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अपराध और दण्ड

(हिन्दी कहानी)
-डाॅ. हरिमोहन सारस्वत ‘रूंख

‘ट्रक पलटा, खलासी समेत ड्राइवर की मौत!‘ अखबार के तीसरे पन्ने पर समाचार लगा हुआ है. सब हेडिंग में लिखा है ‘तेज स्पीड ने लीली दो जिंदगियां’ अचानक बढ़ी धड़कनों के साथ मेरी फटी आंखें एक सांस में पूरा समाचार पढ़ जाती हैं. ‘राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 62 पर एक ट्रक पलटने से खलासी समेत ड्राइवर की मौत हो गई. पुलिस रिपोर्ट के अनुसार ट्रक भावनगर से बठिंडा जा रहा था. इस ट्रक में पपीते भरे हुए थे. भारी बारिश के बीच तेज गति के कारण ट्रक चालक संतुलन खो बैठा. ट्रक पलटने से सड़क पर दूर-दूर तक पपीते बिखर गए. पुलिस ने मर्ग दर्ज कर शवों को मोर्चरी में करवाया है.’ 

नहीं, नहीं. ये खबर सरासर झूठी है. ऐसा नहीं हो सकता. अखबारनवीसों को नहीं पता. उन्होंने तो पुलिस सूत्रों के आधार पर समाचार बनाया है. दरअसल यह मौत नहीं, हत्या है. मैं इस हत्या का एकमात्र चश्मदीद गवाह हूं और हत्यारा कोई और नहीं, बल्कि मैं खुद हूं.

मौत और हत्या के इस फर्क को समझने के लिए आपको मेरे साथ तीन दिन पहले की दोपहर में घर से निकलना होगा. खुशनुमा मौसम में बूंदाबांदी के बीच शहर की भीड़ भरी गलियों से निकल मेरी गाड़ी हाईवे पर पहुंची ही थी कि बरसात तेज हो गई थी.

 बारिश में सड़क पर भारी वाहनों का यातायात घट जाता है. ज्यादातर बस और ट्रक ड्राइवर बरसात के समय अपने वाहन को सड़क के एक किनारे खड़ा कर देते हैं. यह आम बात है. मुझे चूंकि शाम तक जयपुर पहुंचना था इसलिए मैंने गाड़ी नहीं रोकी. विशेष परिस्थितियों को छोड़ दें तो आमतौर पर मैं अपनी गाड़ी खुद ही ड्राइव करता हूं. और ऐसे खुशनुमा मौसम में तो ड्राइवर का सवाल ही नहीं उठता. हाईवे को बारिश के पानी ने धो दिया था. काली नागिन सी पसरी सड़क पर गिरती वर्षा की बूंदें मनमोहक नजारा प्रस्तुत कर रही थी. मेरी गाड़ी का वाइपर तेजी से चल रहा था. सामने खाली सड़क और गाड़ी में बज रहे मधुर संगीत ने सफर को आनंददायक बना दिया था. मैं अपनी मस्ती में गुनगुनाता हुआ गाड़ी चला रहा था. बीच-बीच में कोई इक्का-दुक्का बस या ट्रक मुझे क्रॉस करता तो मेरी गाड़ी हवा की फटकार से लहरा जाती. कुल मिलाकर एक लॉन्ग ड्राइव जैसा सुकून देने वाला माहौल था.बारिश के पानी से धुलने के बाद हाईवे बिल्कुल साफ हो गया था. सड़क पर इक्का-दुक्का गड्ढे भी नजर आ रहे थे. 

बड़ी देर बाद सामने से एक ट्रक आता दिखाई दिया जो काफी दूर था. मैंने ज्यादा गौर नहीं किया. अचानक सड़क पर एक गड्ढा दिखा तो मैंने उससे बचने के लिए दांई तरफ कट मारा. मेरे लिए यह सामान्य बात थी लेकिन उसी क्षण सामने कुछ असामान्य सा घटित हुआ. मेरी गाड़ी से लगभग 100 मीटर की दूरी पर सामने से आ रहे ट्रक के अचानक ब्रेक लगे और वह गीली सड़क पर स्लिप होकर किसी छोटे बच्चे की तरह 180 डिग्री घूमता हुआ तेजी से सड़क के एक तरफ पलट गया. यह सब पलक झपकते ही हो गया और अगले ही क्षण मेरी गाड़ी अपनी पूरी स्पीड पर वहां से क्रॉस कर गई. मैंने गाड़ी के रियर मिरर में पीछे देखने की कोशिश की तो थोड़ी दूर तक पलटा हुआ ट्रक दिखाई दिया मगर उसके बाद नजरों से ओझल हो गया. दूर-दूर तक कोई भी वाहन सड़क पर आगे पीछे नहीं था. मेरी आंखों के सामने ट्रक के पलटने का वह क्षणिक दृश्य बार-बार घूमने लगा. मेरी धड़कनें बढ़ गई थी. 

