्षा व्यवस्था के अतिरिक्त अन्य सभी तामझाम को घटा कर सरकारी खर्च में अभूतपूर्व कटौती का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए. प्रधानमंत्री की मंत्री परिषद को भी इसी प्रकार का व्यवहार करना चाहिए क्योंकि वे सभी लोकसेवक हैं. राष्ट्रपति से भी ऐसे ही आचरण की उम्मीद की जानी चाहिए.

2. न्याय व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन से देश में बेहतर कानून व्यवस्था बनाई जा सकती है. न्यायालयों में करोड़ों मुकदमे बकाया पड़े हैं जिनमें से अधिकांश अपीलीय प्रकृति के हैं. न्याय व्यवस्था में सिर्फ सिंगल अपील की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि निचली अदालतों पर भरोसा बढे. न्यायालयों की क्षेत्राधिकारिता का पुनर्निधारण होना जरूरी है. भारतीय दंड संहिता में अपराध और सजा के अतिरिक्त तीसरा महत्वपूर्ण प्रावधान उस अपराध के निस्तारण की समय सीमा तय करना आवश्यक है ताकि पुलिस और न्यायिक व्यवस्था में जनता का भरोसा नए सिरे से स्थापित हो. भ्रष्टाचार और बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों को कैपिटल क्राइम की श्रेणी में डालना जरूरी है जिनके लिए मृत्युदंड/अंगभंग ही बेहतर समाधान है.

3. भारतीय ब्यूरोक्रेसी आज भी अंग्रेजी पद्धति पर आधारित है जिसमें देश की आवश्यकताओं के अनुरूप बदलाव की जरूरत है. सबसे बड़ा भ्रष्टाचार यहीं से उपजता है. केवल सैद्धांतिक परीक्षाओं की बजाए प्रैक्टिकल नॉलेज आधारित चयन प्रक्रिया होना बेहद जरूरी है. चुने गए प्रशासनिक अधिकारी को न्यूनतम 2 वर्ष तक जनसेवक की भूमिका में प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए न कि परंपरागत प्रशासनिक अधिकारी के रूप में. प्रशासनिक व्यवस्था में डिजायर सिस्टम तुरंत बंद होना चाहिए ताकि अधिकारी बेखौफ होकर काम कर सकें. अधिकारियों के ट्रांसफर की केंद्रीय नीति बननी चाहिए जिसे कोई भी राजनीतिक सत्ता प्रभावित न कर सके.

4. अर्थव्यवस्था का आधार कृषि और उद्योग धंधे हैं. बदकिस्मती से दोनों की हालत खराब है. कृषि क्षेत्र में सुधार तभी लाया जा सकता है जब पारंपरिक कृषि के स्थान पर वैज्ञानिक पद्धति अपनाई जाए. उन्नत कृषि को बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री को कृषि विशेषज्ञों के साथ एक समयबद्ध कार्य योजना बनानी चाहिए. वैज्ञानिक तौर तरीकों को अपनाने वाले प्रगतिशील किसानों की फसल का समर्थन मूल्य 25% तक बढ़ाना चाहिए जिससे दूसरे किसान प्रोत्साहित हो. नकदी फसलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए विशेष प्रोत्साहनकारी सुविधाएं विकसित की जानी चाहिए.

5. उद्योग धंधों की हालत सुधारने के लिए वर्तमान औद्योगिक नीति में सिंगल विंडो क्लीयरेंस को यथार्थ रूप से लागू करवाने की जरूरत है. नवाचारों को लागू करने वाले उद्यमियों को हर हाल में प्राथमिकता मिलनी चाहिए. आधारभूत ढांचे के निर्माण से जुड़े उद्योगों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 10 वर्षीय फ्री टैक्स सुविधा मिलनी चाहिए. इसी प्रकार 100 प्रतिशत निर्यात करने वाली यूनिट्स को फ्री टैक्स के अतिरिक्त अन्य प्रोत्साहन देने वाली सुविधाएं विकसित करनी चाहिए. भारतीय टैक्स व्यवस्था में करों की दर को वैश्विक दरों के समकक्ष लाना चाहिए. करदाताओं की संख्या तभी बढ़ सकती है जब जनमानस में करों के प्रति भय न हो और वह स्वेच्छा से कर देने के लिए आगे आएं. करदाताओं को सरकार द्वारा आमजन की अपेक्षा विशेष सरकारी सुविधाएं देनी चाहिए ताकि उन्हें प्रोत्साहन मिले. इस प्रयोग से कर संग्रहण के आंकड़े तुरंत बदल सकते हैं.

6. प्रधानमंत्री को देश में विज्ञान को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रयास करने चाहिए ताकि तकनीकी क्षेत्र में हमारा वर्चस्व बढ़ सके. वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रतिवर्ष बड़ी राशि के नकद पुरस्कार स्थापित करने चाहिए. इसरो और यूजीसी जैसे संस्थानों को राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की जरूरत है. सूचना क्रांति के क्षेत्र में भारत अपना वर्चस्व स्थापित कर सकता है बशर्ते भारत की सरकार सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स के लिए विशेष सॉफ्टवेयर पार्क विकसित करें.

