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Saturday, 12 July 2025

राजस्थानी मुहालणी

हथाई में आज बात करस्यां राजस्थानी मुहालणी री। इण नै केई जिग्यां मुहारणी भी कहीजै। घर रा बूढा बडेरा आपनै कई मुहालणी बता सकै। कांई है आ मुहालणी अर क्यूं महताउ है ? 

जूनै बगत में इस्कूलां में टाबरां नै बिलाठी अर कक्को, जिण नै हिंदी में स्वर अर व्यंजन कैवै, रो ग्यान करावतां थकां हरेक आखर री मुहालणी रटाइजती। मुहालणी उण आखर रो वाक्यां में प्रयोग हो जिको टाबरां रै चेतै रैवतो। वाक्यां रो ओ प्रयोग भोत सरल अर मजेदार होवतो जिणसूं टाबर अेक मनचींती लैण सूं उण आखर नै सावळ पिछाण लेवता। गरूजी मुहालणी बोलता अर टाबर बांरै लार-लारै उण नै बोलता अर रटता। समची वर्णमाळा इण ढाळै टाबरां नै भोत सोरफाई सूं याद हो जावती। इण भणाई नै ‘गुणी’ केवता। लिखणै सूं पैली उण नै याद करणो भणाई रो पैलो नेम हो। पण माडी बात देखो, आज री भणाई में आखर ग्यान री आ सांतरी तजबीज है ई कोनी। हिंदी में तो आज तंई इस्यो काम नीं हो सक्यो।

मुहालणी रा उदाहरण देखो-


अ-आ = आईड़ा-आइडा दो भाइडा

ए = एको एकलो

ओ= ओ बैठो ओठियो

औ = दो-दो मात औरणियों


२- कक्किये री मुहाळणीं / मुहारणीं

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क = कक्कियो कोड रो

ख् यानी क किसो ? क कोड़ आल़ो/ कोड़ में लागे जाको ! ,

ख = खख्खो खाजूलो

ग=गग्गा गोरी गाय

घ=घघ्घा घाट पिलाने जाय

च= चिड़े चिडी री चूंच

छ =छछिया पिचिया पोटला

ज =जजजा जेर बाणियों

झ=झझ्झा झाड की लाकडी

ट=टट्टिया टट्टिया दो पोड़ी

ठ=ठठिया ठाकर गांठडी

ड= डडडा कूकर पूंछडी

ढ = ढढढा ढेर बाणियों

ण = राणो ताणे तेल / राणों ताणे तीन लाकडी ख् हिंदी में तो श्ण श् खाली है ,

त=तत्तो तत्तूतियो कान को

थ = थथ्थियो थावर

द= ददियो दीवटो

ध= धध्धो धाणक छोडयां जाए

न= आगे नन्नो भाज्यां जाए

प = पप्पा पटकी पाटकी

फ = फफ्फो फालिंगो

ब= बब्बा बेंगण बाड़ी रा / बब्बा बाड़ी बैंगणियाँ

भ = भभ्भा भाभजी भटारको / भभ्भा मूंछ कटारकी

म= मम्मा ले कसारकी

य = यय्या यय्या पाटलो

र = र रा रो रींकलो

ल = लल्ला लल्ला लापसी

व= वव्वा वैंगण वासदे

श =शाश्शी सौलंकी

ष= षषषो खांडको

ह = ह हा हा हिन्दोली / ह हा हां बोल़ो

ः = अड़े तड़े दो बिन्दोली


हथाई सूं चैटिंग


(लोक री आर्ट ऑफ लिविंग)

रूंख भायला चौक. चौक माथै पाटो. पाटै पर हथाई. छड़छड़ीली सी चैटिंग आ ढुकी. इण बतरस रो आनंद पाठकां सारू-

चैटिंग: ‘कियां हो ?’

हथाई: ‘कियां होवणो हो’

चैटिंग: ‘म्हंू तो बूझ्यो ई है।’

हथाई: ‘तो म्हूं उथळो दियो ई है‘

चैटिंग: ‘कदे तो सावळ बोल्या करो !’

