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मां कूड़ बोलै है !

(राजस्थानी कहाणी)
डाॅ. हरिमोहन सारस्वत ‘रूंख’

‘बात अपरोगी तो है पण सोळा आना सांच है. म्हारी मां कूड़ बोलै है !’

‘भई कूड़ तो पग-पग पर है. इण मांय क्यांरो इचरज ?’

‘हां, थे ठीक कवो, पण म्हारी मां री बात अपरोगी है.’

'अपरोगी बात कोनी, म्हानै तो थे लाग्या. सावळ ढबसर बताओ तो ठाह पड़ै.’

‘सुणो, बात आ है कै पग-पग पर बोलिजतै कूड़ रै मूळ मांय तो सुवारथ निगै आ बोकरै पण म्हारी मां रै कूड़ मांय इसी कोई बात कोनी. बा तो फगत आपरी बात मनावणी चावै. पण बात हुवै तो जचै. नीं बठै तो साव कूड़ ई कूड़. इण रै कारणै ई मां रै साथै हरमेस म्हारी जिद्दाजिद्दी चलै. म्हूं सदांई भणतो आयो हूं कै कूड़ बोलणो पाप हुवै अर मिनख नै जठै तांई सरै, सांच बोलणो चाइजै. म्हूं आ बात बाळपणै सूं लगा’र आज तांई अलेखूं बिरियां मां नै बताई होवैला पण चिकणै घड़ै छांट ठै’रै तो ठै’रै.’

मां रै तो सागी गांगरथ. तन्नै तो म्हारी सगळी बातां ई कूड़ लागै. कूड़ लाडी म्हूं कोनी बोलूं, तूं बोलै. आजकलै रो धान खायां पछै थारी छोड़, किणी मूण्डै सूं सांच तो निसर ई नीं सकै. म्हूं अबोलो रैय जावूं. आप ई सोचता होवोला आच्छो मिनख है, बात कीं बतावै कोनी, बैठयो दळिया दळै. थ्यावस तो राखो. बात है सांच अर कूड़ री. पण कूड़ अेक हुवै तो बताऊं. अठै तो सगळो ठांव ई झूठ रै भारियां सूं भरिजेड़ो है.

‘अबै थेई बताओ म्हारी मां कवै कै जद कदेई बांरै गांव मांय रात-बेरात कोई ओपरो आदमी आ ढूकतो अर बो किस्यै ई घर री चौकी माथै जा पूगतो तो बीं घर रा घरधणी बीन्नै आच्छी रोटी घालता अर सोवण नै मांचो अर गाभा न्यारा देंवता. बै पूछता तो फगत बींरी साख अर गांव रो नांव. बो ओपरो मिनख रातभर चैन सूं सोंवतो अर दिनुगै आपरो मारग लेंवतो.’

‘अब आप ई बताओ आ बात कूड़ नीं तो पछै और कांई है. अेक ओपरो आदमी ना जाण ना पिछाण. बिन्नै कोई किंया घर मांय बाड़ सकै पण मां तो बिन्नै रोटी खुवा’र सोवण री जिग्यां देवण री बात न्यारी बतावै. अर जे आपनै आ बात सांच लागै तो म्हारी अेक बात रो उथळो देवो आप कदेई कोई ओपरै आदमी नै आपरै बारणै सूं आगै ई लंघण दियो है के ?’

मून ना धारो. हंकारो भरो कै मां कूड़ बोलै है.

मां बतावै कै बींरै पी'र सासरै ओसर-मौसर, ऐडै-मेडै, मांय सगल़ो भाईपो भेल़ो होंवतो. बो तो आज ई हुवै, इण मांय कूड कांई ? सुणो तो सरी, मां कवै जे साठ भायां रै कडूम्बै मांय कोई रूसेड़ो होंवतो तो बणेड़ो धान कड़ाई मांय पड्यो रैंवतो अर कोई कोनी जीमतो. पैली सगल़ा रल़'र रूसणियै नै मना'र ल्यांवता पछै भेल़ा जीमता. अब थेई बताओ, रूसेडै़ भाइपै नै आप कित्तीक बिरियां मनायो है ? कित्तीक बिरियां रूसेड़ै भाइड़ां नै जीमण सारू उडीक्यो है ?

पण मां तो मां है. कूड बोलै तो उण’नै टोकणियो ई कुण ! जीसा तो बरसां पैली हरिसरण हुग्या, हंकारो देवै ई कुण !