7. देश की भावी पीढ़ी के निर्माण हेतु प्रधानमंत्री को समूचे देश में सेकेंडरी स्तर की शिक्षा में एकरूपता लानी चाहिए. प्रादेशिक शिक्षा बोर्डों को केंद्रीय शिक्षा बोर्ड के अधीन लाकर उनके दायित्व नए सिरे से निर्धारित किए जाने चाहिए तथा समयबद्ध ढंग से पाठ्यक्रमों का निर्धारण कर उनका अपडेशन किया जाना चाहिए. विद्यालय के शिक्षकों को शिक्षा के अतिरिक्त किसी भी अन्य गतिविधियों में नहीं लगाया जाना चाहिए. शिक्षकों का वेतन परफॉर्मेंस आधारित पद्धति से तय किया जाना चाहिए न कि गधे और घोड़े को एक समान हांक कर. उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नवीनतम सुविधाओं से युक्त केंद्रीय विश्वविद्यालयों की स्थापना होनी चाहिए जिनकी प्रवेश प्रक्रिया सिर्फ योग्यता आधारित हो. शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश पाने वाले विद्यार्थियों से न्यूनतम शुल्क लिया जाना चाहिए ताकि प्रतिभावान विद्यार्थी वंचित न रह सके.

8. प्रधानमंत्री को देश की संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप पूर्णतया धर्मनिरपेक्ष होकर कार्य करना चाहिए. देश की प्रशासनिक और कानून व्यवस्था बिगाड़ने वाले तत्वों को तुरंत कड़ा दंड देने की व्यवस्था करनी चाहिए भले ही वह किसी भी धर्म के क्यों ना हो. अल्पसंख्यक आयोग और मंत्रालयों को तुरंत समाप्त किया जाना चाहिए जो विभेद पैदा करते हैं. धार्मिक स्थानों यथा मंदिरों, मस्जिदों और गुरुद्वारों की आय उसी वित्तीय वर्ष में जिला कलेक्टर की देखरेख में जन सुविधाओं को विकसित करने पर खर्च किए जाने की की बाध्यता लागू करने की जरूरत है.
9. संवैधानिक आरक्षण व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव की जरूरत है. जातिगत और सरकारी नौकरियों में आरक्षण व्यवस्था केवल दो स्तर की होनी चाहिए जिसमें 45 प्रतिशत महिला आरक्षण और 10% दिव्यांग और शहीद परिवारों का आरक्षण हो. दबे कुचले वर्गों के बच्चों को सामान्य श्रेणी के बच्चों के सामने पूर्णतया निशुल्क बेहतरीन शैक्षिक व्यवस्थाओं का लाभ मिलना चाहिए लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं में सबको समान रूप से अवसर मिलने चाहिए.

10. अंतिम रूप से उसे हर निर्णय लेने से पूर्व यह मनन करना चाहिए कि उसके इस निर्णय से देश और अंतिम छोर पर खड़े देशवासी को क्या फायदा होगा ? यदि प्रधानमंत्री अपने निर्णयों में राजनीतिक हितों की बजाय देश हित को प्राथमिकता देना प्रारंभ कर दें तो यकीनन देश की तस्वीर बड़ी जल्दी बदल सकती है. 



Thursday, 20 February 2020

टोल नाकों पर लुटता आम आदमी

  1. केंद्र सरकार की नीतियों का विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट है कि सरकारी रीतियां और नीतियां कारपोरेट जगत के हितों से जुड़ी हुई है. ताजा मामला राष्ट्रीय राजमार्गों पर स्थित टोल नाकों के डिजिटलाइजेशन का है. राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने फास्ट टैग की आड़ में आम आदमी की जेब काट कर टोल वसूल रही कंपनियों और बैंकों के खातों में एक झटके में करोड़ों रुपए भर दिए हैं.

सरकार द्वारा 1 जनवरी से वाहन मालिकों को अपनी गाड़ी पर फास्टैग लगवाने के आदेश जारी हो चुके हैं. इसके लिए वाहन मालिक को टैग जारी करने वाले बैंक के पास अपना फास्टैग अकाउंट खोलना होगा और उसमें न्युनतम 200 रू़पये की राशि जमा करनी होगी. किसी भी टोल से उस वाहन के गुजरते समय सेंसर और कैमरे के जरिए स्वतः ही टोल टैक्स कट जाएगा. डिजिटलाइजेशन की सुविधा वाकई शानदार है लेकिन इस सुविधा की आड़ में सरकार ने आम आदमी की जेब से चुपचाप करोड़ों रुपए निकालकर बैंकों के खाते में पहुंचा दिए हैं. इतना ही नहीं, जो वाहन मालिक फास्टैग का उपयोग नहीं कर रहे हैं उनकी जेब काटने के रास्ते भी निकाल लिए गए हैं.