हथाई: ‘थूं ई कदे सावळ बूझ्या कर’

चैटिंग: ‘हालचाल बूझणो कांई कावळ है के ?’

हथाई: ‘सो क्यूं जाणता थकां बूझणै में कांई स्याणप’

चैटिंग: ‘चलो छोड़ो, लीव इट, कांई चल्लै ?’

हथाई: ‘गोडा नै छोड सो कीं चल्लैै’

चैटिंग: ‘ऊं हूं........म्हारो मतलब है, अबार आप कांई कर रैया हो ?’

हथाई: ‘ग्यास बाढां’

चैटिंग: ‘म्है ग्वार तो सुण्यो है, आ ‘ग्यास’ कांई होवै?’

हथाई: ‘इत्ती ताळ सूं थूं जिकी म्हां साथै बाढै’

चैटिंग: ‘पण बाढण सारू तो चक्कू का तलवार चाइजै, बै कठै ?’

हथाई: ‘मूंडै में लपलपावै’

चैटिंग: ‘नां ओ, लाई जीभ रो कांई दोस ?’ 

हथाई: ‘जीभड़ल्यां इमरत बसै, जीभड़ल्यां विस होय, 

       कागा किण रो धन हरै, कोयल किण नै देय’

चैटिंग: ‘आ जबरी ठरकाई है थे !’

हथाई: ‘ठरकाइजै तो मांचै री ईस का पछै पागो, बात तो सरकाइजै है’

चैटिंग: ‘कीं दो-चार और सरकावो नीं’ 

हथाई: ‘रैवण दे, सरकायां थारै चौसरा चाल जासी’

चैटिंग: ‘ओ हो, म्हूं बियां सरकावण री बात नीं करी।’

हथाई: ‘पण म्हूं तो बियां ई करी’

चैटिंग: ‘थे रिसाणा बेगा हो जावो’

हथाई: ‘थूं घोचो करै ई क्यूं’

चैटिंग: ‘म्हूं तो बात कर रैयी हूं’

हथाई: ‘बात स्यार थूं जाणै ई कोनी’

चैटिंग: ‘बात पछै और किसी’क होवै ?’

हथाई: ‘बात में तत होवणो चाइजै, सार होवणो चाइजै’

चैटिंग: ‘बो कियां आवै ?’

हथाई: ‘पटीड़ खायां’

चैटिंग: ‘थे सदांई कूटीजणै कुटाणै री बात क्यूं करो ?’

हथाई: ‘मिनख अर अदरक कुटीज्यां ई झरै’

चैटिंग: ‘तो पछै कूट खाणी सरू करां’

हथाई: ‘करो, कुण पालै है !’

चैटिंग: ‘म्हारी बातां में तत तो आ जिसी के ?’

हथाई: ‘थारो तो आयोड़ो ई पड़्यो है’

चैटिंग: ‘बो कियां ?’

हथाई: ‘थूं फगत कूड़ अर धूड़ रो ब्योपार करै’

चैटिंग: ‘कांई मतलब ? म्हूं कूड़ बोलूं ?’

हथाई: ‘थारै हियै नै बूझ....थूं बोलै कठैई लाधै कठैई, कैवै की,ं करै कीं’

चैटिंग: ‘इयां थोड़ो घणो तो कैवणो ई पड़ै’

हथाई: ‘कोई अड़ी है के’

चैटिंग: ‘समचो सांच बोल्यां लोग रिसाणा हो जावै’

हथाई: ‘पछै थारो नांव ‘लपोसियो’ राख लै’

चैटिंग: ‘हं...हं...आ म्हानै गाळ है’

हथाई: ‘अं....है....थारी दाळ में बाळ है’

चैटिंग: ‘थे सावळ बताओ, बात में वजन कियां ल्यावां’

हथाई: ‘बात गोडां को घड़ीजै नीं, मोढां ढोवणी पड़ै’

चैटिंग: ‘ढो लेस्यां, कदास पार पड़ै ई तो....!’