मां रा कूड थे सुणता जावो. बा कवै ‘तेरी बडिया भरयै तावड़ियै डेढ मण रो छालो सिर माथै उंचायां धोळियै खेत सूं घरां आ जांवती.’ आपनै बतावूं म्हारै धौळियै खेत रो आंतरो गांव सूं डेढ कोस है. अब थेई बतावो, लुगाई री जात, साठ किलो वजन सिर पर उंचायां डेढ कोस उम्पाळा किंया चाल सकै ? अर खेत रो मारग आज ई इत्तो अबखो है कै कांई केणो !

ओ कूड नीं तो कांई है. पण मां कद ठमै. बा केवै कै तेरी नानू मौसी तकड़ी कमेरण ही. एकर बण रात नै खल़ो रूखाल़ती बेल़ा सौ मण चिणां री धड़ एकली उपण दी. तेरै नानो ई इचरज करयो कै बेटी नानकी तो छोरां उपराकर निसरी.

सौ मण चिणां री धड़ ! यानी चाल़ीस कूंटल. जे कदेई आप जेई अर चोसंगी सूं किणी किरसै नै हाथां धान उपणतो देख्यो है, तो आप ई कैस्यो इंयां किंयां हू सकै. ते'रा-चऊदा बरसां रो टाबर, बोई छोरी री जात ! ओ तो साव कूड है.

आ बात किंया जचै ? अर जचै तो बताओ दिखाण कै आप इस्सी कित्तीक लुगायां आपरै नेड़ै-तेड़ै देखी है ?

पण नंई मां नै तो आपरी बात मनावणी, भलंई साव कूड ही होवै. खेत री बात करै जद बा सदांई बतावै कै भण्डाण आळी रोही सूं तेरा बाबो मतीरा ल्याया करता जिका मिसरी सा मीठा अर घड़ै जिड्डा मोटा होंवता. भई, म्हारा मतीरा, तरबूज अर सैंचुरी सै देखेड़ा है, म्हूं तो कदेई घड़ै सूधो तरबूज ई नीं देख्यो जिको पाणी री धरती निपजै पछै पाणी नै तरसती थल़ी पर इत्तो मोटो मतीरो किंया जचै !

पण मां रै कूड़ री हद कठै ! बा तो इंया भी कवै कै जद म्हूं परणीज’र इण घर मांय आई उण दिनां थारै जीसा री तिनखा फगत बीस रिपिया मइनो ही अर बाबोसा नै पैंतीस मिल्या करता. दोनूं भायां रो घर खर्चो हद कर’र पचास रिपिया ! बा कवै उण घर रा आठूं जीव कदेई भूखा को सोया नीं, अर आयै-गयै नै रोटी ढबसर सणै चूरमै घाली. किणी मंगतै भिखारी नै ई हाथ रो उथळो  दियो, मुण्डै रो नीं !

थे बताओ आ, बात जचै है के ? बीस रिपियां रो कीला आटो को आवै नीं आज. चलो मान लियो मुंगवाड़ो बेजां बध्यो है पण तोई कित्तोक ? पचास रिपियां मांय पूरै मइनै आठ जीव धापै. ओ कूड नंई तो कांई है ? मां खन्नै किरसन भगवान री तूठेड़ी चावळां री देगची म्हूं तो को देखी नीं कदेई !

बा बतावै तेरा नानो उम्पाळा मण्डी जांवता. बै बागफाटी उठ’र व्हीर होंवता अर सौदो सप्पो ले’र सिंझ्या पड़यां पाछा घरै आ बावड़ता. अपरोगी बात आ है कै म्हारै नानेरै निरबाणै सूं सूरतगढ़ मण्डी बा'रा कोस दूर है. फेरूं कीं वजन तो सौदै सप्पै रो ई होंवतो हुवैला. अर बोई आणो जाणो चौइस कोस अेक दिन में ! किंया जचै ? पण मां कवै ‘बठै किस्या साधन पड़या हा. पन्दरा बीस दिनां मांय एकर तो मण्डी जायां ई सरतो. हां, अेक साल धपाऊ रा चिणा हुया जणा बां अेक स्याण्ड ले’ली. स्याण्ड पर जावणो फेर ई जचै है.

ना मान लाडी ! पण फेर कवूं कै म्हूं तेरलै दांई कूड को बोलूं नीं. तू तो साम्पड़दै ई कूड़ो है. म्हारै साम्ही कित्ती बिरियां मोबाइल पर कूड़ लढकावै.

'घरै बैठयो ई बोलै कै आज तो पसवाडै़ आयोड़ो हूं...'

'बस ठीक है. थे साचा अर म्हूं कूड़ो !'

मां री बात रो थाप खांयां पछै ई म्हूं केवूं

म्हारी मां कूड बोलै है !

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