टोल नाकों की पूर्व् व्यवस्था के अनुसार यदि कोई वाहन एक टोल नाके से 24 घंटे की अवधि में आना-जाना करता था तो उसे टोल भुगतान करते समय डिस्काउंट दिया जाता था और वाहन मालिक अपने फायदे के लिए एक साथ टोल पर्ची कटवा लेता था. लेकिन नई व्यवस्था लागू होने के बाद यदि कोई व्यक्ति टोल पर नकद भुगतान करता है तो उसे यह डिस्काउंट नहीं मिल रहा है. इसके लिए बाकायदा राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने आदेश जारी किए हैं. सोचिए, टोल वसूल रही कंपनियों को एक छोटे से आदेश से कितना बड़ा आर्थिक फायदा होने वाला है. सरकार की इस मनमानी पर सब मन मसोसकर रह जाते हैं क्योंकि किसी के पास भी ऐसे नियमों के विरुद्ध संघर्ष करने का समय ही नहीं है.

टोल वसूल रही कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यहीं नहीं रुका है बल्कि उसने एक और चतुराई भरा आदेश जारी किया है. इस आदेश के अनुसार यदि कोई वाहन, जिसके फास्टैग नहीं लगा हुआ है, वह फास्टैग की लाइन में आ जाता है तो उसे टोल शुल्क का दुगना भुगतान करना होगा. भले ही वह किसी टोल कर्मी की गलती से उस लाइन में आ गया हो. घड़ी भर के लिए यह मान भी लिया जाए कि गलत लेन में आने का जुर्माना तो भरना ही पड़ेगा तो वह जुर्माना टोल शुल्क का दुगुना होना कहां तक जायज है ?

आखिर अवैध वसूली का यह खेल किसके लिए खेला जा रहा है.जरा सोचिए, एक ऐसा व्यक्ति, जिसके पास अपनी कार है और वह महीने में मुश्किल से चार बार किसी टोल नाके से गुजरता है. उस व्यक्ति के लिए फास्टैग सिस्टम कहां तक जरूरी है. वह क्यों किसी बैंक में अपना फास्टैग अकाउंट रखें और उसमें अग्रिम धनराशि जमा करें ? टोल कंपनी को नकद धनराशि देते समय उसे कैश डिस्काउंट से वंचित क्यों किया जाए ? भारतीय संविधान में हर नागरिक को समता का अधिकार दिया गया है लेकिन हाईवे अथॉरिटी ने वाहन मालिकों के बीच विभेदकारी नीति अपनाकर इस अधिकार पर लगाम कसने का काम किया है.

ऐसे सवालों का राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के पास एक ही जवाब है कि डिजिटलाइजेशन करने के लिए यह सब जरूरी है. कॉरपोरेट की भाषा में कहें तो बेहतर सुविधाओं के लिए यह व्यवस्था की गई है जबकि देश के टोल नाकों पर कितनी बेहतर सुविधाएं हैं यह देश का आम आदमी भली भांति जानता है. इन टोल नाकों पर नियुक्त किया गया स्टाफ किसी बाउंसर से कम नहीं होता जो वाहन मालिक द्वारा कुछ भी पूछताछ अथवा प्रतिवाद किए जाने की स्थिति में मारपीट पर उतारू होता है. टोल कंपनियों द्वारा  सड़कों  का रखरखाव भी गुणवत्तापूर्ण नहीं है.  कई स्थानों पर तो यह हालत है कि  सड़कों का निर्माण भी पूरा नहीं है. उसके बावजूद  सरकार ने  इन कंपनियों से मिलीभगत करते हुए  उन्हें टोल वसूल करने के आदेश जारी कर दिए हैं. सरकार द्वारा सड़क सुरक्षा मानकों को पूरी तरह से ताक पर रख दिया गया है जिसका खामियाजा दुर्घटनाओं के रूप में अक्सर आम आदमी भुगतता है. सूरतगढ़ से बीकानेर के बीच  स्थित राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 62 इसका बेहतरीन उदाहरण है. मजे की बात यह है कि स्थानीय पुलिस प्रशासन भी नियम कायदों की आड में पीड़ित व्यक्ति की शिकायत पर लीपापोती करता हुआ नजर आता है. कमोबेश ऐसी स्थिति देश के लगभग सभी टोल नाकों पर देखी जा सकती है.

निजीकरण की यह सरकारी नीति लोकतांत्रिक व्यवस्था के हित में नहीं है. सरकार को आम आदमी के हितों को ध्यान में रखते हुए फैसले लेनी चाहिए क्योंकि यही लोकतंत्र का मूल मंत्र है.


तीज तिंवारां बावड़ी...!

पुन्न बडेरां  रा  आछा, बरकत है बां  री रीतां  में तिंवार बणाया इस्या इस्या गाया जावै जका गीतां में राजी राखै रामजी ! आज बात आपणै तिंवारां री...

Popular Posts