हथाई: ‘पैली कूड़ छोड़नो पड़सी’

चैटिंग: ‘बो कोनी छूटै’

हथाई: ‘पछै अड़ी कांई है, बगाओ जित्ती बगाइजै’

चैटिंग: ‘लोगां लपेटणी बंद करदी’

हथाई: ‘लटाई भरीजगी व्हैला, दूजा सोधो, कमी कठै’

चैटिंग: ‘सोधण ई तो आयी....’

हथाई: ‘झोटै आळै घरै लस्सी कोनी लाधै लाडी’

चैटिंग: ‘हीं...हीं...माड़ी होयी आ तो....’

हथाई: ‘हथाई सामीं तो पोत उघड़्यां ई सरै’। 

-रूंख भायला


Friday, 4 July 2025

देश, काल और समाज की चिंताओं का नवबोध कराती कहानियां

 

(पुस्तक समीक्षा)

राजस्थानी भाषा के आधुनिक कथाकारों में मदन गोपाल लढ़ा एक भरोसे का नाम है। मानवीय संबंधों में पसरी संवेदनाओं को लेकर वे अपने भाषायी कौशल और शिल्प से खूबसूरत कहानियां रचते हैं।  इन दिनों उनका नवप्रकाशित राजस्थानी कहानी संग्रह 'बीज, बूंटो अर चियां' चर्चा में है। बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित इस संग्रह में पन्द्रह कहानियां हैं जो अपने नवीन कथ्य और कहन शैली के चलते पाठकों पर खासा प्रभाव छोड़ती है। इन कहानियों को आधुनिक राजस्थानी की प्रतिनिधि कहानियों के रूप में देखा जा सकता है। 


कहानी साहित्य की सबसे लोकप्रिय विधा है। एक कहानीकार अपने कथानक के किरदारों को पल-प्रतिपल जीता है, उनकी संवेदनाओं को महसूस करता है तभी एक सुघड़ कहानी का जन्म होता है। शिद्दत से लिखी गई कहानी की खूबसूरती यही होती है कि वह गाहे-बगाहे खुद को पढ़वा लेने की क्षमता रखती है। बिना किसी गुम्फित कथानक और शाब्दिक चाशनी के भी कहानी कही जा सकती है, बशर्ते कथाकार में कहन क्षमता हो। ऐसी ही कहानियां लढ़ा के इस संग्रह में देखने को मिलती है। 


संग्रह की पहली कहानी 'सिल्ली-सिल्ली औंदी ए हवा' का कथ्य पाठक के अंतर्मन को झकझोर देता है। यह कहानी कई भारतीय भाषाओं में अनूदित भी हो चुकी है। कोरोनाकाल के दौरान मानवीय मूल्यों की गिरावट  'देस बिराना' कहानी में  देखी जा सकती है जहां कथा का नायक अपने पड़ोसियों के बदले व्यवहार से दु:खी होकर अपने मकान की बिकवाली निकाल देता है। संग्रह की  शीर्षक कहानी 'बीज, बूंटो अर चियां' स्त्री पुरुष के मध्य प्रेम के आधुनिक मनोभावों को तीन दृश्यों में खूबसूरती से प्रस्तुत करती है। इसी प्रकार 'तीजी आंख' कहानी में दूसरे के अंतर्मन को समझने वाला विषय लिया गया है वहीं 'सनेपी' कहानी अंधकार में डूबते मानवीय संबंधों के बीच रोशनी की एक किरण दिखाती है। यही आस्था, उम्मीद और विश्वास इन कहानियों की खूबसूरती है। 


पुस्तक की छपाई और साज सज्जा आकर्षक है। राजस्थानी के पाठकों के लिए यह एक पठनीय कहानी संग्रह कहा जा सकता है।


समीक्षक : डॉ हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'


किताब : बीज, बूंटो अर चियां, विधा : कहानी, प्रथम संस्करण : 2025, प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर

जिण री खावो बाजरी, उण री भरो हाजरी !