क्या मुझे रुकना चाहिए था ? मेरी क्या गलती थी ? मेरी गाड़ी तो दूर थी फिर मैं क्यों टेंशन ले रहा हूं ? क्या ट्रक ड्राइवर ने मुझे देखा होगा ? क्या, क्यों, कैसे का भाव के लिए असंख्य सवाल मेरी आंखों के आगे नाचने लगे. मन के एक कोने में प्रार्थना भी चलने लगी, ‘हे, भगवान सब कुशल हो.’ 

इसी असमंजस की स्थिति में गाड़ी खाली सड़क पर तेजी से दौड़ रही थी और हाईवे टोल प्लाजा आने वाला था. टोल नाके का बैरियर देख मुझे याद आया वहां कैमरे भी लगे हैं. पता नहीं क्यों मैंने गाड़ी तुरंत बाई तरफ के कच्चे रास्ते पर उतार ली जो दो तीन गांवों से होती हुई आगे जाकर हाईवे में मिल जाती थी. मैंने इस बाबत खुद से सवाल किया तो जवाब नहीं दे पाया. इसी उहापोह में अज्ञात भय के साथ मैं देर रात तक जयपुर पहुंच गया. अगले दिन सुबह देर से उठा और सारे विचारों को झटक दिया. दो दिन काम में कैसे गुजरे पता ही नहीं चला. 

अब जबकि मैं जयपुर के व्यस्त कार्यक्रम के बाद घर लौट आया हूं और मेरे सामने तीन दिन पुराना अखबार पड़ा है. मैं एक बार फिर सवालों के चक्रव्यूह में खुद को घिरा पाता हूं. मेरी कोई गलती ही नहीं थी फिर भी मैं क्यों डरा हुआ था. अगले ही पल लगा मैं खुद से झूठ बोल रहा हूं. बार-बार भीतर से कोई चीख रहा था.

‘ सच कहो, तुम्हारी कोई गलती नहीं थी ?’
‘हां, हां, नहीं थी. मेरी गाड़ी ने तो उसे छुआ तक नहीं था. वह तो अपने आप स्लीप हुआ था. यह भी तो हो सकता है कि वह नशे में हो.’
‘क्यों नहीं हो सकता ! लेकिन तुम तो नशे में नहीं थे ?’
‘तुम कहना क्या चाहते हो ? मेरी वजह से यह सब हुआ है ?’
‘कौन जानें ! पर तुमने कट तो मारा था.’
‘तो ! गड्ढों से गाड़ी को बचाऊं नहीं ?’
‘बिल्कुल बचाओ, लेकिन खुद को बचाने के चक्कर में किसी निर्दोष को मरवा देना कहां का न्याय है ?’
‘ये फैसला तो अदालत करती है और दुनिया की कोई अदालत मुझे इस हत्या का अपराधी साबित नहीं कर सकती. देश के संविधान के मुताबिक मुझे खुद अपने खिलाफ गवाही न देने का मौलिक अधिकार प्राप्त है. पुलिस ने भी मर्ग दर्ज कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली है. अब तक तो लाशों का संस्कार भी हो चुका होगा....!’
‘बहुत चतुर हो ! अपनी पैरवी खुद ही कर लेते हो. मुझे पता है कि दुनिया की अदालतें तुम्हें पकड़ नहीं पाएंगी. पर मैंने तुम्हारे खिलाफ लापरवाही से वाहन चलाकर हत्या कारित करने का मुकदमा संख्या 108/20 दर्ज कर लिया है. तारीख पर तुम्हें हाजिर होना ही होगा.’ मेरे भीतर का चेहरा जज की तरह मुस्कुराया और गायब हो गया....

उस दिन के बाद मुझे अक्सर इस मुकदमे की तारीख भुगतने के लिए मन की अदालत में हाजिर होना पड़ता है. वहां सरकारी वकील बन मैं खुद ही खुद से तीखे सवाल करता हूं. फिर किसी घाघ और अनुभवी वकील की तरह शानदार तर्कों से उनका उत्तर देता हूं. सामने बैठा न्यायाधीश मेरा चेहरा देख मुस्कुराता रहता है. मामला अभी साक्ष्य पर है. देखें, क्या फैसला होता है. आपका मन क्या कहता है !
                                                                                     -रूंख



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