रूंख भायला
राजी राखै रामजी ! कैबत है, ‘जिण री खावै बाजरी, उण री भरै हाजरी’, बातड़ी घणी अमोलक है, जिण ठौड़ आपरी पेट ल्याड़ी होवै, आपरो रोटी रूजगार होवै, बठै हाजरी भरणी ई चाइजै। अठै हाजरी रो मतलब है, उण जिग्यां री माटी, सैंस्कार अर मायड़ भासा सारू आपरै हियै में माण तो होवणो ई चाइजै, आपनै तो उण संस्कृति में रचण बसण सारू बठै री भासा अर सैंस्कार ई सीखणा ई चाइजै। और पछै बाजरी अर हाजरी रो सगपण ई के !  

‘हेत री हथाई’ में आज आपां इणी बंतळ नै आगै बधावां। महाराष्ट्र में अबार हिंदी भासा री अनिवार्यता नै लेय’र लोग खासा रिसाणां हो रैया है, बान्नै लागै कै इण सूं बां री मायड़ भासा मराठी री मठोठ मांदी पड़सी। सोसियल मीडिया पर अेक विडियो वायरल है जिण में कीं मराठी लोग अेक राजस्थानी मिनख सूं थापामुक्की कर रैया है, उण नै मराठी बोलण सारू धमकावता दिख रैया है। थापामुक्की कदेई चोखी कोनी पण इण थापामुक्की रै मूळ में ‘बाजरी अर हाजरी’ रै अलावा कीं नीं है। हिंदी रा हिमायती अर राष्ट्रवाद री बात करणियां नै बात अपरोगी लाग सकै पण जे म्हारलो भाइड़ो हिंदी री ठौड़ राजस्थानी में इत्तो ई कैय देवतो, ‘भाईजी ! थे बोलण रो कैवो हो, म्हूं तो दूजां रै मूंडै ई मराठी बुला देस्यूं, का पछै म्हैं मराठी सीख रैयो हूं तो गदीड़ तंई बात जावती ई कोनी !’ अेक दूहो चेतै आवै-

अन्न भखै जिण देस रो, भासा उणरी बोल 

मायड़ भासा रै थकां, पर  भासा ना  बोल

जिका प्रवासी देस विदेस में बस रैया है, बान्नै इण घटना सूं कीं सीख लेवणी चाइजै, कुटीज्यां ई चेतो तो आवै, कै लोग आपरी भासा सारू कित्ता सजग है।


आप कैयस्यो- ‘‘ना ओ, ओ भासाई विरोध राजनीति सूं जुड़्यो है, अेक खास पारटी रा उछांछला लोग रोळोरप्पो कर रैया है !’ करता होसी, पण साची बात आ कै आपरी भासा नै लेय’र बठै रो मूळ बासिंदो खासा सावचेत है। जणाई बठै री सरकार हिंदी री अनिवार्यता सूं फटदणी सूं लारै सिरकगी।

आ मराठी भासा री ताकत है जिकी बठै रै रगत में रळी बसी है, लोग आपरी भासा सारू मरण मारण नै उतारू है।


आपणी राजस्थानी री बात करां तो......! जावण द्यो के पड़्यो है, आपां तो घर में बोलता ई सकां, बस पूगतै हिंदी छांटां अर टाबरां नै अंगरेजी बोलण री सीख देवां। कदास आपां नै हिंदी अर अंगरेजी बोलणै में ‘माॅडर्नटी’ री फील आवै। आप कैयस्यो, ‘आ के बात भाईजी ! राजस्थानी तो  बोलां तो ई हां !’


कोनी बोलो लाडी ! दफ्तरां, थाणां, कचेड़्यां में सरकारू अेळ’कारां सामीं बोलतां तो आपरी लालीबाई पलटो मार’र हिंदी में लपलप करै, आपनै तो संको आवै कै कठैई अधिकारी आप नै राजस्थानी बोलतां देख गंवार अर गांवड़ियो नीं समझ लेवै। अफसरां सामीं ‘ऐसे.... वैसे....’ करती बेळा आप नै चेतो नीं रैवै कै बात नै ‘इयां अर बियां’ भी कैयो जा सकै। अरे डेढ स्याणो !  आपरी भासा बोलणो गंवारपणो नीं होवै, मिनख री स्याणप है आ तो। फेर राजस्थान में राजस्थानी नीं तो पछै गोवा में तो बोलण सूं रैया !

 

साची बात तो आ, कै देस री आजादी रै पछै राजनीति करणिया कीं चातर लोगड़ां अेक सुनियोजित ढंग सूं आपां री भासा नै मारणै में कसर नीं राखी, अेक सबळी अर सुतंतर भासा नै हिंदी री बोली बतावता नीं संक्यां बै। अर मजै री बात भासा रै पेटै नींद में सूतै मिनखां रै प्रदेस राजस्थान में बांरी  साजिस कामयाब होगी। आज घड़ी बै लोग राजस्थानी री मानता रो विरोध ओ कैय’र करै, कै इससे हिंदी कमजोर होगी। बान्नै ठाह ई कोनी कै हिंदी रा प्रख्यात आलोचक नामवरसिंह जिस्या विद्वान कैयग्या है, ‘जिन राजस्थानियों ने हिंदी को उत्पन्न किया वे हिंदी के विरोधी कैसे हो सकते हैं।’ 


लैरलै सत्तर बरसां में भासा रै पेटै चालतै इण ओछै राजनीतिक माहौल में आपणै साथै तो आ बणी कै-  


बुद्ध बिसर्या बिदवान, बायरियो अंवळो भयो

मायड़ वाळो मान भोळा भाई भूलग्या

सीख खड़्यां ई सांझ मोथा मिल्या मिलायदी

बजी मावड़ी बांझ, फरजंद मूंछ्यांळा फिरै 


हर भासा री आपरी ठसक, आपरी मठोठ होवै पण जित्ती सोरपाई सूं आपरी मायड़ भासा में कोई बात कैयी जा सकै, बा दूजी किणी भासा में नीं हो सकै।  भासा मिनख नै भौतिक जगत सूं जोड़ै इणी कारण सूं आखै जगत में भासा रो जलम भौम अर जलम देवणआळी मा दंई माण होवै। बस पूगतां आप दुनिया री जित्ती भासवां सीख सको, सीखो। इण में बड़ाई है आपरी, विद्वता है, पण जे आपरी मायड़ भासा रो माण भूलग्या तो आप सूं ढफोळ कुण ! सुणता जावो-


निज भासा स्यूं अणमणा, पर भासा स्यूं  प्रीत

इसड़ै नुगरां री करै, कुण जग में  परतीत

का पछै ओ सुणल्यो-


किण  मायड़  रो पूत है, भासा करै पिछाण 

बोली  बोलै  ओपरी,  गोद  लियोड़ो  जाण


सेठिया जी रै अेक दूहै में आज री हथाई रो सार है-

 

‘भरो सांग मनभावता पण ल्यो आ थे मांड

जिका  भेस  भासा  तजै बान्नै कैवै  भांड’


तो भांड ना बणो, आपरै देस में, आपरै लोगां बिच्चाळै अर घर परिवार में आपरी भासा बोलो, मा रै होवता थकां माई मा क्यूं लावणी !!


बाकी बातां आगली हथाई में। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बस्सो....।

     -रूंख भायला


तीज तिंवारां बावड़ी...!

पुन्न बडेरां  रा  आछा, बरकत है बां  री रीतां  में तिंवार बणाया इस्या इस्या गाया जावै जका गीतां में राजी राखै रामजी ! आज बात आपणै तिंवारां री...

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